गुरुवार, 7 अगस्त 2014

देशभक्ति से हमेशा बिदकती रहने वाली कांग्रेस क्या वर्तमान हार से कुछ सीखेगी?

विजय कुमार नड्डा
कहते है प्रकृति प्रत्येक व्यक्ति, संस्था , समाज व् राष्ट्र को सम्भलने का अवसर देती है। इस में जो प्रकृति की चेतावनी को सुन लेता है, उसके अनुसार अपने में आवश्यक परिवर्तन कर लेता है वह जीवन की यात्रा में आगे निकल जाता है। इसके विपरीत जी अपने अहंकार या लापरवाही में उस ईश्वरीय सत्ता के संकेत को अनसुना कर देता है वह इतिहास में खो जाता है। क्या कांग्रेस नियति के सन्देश को पकड़ने में कामयाब होगी या इतिहास में किसी प्रजाति की तरह बिलुप्त हो जाएगी। अनेक अक्षम्य गलतियों के बाबजूद  कांग्रेस देश के राजनैतिक परिदृश्य से बाहर न हो, अपने में आवश्यक परिवर्तन कर देश सेवा में शामिल  हो, ऐसी देश की इच्छा है।  दिल्ली की सत्ता से बाहर कर प्रकृति ने  कांग्रेस को अपनी करनी का फल भोगने के लिए छोड़ कर उसे सम्भलने का ही अवसर दिया है। कांग्रेस की यह स्थिति क्यूँ हुई और अपनी इस शर्मनाक हार के झटके से यह दल कैसे बाहर आए इसी उद्येश्य से यह चर्चा की जा रही है। कभी पूरे देश पर शासन करने वाली यह पार्टी आज विपक्ष का नेता पद पाने के लिए संघर्ष कर रही है। कांग्रेसी ही नहीं तो सामान्य व्यक्ति भी कांगेस की इस राजनैतिक दुर्दशा का कारण नहीं  समझ पा रहे हैं। कांग्रेस के बड़े नेता तो अपनी पार्टी की इतनी बड़ी हार को पचा ही नहीं पा रहे हैं। उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा है की वे दिल्ली हार चुके हैं। क्या कांग्रेस के बड़े नेता अपनी ऐतिहासिक पराजय से कुछ सीखेंगे? उम्मीद तो काफी कम है लेकिन देश और पार्टी के हित में उन्हें कठोर आत्म निरीक्षण करना ही होगा। सत्ता से लगभग तीन महीने के वनवास में कांग्रेस का व्यवहार निराशाजनक ही लग रहा है। विपक्ष के नेता पद के आलावा और किसी मुद्दे में कांग्रेस रूचि नहीं ले रही है। जनता के जनादेश का सम्मान कर सार्थक विपक्ष की भूमिका में कांग्रेस जितना जल्दी आयेगी उसके राजनैतिक स्वास्थ्य के लिए ही उतना अच्छा है। इतने बड़े दल का अपने अंहकार और एक परिवार की पूजा अर्चना में राजनैतिक आत्महत्या कर लेना भारत के लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। क्यूंकि कांग्रेस द्वारा उत्पन्न रिक्तता को भरने के लिए कोई राष्ट्रीय दल अभी दिख नहीं रहा है। आखिर कांग्रेस इस दुरावस्था को कैसे प्राप्त हुई? यहाँ इसका छोटा सा विश्लेष्ण करने का प्रयास कर रहे हैं।
इतना तो हम सब जानते हैं कि कांग्रेस की स्थापना अंग्रेज ने भारत पर अपना शासन लम्बा और निर्बाध रूप से चलंता रखने के उदेश्य से 1885 में एक अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. हयूम से करवाई थी। प्रारम्भ में केवल अंगेज और उसके बाद अंग्रेज भक्त ही इसके अध्यक्ष बनते थे। यद्यपि कांग्रेस की देश आजाद कराने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। तो भी अगर इमानदारी से इतिहास को कुरेदा जाए तो साफ ध्यान में आएगा कि अधिकांशत: यह दल अंग्रेजों का हस्तक ही बना रहा । इसी कारण कांग्रेस की कथित देशभक्ति भी देश के लिए आखिर में हानिकारक ही रही है । यूं कहा जा सकता है कि- हुए तुम दोस्त जिनके दुश्मन की उन्हें जरुरत क्या या फिर यह भी कहा जा सकता है  कि -मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन