सोमवार, 24 मई 2010

जहाँ हृदय की विशालता के आगे बौनी हो जाती है गरीबी

अपने प्रवास में अनेक प्रकार के अनुभव आते रहते हैं । कई बार समाज में चहूँ और व्याप्त आर्थिक असमानता को देख कर  मन बेचैन हो उठता है । परम पिता परमेश्वर  की रचना पर कभी रोष तो कभी हंसी आती है। कोई महलों में जीवन के सब सुखों का भोग करता है तो कोई बेचारा रोटी के लिए संघर्ष करते करते ही जिन्दगी गुज़ार देता है । विधि की एक और बिडंबना ध्यान खींचती है जिनके पास दिल है वहां सामर्थ्य नहीं और जहाँ सामर्थ्य वहां दिल नदारद दीखता है । काश कहीं यह विरोधावास दूर हो जाय तो संसार का नक्शा ही कुछ दूसरा हो । पिछले दिनों संघ शिक्षा वर्ग की तैयारी के सिलसिले में दो अलग अलग दृश्यों ने मन में हलचल पैदा कर दी उसी को आप सबसे साँझा कर रहा हूँ । एक घर में सदस्यों से ज्यादा कमरे और कारें ,सुख समृधि की वर्षा सब देख कर देश में आ रही खुशहाली को लेकर मन प्रसन्न हो उठा । यद्यपि इस परिवार में खुशहाली और दिल दोनों का सुंदर सुमेल है। इसी दिन शाम को दूसरे परिवार में जो देखा उससे प्रसनता की लहरें गायब हो गईं । सब देख कर दिल में एक हूक सी उठी आखिर कब सुख और समृधि इनके दरवाजे पर दस्तक देगी ? एक १०/१२ का कमरा उसी में सारा परिवार , रसोई ,स्नानागार, वच्चों का अध्ययन कक्ष --आखिर कैसे गुजारा चलता होगा ? कैसे बच्चे पढाई करतें होंगे ? यह सब सोच कर मन बेचैन हो गया । परिवार में व्याप्त घोर आर्थिक आभाव का मजाक उड़ाते हुए  गृहस्वामिनी बहिन जी के व्यवहार में असली भारत प्रकट होने को व्याकुल दिख रहा था । अपनी सब तरफ से झांकती गरीबी से व्यथित होने के बाद भी सब का भरपूर  स्वागत करने की उसकी उत्सुकता व् बेचैन  कई कार कोठी वालों को भी शर्मिंदा कर रही थी । वर्ग का खर्चा आदि वताने में हमे संकोच हो रहा था । हमारी दुविधा को  भांपते हुए वह तुरंत बोली , ' आप इस का नाम लिख लो पैसे का इंतजाम कर लूंगी । बेटा आईटी पार्क मै दिहाड़ीदार है । "छूटी का क्या ?"पूछने पर बोली ,' सब हो जायेगा । आप चिंता मत करिये ।"इस समय मन में विचार आ रहा था कि इस परिस्थिति में बेटे को नौकरी की कीमत पर केम्प में भेजना क्या किसी  माँ का बेटे को युद्ध में तिलक कर भेजने से कम है ? एक और शंका का उत्तर मिल गया कि आखिर अधिकांश महापुरुष झोंपड़ों में ही क्यों जन्म लेतें हैं ? लेकिन इस  का अर्थ देश में महापुरुष ज्यादा पैदा हों इसलिए  झोंपडिओं  की  संख्या बढाना नहीं है बल्कि झोंपड़ी की उदारताऔर अन्य मानवीय मूल्यों  को महल तक पंहुचाने की है .

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