शनिवार, 27 सितंबर 2014

युवा आदर्श शहीद भगत सिंह

हजारों साल कुदरत अपनी बेनूरी पर रोती है।
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।। यह कहावत दुनिया के बाकी देशों के लिए ठीक बैठती होगी। लेकिन हमारी प्रिय भारत भूमि को यह वरदान प्राप्त है कि समय- समय पर एक से बढ़ कर एक महापुरुषों ने यहाँ जन्म लिया। यही कारण हैं कि जितनी दुनिया के देशों की कुल आयु नहीं है उससे कहीं अधिक कालखंड हमारा विदेशी हमलावरों से दो-दो हाथ करने का कालखंड है। लगभग एक हजार साल तक इस्लामिक हमलावरों से कड़े संघर्ष के बाद हमारे जुझारू पुर्बजों ने देश को मुक्त कराया ही था, अभी ठीक से साँस भी नहीं ले पाए थे कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली, धूर्त अंग्रेज आ टपका। थोड़ी देर भले ही हमे अंग्रेज को समझने में लग गयी लेकिन हमने फिर से नये जोश के साथ जिसके राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था उस अंहकारी और शक्तिशाली ब्रिटिश सत्ता को भी घुटने टेकने को बिवश कर दिया। भारत का स्वंतत्रता संग्राम अद्भुत है। हमारे एक-एक वीर सपूत की संघर्ष गाथा रोंगटे खड़े कर देने वाली है। शहीद भगत सिंह राम प्रसाद विस्मिल, लाला हरदयाल, अरविन्द घोष व्  वीर सावरकर की परम्परा में थे जो केवल बंदूक की भाषा के लिए ही बल्कि अपने गम्भीर चिन्तन व् लेखन के लिए भी जाने जाते हैं। आईये! अपने साहस, शौर्य और सूझबूुझ के चलते सम्पूर्ण ब्रिटिश सम्राज्य को हिला देने वाले शहीद भगत सिंह के जीवन के कुछ प्रमुख प्रेरक प्रसंग उनके जन्मदिवस पर याद करने का प्रयास करें।
देशभक्ति और सांस्कृतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि- लायलपुर जिले (पाकिस्तान)  में चक बंगा नाम के गाँव में सरदार किशन सिंह व् विद्यावती के घर सितम्बर 28, 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ। ये परिवार में तीसरे पुत्र थे। उनके जन्म के समय ही पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह जेल से रिहा किये गये थे। जन्म के साथ ही अपने परिवार के लिए खुशी लाने के कारण उन्हें भागों वाला भी कहा जाता था। सम्पूर्ण परिवार ही पूरी तरह देशभक्ति के रंग में रंगा था। चाचा स्वर्ण जीत सिंह को अंग्रेजों के विरुद्ध जलूस निकालने के कारण डेढ़ साल की कैद हुई थी। जेल में ही उन्हें तपेदिक रोग हो जाने से उनकी मृत्यु हो गयी।  इनके दादा अर्जुन सिंह पक्के आर्य समाजी थे। परिवार पर आर्य समाज के प्रभाव के कारण घर में हवन आदि आम होते रहते थे। यहाँ क्रन्तिकारी यशपाल का संस्मरण प्रासंगिक है- सरदार किशन सिंह ने बीमे की एजेंसी ले रखी थी। उसके दफ्तर में अक्सर युवक आ कर बैठा करते थे। एक दिन यशपाल मेज पर बैठ कर कुछ लिख रहे थे। मेज के नीचे टीन की कोई वस्तु थी। अनजाने में उनके पैर उससे टकरा रहे थे। तभी एक बजुर्ग वहां आए और कुर्सी पर बैठ गये। यशपाल उनके आने से बेखबर, लिख़ने में व्यस्त टीन की वस्तु से पैर टकराये जा रहे थे।   सहसा गालिओं की जोरदार बरसात से यशपाल का ध्यान गलती की ओर गया। वास्तव मेज के नीचे टीन की वस्तु हवन कुंड था।
संस्कृत से प्यार-
भगत सिंह की ख्याति एक अच्छे विद्यार्थी की थी। डी ए वी स्कुल लाहौर में पढ़ते समय अपने परीक्षा परिणामों के सम्बद्ध में दादा जी को पत्र लिखा। ॐ से प्रारम्भ करके वो लिखते हैं कि संस्कृत में मेरे 150 से 110 अंक आये हैं। अंग्रेजी में 150 में से 68 अंक आए हैं"।
स्वाधीनता रक्त बहाए बिना नहीं मिलेगी-
