सोमवार, 25 सितंबर 2017

सेना और संघ को देश सेवा का सामान माध्यम मानते थे गगनेजा जी

लगभग 2006 की बात होगी कि संघ कार्यालय पीली कोठी में विभाग संघचालक (तत्कालीन) ठाकुर बलवंत सिंह जी ने मुझ से कहा कि आपको सेना से सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर से मिलवाना है। उस समय मेरे पास जालन्धर विभाग प्रचारक का दायित्व था। संघ की कार्य पद्धति में सामान्य व्यक्ति से भी परिचय होना बहुत अच्छा माना जाता है और नए सहयोगी जुड़ने के कारण कार्यकर्ता को अत्यंत प्रसन्नता एवम सन्तोष की अनुभूति होती है। मुझे सेवा निवृत्त ब्रिगेडियर से मिलने की उत्सुकता होना तो स्वभाविक ही था। यद्यपि बताया गया कि सेना में जाने से पूर्व गगनेजा जी संघ के अच्छे स्वयंसेवक थे तो भी संघ से इतना समय दूर रहने का ध्यान आते ही आशंका सी भी थी कि क्या वे सामान्य स्वयंसेवक की तरह विनम्र ,सहज और संघ समर्पित होंगे? सैनिकों को सेना की सेवा में रहने के कारण समाज और परिवार से काफी वर्ष दूर रहना पड़ता है। इस कारण बहुत सारे सैनिकों के असामान्य व्यवहार के कारण सेना के सैनिकों और अधिकारियों पर कई चुटकुले भी प्रचलित हैं। लेकिन गगनेजा जी से मिलते ही सारी आशंकाएं दूर हो गईं। ठाकुर बलवंत सिंह जी के घर मे ही हमारा पहला परिचय हुआ। परिचय होते ही उनका खड़े होकर मुझे गले लगाना और पूरे उत्साह से मिलना, लगता है जैसे आज की बात है। उनसे मिलने वाले सभी कार्यकर्ताओं का एक जैसा ही अनुभव था। सभी स्वयंसेवक उनकी इस अदा पर फिदा रहते थे। 'उनसे मिली नजर कि......गीत के शब्दों और भावों की तरह जो भी स्वयंसेवक उनसे एक बार मिल जाता था वह उन्हीं का हो कर रह जाता था। इसका बड़ा कारण था कि स्वयंसेवकों के साथ गगनेजा जी का यह व्यवहार बाहरी दिखावा न होकर उनके निर्मल मन का परिलक्षण था। संघ और सेना में कोई अंतर नहीं - स्व. गगनेजा जी बातचीत में बताए थे कि मैं सेना और संघ को अलग अलग नहीं देखता हूँ। वे इन दोनों को देश सेवा का प्रभावी माध्यम मानते थे। पढ़ाई के समय वे स्वयंसेवक बने। संघ का भूत कुछ इस कदर इन पर चढ़ा था कि वे पढ़ाई पूरी कर प्रचारक निकलना चाहते थे। उस समय बठिंडा में संघ के प्रचारक डा. सत्यपाल जी थे। अपने विद्यार्थी काल के प्रचारक डा. सत्यपाल को गगनेजा जी बहुत याद करते थे। जब मैंने उन्हें बताया कि डा. सत्यपाल जी आजकल कांगड़ा में हैं तो वे बहुत प्रसन्न हुए। गगनेजा जी बताते थे कि सेना के साक्षात्कार में भी उन्होंने संघ विचार, संघ के गीत खुल कर प्रयोग किया ( उन दिनों राजनैतिक कारणों से सरकारी सेवा विशेषकर सेना की नॉकरी के साक्षात्कार में संघ की चर्चा करना किसी खतरे से कम नहीं था) इस सब के बाबजूद सेना में अधिकारी चययनित हो जाने के बाद गगनेजा जी इसे नियति का खेल मान पूरी तन्मयता से सेवा में जुट गए। सेना में गगनेजा जी ने अपनी योग्यता , निष्ठा, समर्पण से सेना में अपनी योग्य पहचान बनाई। जन्म और प्रारम्भिक पढ़ाई- स्व. जगदीश गगनेजा जी का जन्म 19 फरबरी 1950 को बठिंडा में हुआ। आपकी प्रारम्भिक पढ़ाई बठिंडा शहर में सनातन धर्म स्कूल में तथा ग्रेजुएशन राजेंद्रा कालेज में हुई। 