ज्यादा अच्छा रहता होता है’। अब कांग्रेस नेतृत्व मूर्ख था या ज्यादा ही समझदार अर्थात ‘देश सेवा और पेट सेवा साथ- साथ करने की कला में माहिर- यह तो शोध का विषय हो सकता है। इतिहास बताता है कि कांग्रेस देशभक्ति से ऐसे विदकती रही है मानों 1000 वोल्टेज का करण्ट लग गया हो । कांग्रेस ने हमेशा अंग्रेजों के मन के अनुकूल कार्य कर उनकी उनकी योजनाओं को लागू करने में सहायक हो कर अपने संस्थापकों को ही प्रसन्न किया है । यह ठीक है कि समय के साथ कांग्रेस के अन्दर गरम दल खड़ा हो गया। उसके दबाब के कारण कांग्रेस को जनमत को अपने साथ रखने के लिए देशभक्ति की बात भी करनी पड़ी। कांग्रेस के बड़े जन अन्दोलनों से देश के समान्य व्यक्ति में देश भक्ति का ज्वार आया भी। लेकिन यह सब उसने अनमने मन से ही किया। और अनेक ऐतिहासिक अवसरों पर इसकी अंग्रेज परस्त राजनीति से भारत हमेशा हारता ही रहा।  इस दल पर हमेशा अंग्रेजभक्त लोगों का ही कब्जा रहा है। आप देखेंगे कि महर्षि अरविन्द, नेता जी सुभाष, सरदार पटेल और लाल बहादुर शास्त्री आदि कांग्रेस में ज्यादा नहीं चल पाए । इतना ही नहीं स्वयं महात्मा गान्धी जी जिन्होंने पहले सरदार पटेल के पक्ष में आए बहुमत को नकार कर पण्डित जवाहर लाल को देश का प्रधानमन्त्री बनाया और बाद में पण्डित नेहरु की जिद के आगे असहाय हो कर एक प्रकार से निराश ही हो गए थे । उन्होंने इसी निराशा में कांग्रेस को भंग कर नए दल के गठन का सुझाव रखा था जो कि सत्ता के गलियारों में हमेशा के लिए खो गया। महर्षि अरविन्द को राजनीति छोड़ कर पांडीचेरी जाना पड़ा और नेता जी को तो देश के बाहर जाकर ही आजादी के आन्दोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय करना पड़ा। और लाल बहादुर शास्त्री जी को तो षड़यन्त्र का शिकार हो कर इस दुनिया को छोड़ ही कर जाना पड़ा । अंग्रेज भक्ति के कारण ही क्रान्तिकारी हमेशा कांग्रेस के निशाने पर रहें हैं । ऐसा भी कहा जाता है कि कांग्रेस ने नेता जी को विमान दुर्घटना के बाद जिंदा मिल जाने पर ब्रिटिश सरकार के हवाले करने का वायदा किया था । ऐसी मान्यता है कि इसी कारण नेता जी सारी उम्र प्रकट ही नहीं हुए । शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांसी रद्द करने के लिए महात्मा जी ने लार्ड इरविन से मांग करना भी उचित नहीं समझा था। अगर महात्मा जी अड़ जाते तो 1930 के दशक में अंदर से खोखला हो चुका अंग्रेज इन नौजवानों को फांसी देने की हिम्मत नहीं कर सकता था। इस प्रकार भारत मां के उन लाड़लों के बहुमूल्य जीवन बच सकते थे । क्रान्तिकायिों के प्रति पक्षपातपूुर्ण व्यवहार की टीस शहीद सुखदेव के महात्मा जी के नाम लिखे पत्र में प्रकट हुई है । इसके अलावा कांग्रेस कुर्सी की भूख के कारण देश के बंटवारे के लिए अंग्रेज के षड़यन्त्र का जाने -अनजाने मोहरा बन गयी। अंग्रेज ने 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना करवाई । कांग्रेस ने इस के साथ गलबाहियां डाल अंतत: देश को विभाजन के मुंह में धकेल दिया । इस प्रकार प्रिय मातृभूमि के विभाजन का पाप भी इसी दल के माथे पर है। इसके अलावा झण्डा कमेटी की स्पष्ट संतुति के बाबजूद देश का झण्डा भगवा नहीं बनने दिया, बन्देमातरम् को मुस्लिम दबाब में नकार दिया। गौ हत्या को बेरोक टोक चलने दिया जो आज भी जारी है। आजादी के बाद इस दल ने अपनी कुर्सी के लिए कश्मीर के बड़े भाग को पाक और चीन के हवाले करने का पाप किया, चीन के हाथों भारत को शर्मनाक हार का कलंक झेलना पड़ा । ऐसी अगर इनकी सारे अपराधों की सूची बनाने लगें तो कागज कम पड़ जाएंगे ।