जलियांवाला बाग नरसंहार से क्षुब्ध किशोर भगत सिंह ने अंग्रेजों को भारत से उठा बहार फैंकने का संकल्प ले लिया था। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन में सारा देश उदेलित हो रहा था। भगत सिंह ने आन्दोलन में भाग लेने के लिए 9 वीं कक्षा में स्कूल छोड़ दिया। वे जलूस निकालते और विदेशी वस्तुओं की होली जलाते। अभी वो कुछ अधिक कर पाते कि चौरा-चोरी घटना के कारण गाँधी जी ने आन्दोलन वापिस ले लिया। भगत सिंह के किशोर मन में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। उनको लगा कि गाँधी जी के लिए स्वाधीनता से ज्यादा महत्व अहिंसा का है। कुछ सिपाही उतेजित जनता के हाथों मर गये तो क्या भारत की आजादी का आन्दोलन बंद कर देना चाहिए? इतने विराट देश की मुक्ति के लिए क्या रक्तपात नहीं होगा? भगत सिंह के मन में देश की आजादी के लिए किसी भी कीमत पर चाहे वह अहिंसा ही क्यूँ न हो अंग्रेजों को देश से बाहर निकालने का संकल्प और दृढ हो गया।
क्रन्तिकारी-कठोर जीवन के व्रती-
जिनके कारनामों से अंग्रेज सरकार भी कांपती  थी, उनके पास खाने को रोटी तक नहीं होती थी। क्रन्तिकारी भगवान दास महौर ने लिखा है- सवेरे आजाद ने खाने के लिए कुछ रोटियां और गुड मंगवाया। आजाद केवल गुड और रोटियां खाएं यह बात भगत सिंह को चुभ रही थी। अतएव उन्होंने गुड में से एक डली उठा ली और हमें भी एक एक डली उठाने का इशारा किया। आजाद ने कहा - देखो! परेशान मत करो और भी बहुत काम करने हैं। मैं जो कुछ खाता हूँ जैसे खाता हूँ मुझे खाने दो। भगत सिंह नहीं माने। आजाद ने झुंझला कर सारा गुड फैंक दिया। साथियों ने मुश्किल से मनाया। आजाद फिर से खाने बैठ गये। भगत सिंह ने मुस्कराते हुए कहा कि अगर जिद ही है तो गुड धो तो लो जनाब! गुड धोया गया और आजाद सबके साथ रोटियां खाने बैठ गये।
साहिब, मेम और नौकर-
अंग्रेज अफसर सांडर्स को मार कर भागना कोई आसन काम नहीं था। भगत सिंह को लाहौर से निकालने के लिए एक अभिनव योजना बनाई गयी। भगत सिंह सिख थे। अंग्रेज पुलिस रेलवे स्टेसन पर सिख युवक की तलाश में थी। सब तरफ कड़ा पहरा था। इतने में हैट लगाये अंग्रेज अफसर, कंधे पर छोटा बालक और एक सुंदर मेम आए। उनके पीछे बिस्तर उठाये एक नौकर भी था। वे प्रथम श्रेणी के रिजर्व सीट से कलकत्ता जा रहे थे। कौन थे ये साहिब? साहिब थे अपने भगत सिंह, नौकर राजगुरु और मेम दुर्गा भाभी! सारी सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देकर ये सुरक्षित कलकत्ता पहुँच गये। अपने को चतुर समझने वाली ब्रिटिश सत्ता हाथ मलते रह गयी।
बम कैसे बनाया जाता है?
भगत सिंह अदालत में सजग और चौकन्ने थे। सरकार ने सरकारी गवाहों को क्रांतिकारियों का रह्श्य जान कर उन्हें अराजक तत्व सिद्ध करने के लिए तैयार किया था। भगत सिंह और उनके साथियों ने इस प्रकार जिरह की कि जनता उनका असली स्वरूप जान सके। इसके साथ ही नये क्रांतिकारियों को तैयार करना भी उनका लक्ष्य रहता था। सरकारी गवाह बने फणीन्द्र नाथ घोष गवाही देंने आए तो क्रन्तिकारी शिव वर्मा ने पूछा कि अगर तुम सच में हमारे साथ मिल कर बम बनाते थे तो बताओ बम कैसे बनाया जाता था? इस प्रकार उन्हें बिबश कर दिया कि बम बनाने की पूरी बिधि बताएं। यह सारी रिपोर्ट अख़बार में छपी और सारा देश जन गया कि बम कैसे बनाया जाता है।
अदालत में भी मस्ती
अदालत में दोपहर के खाने के समय क्रांतिकारियों से मिलने की अनुमति थी। श्रीमती सुभद्रा जोशी अपने संस्मरणों में लिखती है- उस समय खाने पीने का सामान देने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था परन्तु नियम था कि सारा सामान वहीँ खाना होता था। मैं प्रतिदिन एक दो चीजें ले जाती थी जो जेल में नहीं मिलती थी और जिन्हें सरदार भगत सिंह और उनके साथी बहुत पसंद करते थे। दहीं-बड़े सब बहुत पसंद करते थे। भगत सिंह केक बहुत चाव से खाते थे। एकदिन उन्होंने मुझे केक खिलाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसमे अंडा होने के कारण मैं नहीं खा सकी। दोपहर के खाने का यह डेढ़ दो घंटे का समय हंसी और दिल्लगी में बीत जाता था। मृत्यु जिनके सर पर मंडरा रही हो उन नो जवानों की जिन्दा दिली देखते ही बनती थी।
