बदलते समय के साथ प्रत्येक जीवमान ईकाई को बदलना पड़ता है। यह एक शाश्वत सत्य है कि समय के गतिमान प्रवाह के साथ कदम से कदम मिला कर जो नहीं चल पाता वो दुनिया के इस खेल से बाहर हो जाता है। इसको यूं भी कहा जा सकता है कि समय उसको खेल से ही बाहर कर देता है। आज की परिस्थिति में समय के साथ कदम ताल करने में विद्यालय के प्रधानाचार्य को सबसे ज्यादा परिश्रम करना पड़ रहा है। आज का युगधर्म है कि हमें अपने कर्मक्षेत्र में अपने परिश्रम, प्रतिभा और परिणाम के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करानी ही होगी। कहा भी जाता है कि परिणाम के बिना तो घरवाली भी सम्मान नहीं देती फिर ये दुनिया तो दुनिया है । क्योंकि आज का युवा प्रधानाचार्य पैकेज भी अच्छा चाहता है ( इस में कुछ गलत भी नहीं) और सम्मान भी प्राचीन गुरु का चाहता है। इस सब में दुःखद पहलू यह है कि युवा प्रधानाचार्यों में छात्र, समाज व राष्ट्र समर्पित जीवन जीने की मानसिक तैयारी या सिद्धता बहुत कम में देखी जा रही है। शिक्षा क्षेत्र में अपने गत तीन वर्षों के अल्प अनुभव के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि युवा पीढ़ी के प्रधानाचार्य को छात्रों एवम समाज के मन मे सम्मान का स्थान पाने के लिए बहुत परिश्रम करना होगा। इसके लिए उसे अपनी दृष्टि पूर्णतः बदलनी होगी। प्रधानाचार्य का कार्य अत्यंत श्रेष्ठ, महत्वपूर्ण और नॉकरी से बहुत ऊपर है। पद, प्रतिष्ठा व पैसा उसके समर्पित जीवन का सहज परिणाम होने वाला है। इसके विपरीत इन सब के पीछे दौड़ने से पद और पैसा तो शायद मिल भी जाए लेकिन प्रतिष्ठा तो उसके लिए दिवास्वप्न मात्र बन कर रह जाएगी। प्रधानाचार्य को समझना होगा कि राष्ट्र का भावी भविष्य उसके हाथों से हो कर निकल रहा है। प्रधानाचार्य को एक-एक छात्र को तराशने, उसके अंदर के महामानव को प्रकट करने में सक्षम राष्ट्रशिल्पी आचार्य दीदियों का नेतृत्व करना होता है। आज के सामाजिक एवम आर्थिक परिवेश में छात्र एवम समाज समर्पित आचार्य दीदियों का समूह निर्माण करना प्रधानाचार्य के लिए सबसे बड़ी चुनोति होती है। यह सब करने के लिए पहल उसे स्वयं से करनी होती है। हम सब जानते हैं कि व्यक्ति का आचरण बड़े लम्बे एवम दार्शनिक भाषण से कहीं ज्यादा प्रभावकारी होता है।
प्रधानाचार्य को नॉकरी की आत्मघाती मानसिकता से बचना होगा- अंग्रेजों के समय पनपी यह नॉकरी की मानसिकता अत्यंत विचित्र है। हम अपने घर मे मजदूर लगाते हैं तो उससे बहुत कुछ चाहते हैं और हम कहीं काम करते हैं तो हमारी दृष्टि ओर तर्क पूर्णतः बदल जाते हैं। नॉकरी की मानसिकता में दोनों कर्मचारी और मालिक एक दूसरे को चकमा देने में दिमाग लगते रहते हैं। वास्तव में अंग्रेजों के समय क्योंकि हमें अंग्रेजों की नॉकरी करनी पड़ती थी और अंग्रेज से लोग नफरत करते थे इसीलिए उनके प्रति हमारी मानसिकता विकृत होना स्वभाविक ही था। उस स्थिति में हम अंग्रेजों को छकाने और अंग्रेज हमारा खून चूसने पर स्वयं को शाबाशी देता था। हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि स्वतन्त्रता के इतने वर्षों बाद भी इस नॉकरी की मानसिकता से ऊपर न उठ पाने से हमारा बहुत अहित हुआ है। नॉकरी में व्यक्ति अपनी शारीरिक , मानसिक एवम बौद्धिक प्रतिभा का सीमित ( जितने कम से कम से काम चल जाए) ही उपयोग करता है। इस सोच का उस व्यक्ति की प्रगति पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसा व्यक्ति जीवन भर भाग्य, भगवान और मालिक को कोसने में ही अपनी प्रतिभा का उपयोग करता रहता है। और अपने पिछड़ने के लिए सारी कायनात को ही दोषी ठहराता रहता है। दुर्भाग्य से आजादी के बाद भी शासन और नियोक्ता के प्रति हमारी मानसिकता नहीं बदली। हमारे देश मे कम्युनिष्टों ने इस सोच को और हवा पानी दिया। सरकारी नॉकरी लगते ही व्यक्ति कर्तव्य भूल कर अधिकारों की पिटारी खोल कर बैठ जाता है। परिणामस्वरूप धीरे धीरे सरकारी क्षेत्र सब जगह घाटे में जाने लगा, मजबूर हो कर सरकार को सब जगह से अपने हाथ खींचने पड़े। कम्युनिस्टों द्वारा प्रेरित अधिकारों की रट लगाने वाला सामान्य व्यक्ति बेचारा फिर निजी क्षेत्र में शोषण की भेंट चढ़ गया। स्थिति न्यूनाधिक 'न खुदा ही मिला न बिसाले सनम... ' वाली ही हुई। कर्मचारी और नियोक्ता दोनों को समग्रता से सोचना होगा। दोनों को समझना होगा कि एक दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं।
युग परिवर्तनकारी प्रधानाचार्य बनने में सहायक विंदु- वैसे तो सफल प्रधानाचार्य बनना एक लंबी साधना का परिणाम है। इसके लिए कोई शॉर्टकट नहीं हो सकता तो भी कुछ विंदु इसमे सहायक अवश्य हो सकते हैं। प्रधानाचार्य अपनी साधना का प्रारम्भ विद्यालय में सबसे पहले आना और सबसे बाद विद्यालय छोड़ने से कर सकता है। सभी आचार्य/दीदियां तथा अन्य सहयोगी कर्मचारी टीम के रूप में कार्य करें इसके उसे प्रेरणा का केंद्र बनना होता है। उसे विद्या मंदिर परिवार प्रमुख के रुप में सभी का मन जीतना होता है। सफल प्रधानाचार्य का सहयोगी टीम के मन मे सम्मानमिश्रित भय रहना आवश्यक है। प्रत्येक छात्र के जीवन मे रुचि लेना और अभिभावकों से निरन्तर सम्पर्क में रहना प्रधानाचार्य को बल प्रदान करता है। विद्या मंदिर एवम छात्र विकास के लिए निरन्तर प्रयासरत रहना , नए नए प्रयोग करते रहना सफल प्रधानाचार्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। विद्या मंदिर को समाज जागरण एवम समाजिक चेतना का केंद्र बनना आवश्यक होता है। अपनी प्रशंसा स्वयं करने से बचते हुए अपने कार्यों को बोलने देना चाहिए। प्रधानाचार्य के बहुविध कार्यों के योग्य सम्पादन के लिए उसे कल्पक, योजक एवम कुशल प्रशासक बनना होता है। दैनिक, साप्ताहिक एवम मासिक कार्यों की सूची बना कर उनके सम्पादन पर केंद्रित करना होता है। विद्यालय के कलेंडर पर नजर जमाए रखनी पड़ती है। समाज से योग्य, प्रतिभा सम्पन्न एवम प्रतिष्ठित लोगों को छात्रों के समक्ष निरन्तर लाते रहने से एक ओर जहां छात्रों के समुचित विकास को बल मिलता है वहीं विद्यालय के लिए सहयोगी वर्ग खड़ा होता है। प्रबन्ध समिति से तालमेल बैठाना प्रधानाचार्य की कुशलता का परिचायक होता है।