दूसरी तरफ जब कांग्रेस अंग्रेज के चरण चुम्बन में व्यस्त थी उसी समय खुदी राम बोस किंग्ज फोर्ड पर बम फैंक कर फांसी चढ़ गए थे। यहां से प्रारम्भ हुई क्रान्ति वीरों की यह श्रृंखला हजारों शूरवीरों के बलिदान के बाद 1940 में उधम सिंह की फांसी पर झूलने से समाप्त हुई । कांग्रेस काफी समय तक अपने प्रस्ताव की समाप्ति- राजा चिरंजीवी हो’ अर्थात ‘लांग लिव दा किंग’ से करने वाली कांग्रेस 26 जनवरी 1930 को पहली वार देश के लिए पूर्ण स्वतन्त्रता की मांग करने का साहस बटोर पाई थी । अंग्रेज रक्त का ही परिणाम था कि ईमानदार देशभक्ति की बात करने वाले हमेशा ही कांग्रेस की आंखें की किरकिरी रहे हैं । संघ को ले कर कांग्रेस का गुस्सा भी इसी सोच का नतीजा है । आज कैसा परिदृष्य है जरा देखें -अंग्रेज रक्त से प्रारम्भ कांग्रेस की कमान फिर घूम कर विदेशी मूल व अ्रंगेज रक्त के पास आ गई है । कांग्रेस वैसे ही देश हित के साथ समझौता करने से बाज नहीं आती रही है तो अब तो ‘रव्व खैर करे ’ वाली ही स्थिति है । जिस मुस्लिम लीग ने विभाजन के लिए जिद की उसी लीग के साथ कांग्रेस कुर्सी की साझेदारी करती है । जिन कम्युनिस्टों ने  ‘टू नेशन थ्योरी ’ की खोज कर उसका पुरजोर प्रचार और समर्थन कर देश विभाजन के लिए वातावरण बनाया और विभाजन के लिए वैचारिक आधार प्रदान किया आज वे भी कांग्रेस के प्रिय बने हुए हैें । कांग्रेस उनके साथ सत्ता सुख भोगने में कोई गुरेज नहीं करती। मजेदार बात है कि कांग्रेस को संघ ही नहीं बल्कि देशभक्त मुसलमान और ईसाई भी इसे बिल्कुल नहीं सुहाते हैं । अलगावादी अल्पसंख्यकों को खुश करने के चक्कर में अपनी महान हिन्दु संस्कृति को आतंकवादी बता कर पूरी ऋषि परम्परा को ही कठधरे में खड़ा करने में भी कोई संकोच नहीं कर रही है। रामसेतु को तोड़ने के षड्यंत्र में सहभागिता हो, अल्पसंख्यक हिंसा निरोधी विधयेक लेन का दुसाहस हो या फिर काल्पनिक भगवा आतंकवाद का शोर मचा कर साध्वी प्रज्ञा और स्वामी असीमानन्द को जेल भिजवाने की साजिस ..... इन सबके कारण देश की जनता को लगा कि कांग्रेस की शिशुपाली गलतियाँ सौ पूरी  हो चुकी हैं अत: इस दल को घर  बैठाना आवश्यक है। कुल मिला कर कांग्रेस के पतन की यह कहानी है। आज अगर कांग्रेस इतिहास से सबक लेकर नई दृष्टि और नई सोच से फिर राजनीति शुरू करती है तो राजनीति कभी भी- अभी नहीं तो कभी नहीं नही होती है। कांग्रेस को अति अल्पसंख्यकवाद की राजनीति से तौबा कर देशभक्ति की राजनीति करनी प्रारम्भ करनी चाहिए। अपनी ही महान विरासत को याद् कर कांग्रेस आगे बढ़ेगी तो भविष्य उज्ज्वल है। संघ जैसी देशभक्त संस्था से उलझने से कांग्रेस को क्या मिलेगा? जिस संघ का अंग्रेज, स्वयं कांग्रेस के महान  के पूर्बज, विदेश परस्त ईसाई, मुसलमान और कम्युनिस्ट कुछ नहीं बिगाड़ सके उससे उलझने से कांग्रेस के हाथ सिवाय निराशा के कुछ नहीं लगेगा। विरोध करने के बजाये कांग्रेस को संघ का सहयोग लेने का विचार करना चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. कृपया कुछ विशिष्ट प्रसंग भी जोड़ें , एम ओ मथाई और एन वी गाडगील की पुस्तकें अच्छा स्रोत हो सकती हैं

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