बेबे तू रोना नही-
मार्च 3 1931 को भगत सिंह अंतिम बार अपने परिवार से मिले। माता-पिता, दादा जी, चाची जी और भाई सभी तो थे सामने। पर सबसे आकुल व् अधीर थे सदा अर्जुन सिंह। उन्होंने ही तो इस कुल में क्रांति की ज्योति जलाई थी। वे भगत सिंह के पास गये कुछ कहना चाहा लेकिन कह न सके। लेकिन भगत सिंह एकदम सामान्य हो कर हंस हंस कर सबसे बातें कर रहे थे। अपनी माता जी से बोले- बेबे जी, दादा जी अब ज्यादा दिन जियेंगे नहीं। आप इनके पास ही रहना। यह भी कहा कि लाश लेने आप मत आना। कुलवीर को भेज देना। कहीं आप रो पड़ीं तो लोग कहेंगे की भगत सिंह की माँ रो रही है।
हम तो सफर करते हैं-
भगत सिंह ने अंतिम बार अपनी कोठरी की ओर निहारा। तभी आ गये दोनो जीवन साथी राजगुरु और सुखदेव। तीनों की दृष्टि मिली,तीनों गले मिले। भगत सिंह ने गाना शुरू किया - दिल से न निकलेगी वतन की उल्फत, मेरी मिटटी से खुशबुए वतन आयेगी। फांसी तलघर के समीप  गोरा डिप्टी कमिश्नर खड़ा था इन आजादी के दीवानों की दीवानगी देख कर परेशान था। भगत सिंह उससे बड़े स्नेह से अंग्रेजी में बोले- ' well Mr Magistrate you arw fortunate to see how Indian revolutionaries can embras death with pleasure for the sake of their suprem ideal.
भगत सिंह के जीवन के सैकड़ों प्रेरणादायक प्रसंग हैं जो आज के युवा को उद्येलित कर सकते हैं। आवश्यकता है इन भारत माता के वीर सपूतों का जीवन नई पीढ़ी के सामने लाया जाये। नशे और राग रंग में रंगी पंजाब की जवानी को अपने देशभक्त क्रांतिकारियों का जीवन दिशा दे सकता है। 

गुरुवार, 18 सितंबर 2014

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्र सेवा में बढ़ते कदम- लक्ष्य एक कार्य अनेक

कभी अनाम, अनजान, उपेक्षित और घोर विरोध का शिकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में चर्चा एवं उत्सुकता का विषय बना हुआ है। संघ की इस यात्रा में ध्यान देने योग्य है कि कांग्रेस सरकार द्वारा तीन तीन प्रतिबंधों, कभी अत्यंत शक्तिशाली और क्रूर रहे कम्युनिस्टों, ईसाई और इस्लामिक शक्तियों से एक साथ जूझते हुए आगे बढ़ा है। यह चमत्कार  संघ के स्वयंसेवकों की त्याग, तपस्या और बलिदान के चलते ही हो सका है। आज देश- विदेश के अनेक विश्व विद्यालयों में संघ पर शोध हो रहा है। जिस प्रकार गोमुख को देख कर हरिद्वार की विशाल गंगा या छोटे से बीज को देखकर विराट वटवृक्ष की कल्पना भी कठिन होती है वैसे ही विजयदशमी सन 1925 को नागपुर में डॉ. केशव् बलिराम हेडगेवार के साधारण से घर में 15/20 लोगों में प्रारम्भ हुए संघ से आज के विशाल जनांदोलन या राष्ट्रभक्ति के महाअभियान का रूप धारण कर चुके संघ की कल्पना करना भी कठिन है। आज संघ देशभक्तों की आशा तथा देश विरोधियों के लिए उनके रास्ते का रोड़ा बन गया है। संघ की साधारण सी दिखने वाली शाखा से अदभुत व्यक्तित्व पैदा हुए हैं। शाखा से प्रेरणा प्राप्त स्वयंसेवकों पर संघ को ही नहीं तो पूरे देश को गर्व है। सामान्य किसान- मजदूर, क्लर्क से लेकर प्रशासनिक अधिकारी हो, सेना -पुलिस में उच्च अधिकारी हों या इतना ही नहीं तो न्यायधीश से लेकर प्रधानमन्त्री तक स्वयंसेवक अपनी सेवाएं राष्ट्र को समर्पित कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि स्वयंसेवक अपनी प्रतिभा, कठोर परिश्रम एवं ईमानदारी के चलते लोगों के प्रेरणा स्रोत बने हुए हैं। संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार कहते थे कि संघ कुछ नहीं करेगा अर्थात केवल शाखा चलाएगा लेकिन स्वयंसेवक कुछ नहीं छोड़ेगा अर्थात देश और समाज के लिए आवश्यक हर कार्य करेगा। संघ की शाखा से देशभक्ति, अनुशासन तथा अपने समाज के प्रति अपनेपन का पाठ पढ़ कर स्वयंसेवक समाज जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं। यहाँ उन संगठनों की संक्षिप्त जानकारी दी जा रही है ताकि हम भी अपनी रूचि और क्षमता के अनुसार राष्ट्र सेवा में संघ के प्रत्यक्ष शाखा कार्य या फिर किसी संगठन में सक्रिय हो कर अपनी आहुति दे सकें।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद-