लक्ष्य समर्पित जीवन सफल प्रधानाचार्य के लिए पूर्व शर्त- लक्ष्य समर्पित व्यक्ति के लिए कुछ भी असम्भव नहीं होता। संघ संस्थापक पूज्य डॉक्टर हेडगेवार कहते थे कि हम महान लक्ष्य को समर्पित साधारण लोग हैं। महान लक्ष्य कब हम में महानता के अंश उतपन्न कर देता है हमें भी पता नहीं चलता।' यह सत्य भी हमें स्वीकरना होगा कि हमारे समाज के अन्तःकरण मे ' सेवा परमो धर्मों' की धारणा अत्यंत गहरी बैठी है। समाज समर्पित जीवन जीने वाले आचार्य व प्रधानाचार्य आज भी समाज जीवन को दिशा देने में सक्षम हैं और दिशा दे भी रहे हैं। विद्या भारती की पाठशाला से निकले सैकड़ों प्रधानाचार्य आज राष्ट्र एवम समाज जीवन को दिशा दे ही रहे हैं। विद्या भारती सृष्टि के बाहर भी अनेक प्रधानाचार्य समाज और राष्ट्र जीवन के लिए श्रद्धा, आशा व विश्वास का केंद्र बने हुए हैं। यह सब उनकी लम्बी साधना के फलस्वरूप ही हो सका है। ऐसा विराट व्यक्तित्व पाने के लिए प्रधानाचार्य को अपने कार्य को सही अर्थों में (अक्षरशः ) पूजा मानना होगा। एक बार दृष्टि बदली तो फिर सारा परिदृश्य बदल जाता है। किसी ने ठीक ही तो कहा है- नजरें बदली तो नजारे बदल गए, किश्ती बदली तो किनारे बदल गए। प्राचीन काल मे हमारे प्रधानाचार्य केवल विद्यालय ही नहीं बल्कि पूरे समाज के प्रमुख व आदरणीय हुआ करते थे। और हमें यह समझना होगा कि यह आदर उनके विराट व्यक्तित्व के कारण ही प्राप्त था। राजा भी उनसे समय ले कर मिला करते थे। लोग घर परिवार, नॉकरी से लेकर जीवन की सब समस्याओं के हल के लिए प्रधानाचार्य की ओर देखते थे। आज प्रधानाचार्य को वह 'सम्मानजनक' स्थान प्राप्त करना ही होगा केवल अपने लिए नहीं बल्कि समाज के स्वस्थ एवम दीर्घ जीवन के लिए यह अत्यंत आवश्यक है। वर्तमान में समाज मे जितनी भी समस्याएं या परेशानियां - जैसे बलात्कार, भृष्टाचार, टूटते परिवार या तेजी से फैलते वृद्धाश्रम ये सब मां की गोद, अध्यापक की कक्षा या सन्यासी की ध्यान साधना की असफलता ही तो है। इन सबको ठीक करने की शुरुआत हमारे अध्यापक को छात्र की अंगुली पकड़ कर जीवन के नए पाठ नई पद्धति से पढ़ाने से करनी होगी। क्योंकि मां, सन्यासी, राजनेता से लेकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अच्छा या खराब प्रदर्शन करने वाले लोग हमारे अध्यापकों के व्यक्तित्व का विस्तार या प्रकटीकरण मात्र ही तो है।
सोमवार, 9 अक्टूबर 2017
***छात्र, विद्यालय एवम समाज समर्पित प्रधानाचार्य समय की मांग ***
सोमवार, 25 सितंबर 2017
सेना और संघ को देश सेवा का सामान माध्यम मानते थे गगनेजा जी
गुरुवार, 29 जून 2017
बहुत नाज उठा लिए तेरे ये जिंदगी
बहुत नाज उठा लिए तेरे ये जिंदगी, लगता है मैं तेरे काबिल नहीं,
निभेगी नहीं कत्तई शायद हमारी, बेहतर होगा तू मेरा हिसाब कर दे ,
हमारा मिलना महज एक संयोग था, ये तो तू भी जानती है
साथ निभाने की कोशिश ईमानदार थी ये तो तू भी जानती है।
रिश्ते मिलना और निभना एक संयोग है ये तो तू भी मानती है
लाख जतन से भी नियति से जीतना कठिन है ये तो तू भी जानती है
वैसे मुझे तो कोई शिकवा या शिकायत नही है तुझसे, ये जिंदगी
क्या करूँ तेरे रोज रोज के दुख औऱ रोने से परेशान हूं ये जिंदगी
बहुत हो गया तेरी आँखों मे आंसू अब देखे नहीं जाते, ये जिंदगी
खुशी न दे सके तुझे मेरा यह साथ, तो जा बिछुड़ जा, ये जिंदगी
इस मोड़ पर पटक दिया तूने, तू ही बता मैं क्या करूँ? कहां जाऊं?