विद्यार्थियों की अथाह उर्जा को क्षुुद्र स्वार्थों की हल्की राजनीति से हटा कर राष्ट्र की सर्वांगिण उन्नति और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के मार्ग पर अग्रेसर करने के लिए 23 जून 1948 के दिन कुछ चिन्तन मननशील स्वयंसेवकों ने विद्यार्थी परिषद की स्थापना की। आज यह देश का सबसे बड़ा गैर राजनैतिक छात्र संगठन है। विद्यार्थी परिषद अपने अनुशासन, दायित्वबोध, नैतिक्ताबोध, सक्रियता और रचनात्मक कार्यों के लिए विख्यात है।
राष्ट्र सेविका समिति-
देश की महिला शक्ति के मनोबौद्धिक, शारीरिक एवं सामाजिक सांस्कृतिक उत्थान की योजना करते हुए उन्हें भी राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में सहभागी बनाने के उदेश्य से श्रीमती लक्ष्मीबाई केलकर ने संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार से परामर्श कर 1936 की विजयदशमी को राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना की। इस समय समिति की देश-विदेश में 500 से अधिक शाखाएं है तथा लाखों सेविकाएँ है।
विद्या भारती-
भारतीयता एवं राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत सर्वांगीण शिक्षा देने के लिए 1951 में प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना गोरखपुर में की गयी। प्रान्त में अन्य विद्यालयों के संचालन के लिए 1958 में उत्तर प्रदेश की शिशु शिक्षा प्रबंध समिति का गठन हुआ। इसी प्रकार अन्य प्रान्तों में भी कार्य प्रारम्भ हुआ। अखिल भारतीय स्तर पर सभी प्रांतीय समितियों के मार्गदर्शन करने के लिए विद्या भारती की 1977 में स्थापना हुई। आज विद्या भारती में शिशु वाटिकाओं एवं संस्कार केन्द्रों सहित 25 हजार से अधिक शिक्षण संस्थाएं, 2,50,000 आचार्य और 25 लाख से अधिक विद्यार्थी हैं। सरकार के बाद यह देश का सबसे बड़ा शिक्षा संगठन है।
अखिल भारतीय शिक्षण मंडल-
शिक्षा के क्षेत्र में भारतीय जीवन मूल्यों की स्थापना और राष्ट्र विरोधी प्रवृतियों के प्रतिरोध के लिए गठित शिक्षक संगठन। भारतीय परिवेश में आवश्यक शिक्षा के लिए शिक्षक और सरकार की भूमिका को लेकर अनेक सेमिनार, गोष्ठियों तथा शोध कार्य का संचालन।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद-
साहित्यिक क्षेत्र में भारतीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना को प्रोत्साहन देकर राष्ट्रीय विचारधारा को प्रभावी भूमिका में लाने 1996 में अखिल भारतीय साहित्य परिषद की स्थापना हुई। साहित्य परिषद भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के लिए संयुक्त मंच प्रदान करता है। आज साहित्य परिषद से उदीयमान साहित्यकार से लेकर अनेक प्रसिद्ध साहित्यकार जुड़े हैं।
संस्कृत भारती-
देववाणी संस्कृत को फिर से जन जन की भाषा बनाने के लिए संस्कृत भारती कार्य कर रही है। संस्कृत संभाषण शिविर, पत्राचार द्वारा संस्कृत प्रशिक्षण तथा संस्कृत ललित साहित्य सृजन आदि माध्यमों से निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रेसर है।
भारत विकास परिषद-