छोड़ साधना खुदा की अब संसार सागर में गोते लगाऊं, डूब जाऊं?
तूने तो वायदा किया था खुश रहने और मुझे खुश रखने का ये जिंदगी
मेरा साथ बस एक साधना है समझ ले, सोच ले औऱ बता दे ये जिंदगी
बुधवार, 17 अगस्त 2016
*बंटवारे का दर्द
डायरेक्ट एक्शन’ का डर...!
- प्रशांत पोल
हमारे देश में जब १८५७ का स्वातंत्र्य युध्द समाप्त होने को था, उस समय अमरीका का दृश्य बड़ा भयानक था. १८६१ से १८६५ तक वहां गृहयुध्द चल रहा था. अमरीका के ३४ प्रान्तों में से दक्षिण के ११ प्रान्तों ने गुलामी प्रथा के समर्थन में, बाकी बचे (उत्तर के) प्रान्तों के ‘यूनियन’ के विरोध में युध्द छेड़ दिया था. उनका कहना था, ‘हम विचारों के आधार पर देश चलाएंगे. इसलिए हमें अलग देश, अलग राष्ट्र चाहिए..!’
वह तो भला था अमरीका का, जिसे अब्राहम लिंकन जैसा राष्ट्रपति उस समय मिला. *लिंकन ने अमरीका के बंटवारे का पूरी ताकत के साथ विरोध किया. गृहयुध्द होने दिया, लेकिन बंटवारे को टाला..! और आज..? आज अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकत हैं.*
यदि १८६१ में अमरीका का बंटवारा स्वीकार होता, तो क्या आज अमरीका वैश्विक ताकत बन सकता था..?
उत्तर हैं – नहीं.
*यह तो हमारा दुर्भाग्य था, की उस समय हमारे देश का नेतृत्व ऐसे हांथों में था, जिन्होंने डरकर, घबराकर, संकोचवश, अतिसहिष्णुता के कारण देश का बंटवारा मंजूर किया..! यदि अब्राहम लिंकन जैसा नेतृत्व उस समय हमें मिलता तो शायद हमारा इतिहास, भूगोल और वर्तमान कही अधिक समृध्द रहता..!*
तत्कालीन नेतृत्व की बड़ी भूल थी की वे मुस्लिम लीग के विरोध में खुलकर कभी नहीं खड़े हुए. हमेशा मुस्लिम लीग को पुचकारते रहे. गांधीजी और कांग्रेस के कुछ नेताओं को लग रहा था की अगर हम मुस्लिम लीग की मांगे मांगेंगे तो शायद उनका ‘ह्रदय परिवर्तन’ होगा. लेकिन यह होना न था, और नहीं हुआ..!
१९३० के मुस्लिम लीग के अलाहाबाद अधिवेशन में, अध्यक्ष पद से बोलते हुए कवी इकबाल (वही, जिसने ‘सारे जहाँ से अच्छा..’ यह गीत लिखा था) ने कहा की, ‘मुसलमानों को अलग भूमि मिलना ही चाहिए. हिन्दू के नेतृत्व वाली सरकार में मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करना संभव ही नहीं हैं..!’