देश के उद्यमी और संपन्न वर्ग को राष्ट्र सेवा कार्य से जोड़ने और भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा में प्रवृत करने के लिए 1963 में डॉ. सूरज प्रकाश और लाला हंसराज गुप्त ने भारत विकास परिषद की स्थापना की। संपर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा और समर्पण ऐसे पांच सूत्रों पर आधारित परिषद की आज 1200 शाखाएं, 54 हजार परिवार और एक लाख 8 हजार सदस्य हैं।
राष्ट्रीय सेवा भारती-
वंचित वस्तियों में रहने वाले आर्थिक दृष्टि से पिछड़े और उपेक्षित बन्धुओं की सेवा और उत्थान के लिए संघ में सेवा विभाग बनाया गया है। स्वयंसेवकों के प्रयास से सेवा भारती के द्वारा एक लाख के लगभग सेवा कार्य चलाये जा रहे हैं। बाल संस्कार केंद्र, सिलाई केंद्र, नियमित स्वास्थ्य सेवा के लिए मोबाईल वैन, कम्प्यूटर प्रशिक्षण केंद्र आदि के द्वारा इस वर्ग में आर्थिक स्वाबलंबन और संस्कार देने का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा। कुंवारी माताओं द्वारा छोड़ दिए बच्चों के लिए मातरी छाया का जैसे कई अभिनव प्रकल्प चलायें जा रहे हैं।  इन सेवा कार्यों के परिणामस्वरूप लाखों ईसाई बन चुके हिन्दू दोबारा अपने धर्म में वापिसी कर चुके हैं और करोड़ों जाने से बच गये हैं।
दीनदयाल शोध संस्थान-
स्वर्गीय दीनदयाल जी की पुण्य स्मृति में 1972 में स्व. नाना जी देशमुख ने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। बौद्धिक क्रिया-कलापों के आलावा ग्राम विकास के कार्य इस संस्थान की प्रमुख गतिविधि है। उत्तर प्रदेश के गोंडा, चित्रकूट
उड़ीसा, बिहार के भी एक एक जिले में समग्र ग्राम विकास के प्रकल्प चल रहे हैं। मध्य प्रदेश में चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय इस संस्थान का विशिष्ट प्रकल्प है।
विश्व हिन्दू परिषद-
हिन्दू समाज के विश्व भर में फैले सभी मत सम्प्रदायों में एकता स्थापित कर संपूर्ण समाज को सुसंगठित, एकात्म और वास्तविक अर्थ में धर्म प्रवण बनाने के उदेश्य से संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरु जी की प्रेरणा से 1965 जन्माष्टमी को अनेक महाविभुतियों के सानिध्य में स्थापना हुई। श्री रामजन्मभूमि के आन्दोलन का सफल नेतृत्व कर यह संगठन अपनी छाप छोड़ चुका है। विश्व हिन्दू परिषद ईसाई मुसलमान बन चुके अपने लाखों बन्धुओं की हिन्दू धर्म में वापिसी के अलावा हजारों सेवा कार्य भी चला रहा है।
वनवासी कल्याण परिषद-
दुर्गम वनों और पर्वतों में आधुनिक विकास से दूर, साधनहीन जीवन जी रहे वनवासियों की सेवा करते हुए उन्हें उन्नति के मार्ग पर अग्रेसर करते हुए देश की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्येश्य से 1952 में वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की गयी। देश के कोने-कोने में 12000 के लगभग सेवा कार्यों के द्वारा वनवासी कल्याण आश्रम आज वनवासियों की आशा का केंद्र बन चुका है। वनवासी क्षेत्र से भी समाज सेवा के लिए जीवन अर्पित करने वाले युवकों को तैयार कर कार्य में लगा लेना वनवासी कल्याण आश्रम की बड़ी उपलब्धी कही जा सकती है।
विज्ञान भारती-
भारतीय ज्ञान विज्ञान की पुन: प्रतिष्ठा और स्वदेशी विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी के विकास के लिए वैज्ञानिकों की संस्था। प्रसिद्ध वैज्ञानिक सुपर कम्प्यूटर के खोजकर्ता डॉ. विजय भाटकर वर्तमान में विज्ञान भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
पूर्व सैनिक सेवा परिषद-
पूर्व सनिकों के पुनर्वसन में सहायता करने तथा उनकी देशभक्ति,अनुशासन और दक्षता का उपयोग देश व् समाज सेवा में करने को समर्पित संगठन।
क्रीड़ा भारती-
अगर आप खेल में रूचि रखते हैं तो आपके लिए समाज सेवा के लिए क्रीडा भारती एक अच्छा विकल्प हो सकता है।  दिसम्बर 3, 1992 को पुणे में स्थापित क्रीडा भारती का उदेश्य खेल संस्कृति का विकास, खेल संगठनों में समन्वय, भारतीय खेलों, सूर्य नमस्कार, योगासन, भारतीय व्ययाम पद्धति को प्रोत्साहन देने के साथ साथ खिलाडियों में राष्ट्रीय भावना जगाना है।