अलग भूमि, अलग राष्ट्र का सपना हिन्दुस्तान के मुसलमानों को दिखने लगा था. लंदन में बैठे रहमत अली ने इकबाल के भाषण का आधार ले कर अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए एक पुस्तक लिख डाली. उस मुस्लिम राष्ट्र को उसने नाम दिया – पाकिस्तान..!
दुर्भाग्य से गांधीजी और बाकी का कांग्रेस नेतृत्व इस भयानकता को नहीं समझ पाया. ऊपर से मुस्लिम लीग दंगे कराने का डर दिखाती थी.. और दंगे कराती भी थी. इन दंगों में कांग्रेस की भूमिका निष्क्रिय रहने की होती थी, कारण गांधीजी ने अहिंसा का व्रत लिया था. *इसी दरम्यान गांधीजी ने कहा की, ‘मुझे स्वतंत्रता या अखंडता की तुलना में अहिंसा अधिक प्रिय हैं. अगर हिंसा से स्वतंत्रता या अखंडता मिलती हैं, तो वह मुझे नहीं चाहिए..!’*
एक अब्राहम लिंकन ने दूरदर्शिता दिखाते हुए, हिंसा या गृहयुध्द के कीमत पर अमरीका को एक रखा और विश्व का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाया...
और हमारे यहां..?
हिंसा के भय से, प्रतिकार करने के डर से हमारे नेतृत्व ने विभाजन स्वीकार किया..!
आगे चलकर मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन की धमकी दी. कहा की ‘पाकिस्तान को मंजूरी दो, नहीं तो १६ अगस्त १९४६ को हम ‘डायरेक्ट एक्शन’ लेंगे..’
*अखंड बंगाल का मुख्यमंत्री उस समय था, हसन सुऱ्हावर्दी. उसने १६ अगस्त से १९ अगस्त, इन चार दिनों में चार हजार हिन्दुओं का कत्ले-आम किया. बीस हजार से ज्यादा हिन्दू गंभीर रूप से जख्मी हुए. कितने माँ-बहनों की इज्जत लूटी गई, इसकी कोई गिनती नहीं हैं..!*
और इस ‘डायरेक्ट एक्शन’ से कांग्रेसी नेता डर गए. यही बड़ी भूल थी.
प्रतिकार भी किया जा सकता था. दुनिया के सामने मुस्लिम लीग के इस बर्बरता को रखा जा सकता था. हम लोगों में प्रतिकार करने की शक्ति थी.
अखंड भारत के पश्चिम प्रान्त में बड़ी संख्या में हिन्दू थे. इरान से सटा हुआ था, बलोचिस्तान. *इस बलोचिस्तान में और बगल के सिस्तान प्रान्त में बहुत बड़ी संख्या में हमारे सिन्धी भाई रहते थे. क्वेटा, डेरा बुगती, पंजगुर, कोहलू, लोरालई... यहां से तो कराची, हैदराबाद (सिंध) तक... इन सभी स्थानों पर हमारे सिन्धी भाई हजारों वर्षों से रहते आये थे. पश्चिम से आने वाले हर-एक आक्रांता की नजर सबसे पहले इन्ही पर पड़ती थी. लेकिन ये सब राजा दाहिर के वंशज थे. पराक्रमी थे. इतने आक्रमणों के बाद भी इन्होने अपना धर्म नहीं छोड़ा था, और न ही छोड़ी थी अपनी जमीन..!*
लेकिन दुर्भाग्य इस देश का... कांग्रेस वर्किंग कमिटी के विभाजन स्वीकार करने वाले निर्णय ने इन पुरुषार्थ के प्रतीकों को, अदम्य साहस दिखाने वाले वीरों को एवं प्रतिकूल परिस्थिति में भी टिके रहने की क्षमता रखने वाले इन योध्दाओं को, हजारों वर्षों की अपनी पुश्तैनी जमीन छोडनी पड़ी..!! (क्रमशः)
- प्रशांत पोल
माननीय गगनेजा जी पर हमले से पंजाब आहत !