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद-
देश की न्याय-प्रणाली में भारतीय संस्कृति के अनुरूप सुधार करवाने और प्रभावी न्याय-प्रक्रिया के निर्माण का कार्य करने के लिए बना विधिवेताओं का संगठन है अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद।
अखिल भारतीय सहकार भारती-
उत्पादक, वितरक और ग्राहक के संबधों का समन्वय कर सहकारिता के द्वारा अर्थ व्यवस्था को पुष्ट करने के लिए बनाई गयी संस्था।
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत-
ग्राहकों का प्रबोधन और संगठन कर अर्थ व्यवस्था में सुधार के लिए बनाई गयी संस्था।
लघु उद्योग भारती-
भारतीय अर्थ  आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त लघु उद्योगों की कठिनाइयां दूर कर उन्हें विकास के सफल बनाने में सहायता देने के लिए लघु उद्योग भारती की स्थापना की गयी।
प्रज्ञा प्रवाह-
वैचारिक आन्दोलन को राष्ट्रीय रंग में रंगने के लिए बुद्धिजीवीयों के लिए एक प्रभावी मंच है। प्रज्ञा प्रवाह के मार्गदर्शन में देश में अलग अलग नामों से मंच सक्रिय है। पंजाब में पंचनद शोध संसथान संस्थान कार्य कर रहा है।

सीमा जागरण-
राजस्थान में 1985 में सीमावर्ती क्षेत्र ग्रामों में जन जागरण से प्रारम्भ। 2000 में अखिल भारतीय स्वरूप। नाम सीमा जागरण। सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों में राष्ट्र की सुरक्षा हेतु जन जागरण करना सीमा जागरण का प्रमुख कार्य है। पंजाब में सरहदी लोक सेवा समिति के नाम से चल रहा है।
स्वदेशी जागरण मंच-
वैश्वीकरण के नाम पर आर्थिक साम्राज्यवाद थोपने के विदेशी षड्यंतत्रों से राष्ट्र समाज को सचेत करके स्वदेशी के प्रति प्रेम जागृत करने वाला मंच है।
भारतीय मजदूर संघ- पूंजीपतियों के स्वार्थ पर आधारित व्यवस्था के विरोध में खड़े श्रमिकों और उनके नेताओं के स्वार्थ पर ही केन्द्रित संगठनों के स्थान पर, उद्योग से जुड़े सभी लोगों के संयुक्त ओद्योगिक परिवार के हितों व् राष्ट्रहित को समर्पित श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संगठन की स्थापना 23 जुलाई 1955 को हुई। संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं चिंतक दत्तोपंत ठेगडी इस संगठन संस्थापक थे। अधिकार के साथ कर्तव्य को भी जोड़ने वाला, लाल झंडे के स्थान पर भगवा झंडा को अपनाने वाला और मई के स्थान पर विश्वकर्मा जयंती को श्रमिक जयंती मानने वाला भारतीय मजदूर संघ देश का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन है। इसकी सदस्यता संख्या एक करोड़ से भी अधिक है।
भारतीय किसान संघ-
राष्ट्रहित के साथ किसान हित की रक्षा और कृषक संगठन के स्थापित संस्था जो किसानों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयत्नशील है। इस समय इसके 8 लाख सदस्य हैं।
भारतीय इतिहास संकलन योजना-
बाबा साहिब आप्टे स्मारक समिति द्वारा संचालित प्रकल्प ' भारतीय इतिहास संकलन योजना' भारत के गत 5000 वर्ष के तथ्यपरक इतिहास के शोधन एवं लेखन को समर्पित है। महाभारत की कालगणना और सरस्वती नदी के बिलुप्त प्रवाह का अनुसन्धान समिति के विशेष कार्यों में से एक है।
राष्ट्रीय सिख संगत-
दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की भावना- जगे धर्म हिन्दु, सकल भन्ड भाजे' के अनुरूप सिख समुदाय की शेष हिन्दू समाज से एकता-एकात्मता पुष्ट करके विधर्मी षड्यंत्रों को विफल करने को समर्पित  संगठन।
भारतीय जनता पार्टी-
नेहरु मंत्रीमंडल से त्यागपत्र देकर डॉ. श्यामा प्रशाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। इसके लिए उन्होंने तात्कालीन संघ प्रमुख श्री गुरु जी से कुछ कार्यकर्ता मांगे। संघ ने पंडित दीन दयाल जी, श्री अटल जी और लाल कृष्ण अडवाणी जैसे कार्यकर्ता दिए। 1953 में डॉ. मुखर्जी के कश्मीर कारागार में हुए दुखद देहांत के बाद स्वयंसेवकों को इस दल को आगे बढ़ाने का दायित्व लेना पड़ा। 1975 में आपातकाल से निपटने के लिए उस समय के चार दलों को मिला कर जनता पार्टी का गठन किया गया। 1980 में जनता पार्टी के बिघटन के बाद श्री अटल विहारी बाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। इस छोटी सी अबधि में स्वयंसेवकों के कठोर परिश्रम से यह दल देश की बागडोर संभाल चुका है। आज एक स्वयंसेवक श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश विश्व गुरु बनने की राह में अग्रेसर है।
विवेकानन्द केंद्र-
कन्याकुमारी के पास समुद्र के बीच विवेकानन्द शिला पर स्वामी विवेकानन्द का भव्य स्मारक बनाने के लिए गठित विवेकानन्द जन्म शताब्दी समारोह समिति से ही विवेकानन्द केंद्र की स्थापना की 1963 में प्रक्रिया शुरू हो गयी थी। इसके संस्थापक संघ के पूर्व सरकार्यवाह श्री एकनाथ रानाडे थे। विवेकानन्द केंद्र देश के कोने कोने में (विशेषकर उत्तर- पूर्वांचल में ) चरित्र निर्माण, संस्कार जगाने और अनेक प्रकार के रचनात्मक कार्यों में सलंग्न है। सैकड़ों युवक युवतियां अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र को समर्पित कर केंद्र के माध्यम से सेवा में जुटे हैं।
हिन्दू जागरण मंच-
राष्ट्र विरोधी तत्वों की घुसपैठ, तोड़फोड़, अराजकता, अपहरण उपद्रव और लव जिहाद इत्यादि घटक गतिविधियों पर सतर्क दृष्टि रखने के लिए विभिन्न प्रान्तों अलग अलग मंच बनाये गये हैं। तमिलनाडू में हिन्दू मून्नानी,दिल्ली में हिन्दू जागरण मंच और महाराष्ट्र में हिन्दू एकजुट मच आदि आदि।
आरोग्य भारती-
भोपाल में 2004 में स्थापना। स्वास्थ्य चेतना जागरण,आरोग्य शिक्षण,आरोग्य संवर्धन, रोग प्रतिबन्धन तथा भारत में प्रचलित सभी प्रकार की चिकित्सा पद्धतियों में आरोग्य के भारतीय चिन्तन का जागरण।
प्रकाशन-
किसी समय बिना कागज कलम से कार्य करने वाले स्वयंसेवक आज अनेक बड़े और प्रतिष्ठित प्रकाशन चला रहे हैं। 1947 जुलाई में स्व. दीनदयाल जी ने अटल जी को साथ लेकर मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म' को प्रारम्भ किया। बाद में पांचजन्य तथा आर्गेनाइजर सप्ताहिक शुरू हुए। इसके अतिरिक्त विभिन्न प्रकार का राष्ट्र
उपयोगी साहित्य के प्रकाशन प्रारम्भ हुए। सुरुचि प्रकाशन (दिल्ली), लोकहित प्रकाशन(लखनऊ), अर्चना प्रकाशन( भोपाल) एवं भारत भारती प्रकाशन (नागपुर)आदि अनेक प्रकाशन कार्य कर रहे हैं। लगभग 30 से ज्यादा सप्ताहिक व् मासिक पत्र पत्रिकाएँ निकल रही हैं। देश में रेडियो, टी वी और अख़बार से अधिक इन पत्र- पत्रिकाओं की पहुँच है।
हिन्दूस्थान समाचार-
हिंदी व् विभिन्न प्रांतीय भाषाओँ में समाचार संकलन का पहला संगठन 1949 में प्रारम्भ हुआ। समाचार जगत में प्रभावी भूमिका निभाने के बाद राजनीतक षड्यंत्र का शिकार होकर 1975 आपातकाल के समय बंद हो गया। पुन: सन 2000 में शुरू किया गया।
अखिल भारतीय शैक्षिक महासंघ
हरिद्वार में 1992 में स्थापना। शिक्षा के लिए शिक्षक और शिक्षक के लिए शिक्षक संगठन। शिक्षकों की मांगों के लिए संघर्ष करने के साथ साथ उनके सर्वांगीण विकास के लिए अनेक कार्यकर्मों के साथ कार्यरत है।
National Medicos Organisation
चिकित्सकों को समाज सेवा के लिए प्रेरित करने के लिए 1997 में प्रारम्भ। सेवा वस्तियों तथा वनवासी क्षेत्रों में चिकित्सा सेवा प्रदान करना के साथ स्वास्थ्य सम्बधी मार्गदर्शन करना। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के मन में स्वदेशी भाव जागृत करना। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में हो रहे नवीन अनुसन्धानों को चिकित्सा छात्रों तथा चिकित्सकों तक पहुँचाने में सक्रिय।