विगत 6 अगस्त सायं लगभग 8 बजे पंजाब प्रांत के जालंधर शहर के व्यस्ततम क्षेत्र ज्योति चौक पर अपनी पत्नी के साथ खरीददारी करने आए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजाब के सह-संघचालक ब्रिगेडियर (से.नि.) जगदीश गगनेजा को दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मारी और फरार हो गए। आसपास के लोगों ने उन्हें उठाया और स्थानीय पटेल अस्पताल में तत्कालीन उपचार के लिए ले गए। अगले दिन उन्हें लुधियाना के दयानंद मेडिकल कालेज में ले जाया गया जहां पांच विशेष डाक्टरों की टीम के द्वारा उनका ईलाज चल रहा है।
इस लोमहर्षक घटना ने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जहां एक ओर माननीय गगनेजा जी संघ के प्रांतीय अधिकारी के नाते सर्वदूर प्रांत में परिचित हैं वहीं दूसरी ओर एक अनुशासित सैनिक अधिकारी के नाते भी उनका समाज में प्रतिष्ठिïत स्थान है। ब्रिगेडियर गगनेजा भारतीय सेना के ऐसे अधिकारी रहे हैं जिन्होंने देश की सीमा पर विभिन्न मोर्चों पर दुश्मन से लोहा खुद आगे बढ़ कर लिया और सेवानिवृति के बाद भी राष्ट्रहित और राष्ट्र सुरक्षा की दृष्टि से संघ में दायित्व प्राप्त किया। खुद से अधिक भारत के हर नागरिक की भावना, श्री गगनेजा की इस बात सेही महसूस की जा सकती है, उन्होंने प्रशासन द्वारा सुरक्षा कर्मी उपलब्ध करवाने की पेशकश को यह कह कर नहीं स्वीकारा कि उनसे अधिक सामान्य जन की सुरक्षा जरूरी है। वर्तमान में जब सरकारी अंगरक्षक सटेटस सिंबल होने का चलन समाज में बढ़ रहा हो, ऐसे में श्री गगनेजा की यह भूमिका उन्हें एक आदर्श के रूप में स्थापित करने वाली है।
स्वभाविक है कि इस प्रकार के व्यक्तित्व का किसी से किसी प्रकार का कोई वैरभाव नहीं था। फिर भी यह घटना हुई।
समाचार पत्रों तथा सामान्यजनों की बातचीत में चार कारणों पर चर्चा हो रही है जिनके चलते यह घटना हुई हो सकती है।
पहला अकाली दल-भाजपा गठबंधन विपक्षी दलों के साथ-साथ कुछ अलगाववादी तत्वों की आंखों में खटक रहा है। उनका एकमात्र एजेंडा अगला चुनाव जीतना है। इसके लिए समाज को तोडऩे तथा आपस में लड़ाने का कार्य चल रहा है। ऐसा पहले भी होता रहा है, परंतु इस बार इसके लिए नए-नए किस्म के प्रयोग किए जा रहे लगते हैं।
दूसरा पिछले एक वर्ष से पंजाब में क्रमश: कई घटनाएं हुई हैं जैसे, श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी, अलगाववादी तत्वों के द्वारा सरबत खालसा का आयोजन, खन्ना तथा फगवाड़ा में हिंदू नेताओं की हत्या, मालेरकोटला में कुरान शरीफ की बेअदबी, नामधारी संप्रदाय के प्रमुख की माता चंद कौर की हत्या तथा उत्तïर भारत के प्रसिद्धï गौसेवक स्वामी कृष्णानंद जी की गुमशुदगी को लेकर प्रशासन की असफलता पर विपक्षी दलों द्वारा निरंतर प्रहार जारी हैं। चाहे प्रशासन द्वारा बेअदबी की घटनाओं के जिम्मेवारी लोगों की गिरफ्तारी भी की गई है, कुरान की बेअदबी के लिए जिम्मेवार आम आदमी पार्टी के विधायक को भी गिरफ्तार किया गया। स्वयंभू सरबत खालसा की घटना के बाद प्रदेश भर में फैले तनाव को कम करने के लिए बहुत सारे लोगों की गिरफ्तारियां हुईं व सरकार ने चार सद्भावना रैलियां करके सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का प्रयास किया है। उपरोक्त सभी घटनाओं में घटना की जांच तथा अपराधियों की गिरफ्तारी से पूर्व ही प्रदेश का वातावरण खराब करने के प्रयास हो चुके हैं।