भारतीय कुष्ठ निवारक संघ-
चम्पा (छ्तीसगढ़ ) में 1962 में कुष्ठ रोगियों की सेवा एवं पुनर्वसन के लिए प्रारम्भ। पंजाब में कोटकपुरा में निरोग बाल आश्रम सेवारत है। कुष्ठ रोग पीडितों के अनेक बच्चों को पढ़ा लिखा कर स्वावलंबी बना चुका है।
सक्षम-
सक्षम अर्थात समदृष्टि क्षमता विकास एवं अनुसन्धान मंडल की मान्यता है कि विकलांग परिवार का अंग है समाज पर बोझ नहीं। अगर उनको अपनी योग्यता, प्रतिभा तथा क्षमता  दिखाने का अवसर मिले तो वे भी स्वावलम्बी बन कर राष्ट्र और समाज सेवा में अपना योगदान कर सकते हैं। 1997 से दृष्टिहीन कल्याण संघ के नाम  से कार्य करने के बाद 20 जून 2008 को सक्षम नाम से  नागपुर में स्थापना हुई।
उपरोक्त संगठनों के आलावा प्रान्त और स्थानीय स्तर पर अनेक संगठनों का सफल संचालन स्वयंसेवक कर रहे हैं।
राष्ट्र और समाज के लिए आवश्यक कुछ महत्वपूर्ण कार्य संघ की कुछ गतिविधि के रूप में भी चल रहे हैं।
ग्राम विकास-भारत ग्राम प्रधान देश है। अत: ग्राम का विकास ही सही अर्थ में देश का विकास है। मन्दिर व् ग्राम देवता के आधार पर आत्मीय और एकरस समाज भाव निर्माण करना, ग्राम के प्रति अपनत्व, मिटटी, जल, पशु पक्षी आदि के संरक्षण हेतु नागरिक कर्तव्य व् प्रकृति के संसाधनों के उपयोग का ज्ञान। ग्राम स्वच्छता और जैविक खेती और गाय को आधार बना कर ग्रामवासियों के द्वारा ग्राम का विकास। 
गोसेवा एवं संवर्धन-
गाय हमारे समाज में अतीव श्रद्धा एवं कृषि व् रोजगार का आधार रही है। आधे अधूरे भारतीय ज्ञान तथा पश्चिम के अन्धानुकर्ण के आधार पर बनी योजनाओं के कारण गाय को हमने लगभग समाप्त ही कर दिया। आज भारत में गाय की बहुत सारी नस्लें ही लुप्त हो गयी हैं। गोपाल के देश में गाय की हत्या निर्बाध रूप से चल रही है। इस परिस्थिति में सब समस्याओं से मुक्ति के लिए जन जागरण और प्रशिक्षण के द्वारा गोभक्त, गोसेवक, गोपालक, गोरक्षक खड़े करना तथा गो आधारित जैविक कृषि, पञ्चगब्य चिकित्सा व् रोजगार आदि से स्वावलम्बन लेन की दिशा में पर्यत्नशील है।
परिवार प्रबोधन-
हिन्दू संस्कृति सनातन और शाश्वत है। अपनी संस्कृति के इस अनोखे सामर्थ्य के अनेक कारणों में हमारी परिवार व्यवस्था भी प्रमुख कारण है। परिवार की दिनचर्या, संभाषण, आदतें सही दिशा में विकसित हों। अपनी परिवार व्यवस्था तथा समाज व्यवस्था सक्षम और सुदृढ़ हो इसी उद्येश्य को लेकर यह विभाग सक्रिय है।
सामाजिक समरसता-
समाज में शक्ति, सामंजस्य एवं एकात्मता के लिए समरसता की आवश्यकता रहती है। समरसता केवल कानून से नहीं आती। बाल विवाह, अस्पृस्यता आदि कुरीतियों अनेक कानूनों के बाबजूद कम -अधिक आज भी देखी जा सकती हैं। समरसता के लिए सामाजिक मानसिकता, अपनत्व का भाव जागरण तथा हम सब एक भारतमाता के पुत्र होने के कारण सगे भाई बहिन हैं इसकी अनुभूति करना सामाजिक समरसता का प्रमुख कार्य है।
धर्म जागरण विभाग-
अपने देश में मतांतरण की समस्या हिन्दू समाज के अस्तित्व से जुडी है। इस्लाम तथा ईसाई शक्तियों ने मतान्तरण कर, हिन्दुओं की संख्या घटाई है। हिन्दू समाज की संख्या कम होने के कारण देश का अनेक बार विभाजन हो चुका है। संभावित मतान्तरण से हिन्दू समाज को बचाना, मतान्तरित बन्धुओं को वापिस हिन्दू समाज में लाना धर्म जागरण विभाग का उदेश्य है।
आप अभी बन्धु -बहिनों से निवेदन है कि राष्ट्र को विश्व गुरु बनाने के पवित्र लक्ष्य की प्राप्ति के लिए चल रहे संघ के इस महा अभियान में हम शामिल हों। अपनी रूचि और क्षमता के अनुसार किसी क्षेत्र और संगठन का चुनाव कर राष्ट्रसेवा में अपनी सेवा अर्पित करें। आज प्रत्येक नागरिक
की इस राष्ट्रयज्ञ में आहुति डलना समय की मांग है।