तीसरा देश भर में राष्ट्रीय विचारों पर आधारित संगठन तथा उनके विचारों के लोगों द्वारा राजकीय क्षेत्र में भी मिल रही विजय का क्रम पंजाब में भी सुदूर देखने को मिल रहा है। स्थान-स्थान पर लोग राष्ट्रीय विचारों के साथ जुडऩे को उत्सुक हो रहे हैं। स्वभाविक ही है वर्षों से अलगाववाद की राजनीति कर रहे लोगों को इस राष्ट्रीय विचार की वृद्धिï भी हज्म नहीं हो रही है। वह उसे हर हाल में रोकना चाहते हैं। चाहे इसके लिए किसी की भी हत्या की जाए और समाज को आपस में लड़ाया जाए।
चौथा जैसा कि हम सब जानते हैं कि संघ के सामान्य स्वयंसेवक से लेकर अधिकारी तक व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं रखते। इसलिए देशविरोधियों द्वारा उन पर कहीं पर भी हमला करना आसान होता है। परंतु इस घटना में यह बात ध्यान में आती है कि गगनेजा जी को बड़ी आसानी से उनके निवास, कार्यालय या कहीं आते-जाते हुए रास्ते में भी उन पर हमला किया जा सकता था। लेकिन ऐसा न कर शहर के व्यस्ततम क्षेत्र में हमला कर हमलावरों ने प्रशासन को चुनौती दी तथा वे विरोधी पार्टियों को मौका दिया कि उनके दिये बयान सिद्ध साबित हो कि पंजाब में प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है। इसके अलावा संघ के बड़े अधिकारी पर हमला कर हिंदू समाज को उत्तेजित कर सड़कों पर उतरने पर मजबूर करना भी उनकी एक साजिश का हिस्सा था।
प्रभु कृपा से उनका यह मंसूबा पूरा न हो सका। उसका कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धïत्तिï को साजिशकर्ता नहीं जानते हैं। 90 वर्षों के अपने जीवन काल में संघ समाज विरोधी शक्तियों से ही मुकाबला करता आ रहा है। पंजाब में चले आतंकवाद के दौरान मोगा, लुधियाना, बरनाला, डबवाली में भी शाखा में स्वयंसेवकों की नृशंस हत्या के बाद भी पूरे देश में संघ ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे हिंदू-सिख एकता पर प्रतिकूल असर पड़ता हो।
इस घटना में भी संघ ने अपने मूल चरित्र को ही प्रकट किया है। उसी का परिणाम है कि आज प्रशासन पूरी ताकत से हमलावरों को पकडऩे में जुटा हुआ है और निश्चित ही इसमें उसे सफलता मिलेगी ऐसा हमारा विश्वास है। पंजाब के कुशल डाक्टरों की एक टीम गगनेजा जी को स्वस्थ करने में पूरी तनमन्यता से जुटी हुई है। पंजाब भर में प्रत्येक नगर-कस्बे में सामान्य नागरिक उनके कुशलक्षेम के लिए हवन यज्ञ, हनुमान चालीसा तथा श्री सुखमनी साहिब के पाठ कर रहे हैं तथा पंजाब का पूरा मीडिया इस मामले में गंभीरता से अपनी भूमिका अदा कर रहा है। समस्या के समाधान का यह तरीका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है, जिसके कारण आज पंजाब में भाईचारा बरकरार नजर आ रहा है तथा विरोधी शक्तियां पराजित दिखाई दे रही हैं।
रामगोपाल
प्रचार प्रमुख,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पंजाब।
मो. 099157-14305