14 फरबरी 1972 को अपने सेना में कमीशन लिया। 1972 की लड़ाई लड़ी। आपके नेतृत्व में सेना ने शक्करगढ़ पोस्ट पर जीत प्राप्त की। आप पाकिस्तान में 2 वर्ष उसी पोस्ट की सम्भाल में रहे। आर्थिक विषयों पर आपकी पकड़ थी इसी कारण भारतीय सेना के वित्त विभाग दिल्ली में भी अपने कार्य किया। उत्तर पूर्व में आप भारतीय सेना के प्रवक्ता भी रहे। ऐसे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्री गगनेजा जी के परिवार में धर्मपत्नी, बेटा राहुल जो वर्तमान में सेना में कर्नल है, बेटी रुचि, दामाद मोहित तथा दूसरी बेटी शीतल और दामाद प्रशांत हैं। सारा परिवार स्वभाविक रूप से उन्हें यादों में संजोये हुए है। सामान्य स्वयंसेवक भी श्री गगनेजा को याद मात्र कर भावुक हो उठते हैं तो परिवार जनों के दुख की तो कल्पना ही की जा सकती है। और पूरे उत्साह के साथ संघ में सक्रिय हो गए संघ से लम्बी जुदाई के बाद पुनः संघ सक्रिय होते ही उनके चेहरे पर सन्तोष और प्रसन्नता स्पष्ट ध्यान में आती थी। सबसे पहले उन्हें भाग संघचालक का दायित्व दिया गया। श्री गगनेजा जी संघ कार्य मे ऐसे रमे की फिर पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनके संघ कार्य मे सक्रिय होते ही जालन्धर महानगर के संघ कार्य मे नई चेतना का संचार हो गया। काफी समय बाद जालन्धर के संघ को एक योजक, दूरद्रष्टा एवम संगठन कला के पारखी कार्यकर्ता प्राप्त हुआ। उनके संघ समर्पित तेजस्वी व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि भाग का दायित्व होते हुए भी महानगर, विभाग और प्रान्त में भी उनको भेजा जाने लगा। इस बीच मेरे दायित्व में परिवर्तन आ गया। मेरा केंद्र जालन्धर से लुधियाना और फिर चंडीगढ़ हो गया। इस समय हमने चीन के विरुद्ध समाज जागरण का अभियान लिया। प्रचारक संस्था के प्रति उनके मन मे अगाध श्रद्धा थी। प्रत्येक सूचना को आज्ञा मान कर तुरन्त हां कर देनी, विषय की पूरी तैयारी और फिर समय से पूर्व कार्यक्रम में पहुंच जाना गगनेजा जी स्वभावगत विशेषता थी। समय पालन की ओर उनका विशेष आग्रह रहता था। संघ के अधिकारियों की नजर गगनेजा जी के व्यक्तित्व पर आ टिकी। उन्हें सह प्रान्त संघचालक का दायित्व दिया गया। और इस के तुरन्त पश्चात उन्हें भाजपा से सम्पर्क का कार्य दिया गया। इस दायित्व की चर्चा करने जैसे ही अधिकारी उनसे मिले उन्होंने बड़ी ही विनम्रता से इस दायित्व के प्रति अपनी रुचि प्रकट की। उन्होंने कहा कि राजनीति का रास्ता काफी कठिन और टेढ़ा मेढा होता है और सेना में रहने के कारण उन्हें घूमा फिरा कर बात करने की आदत नहीं। संघ के चिंतन के प्रकाश में संघ,समाज और संगठन हित में स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने देने का आश्वासन मिलने के पश्चात ही उन्होंने इस दायित्व को स्वीकार किया। सार्वजनिक जीवन मे छाप छोड़ गए- संघ में कार्यकर्ता का अधिकांश समय संगठन के आंतरिक कार्यों में लगता है। राजनीति क्षेत्र से सम्पर्क का दायित्व आने के कारण संघ कार्य के साथ साथ समाज मे भी यदा कदा वे दिखने लगे। बहुत कम समय मे वे राजनीति में कार्य करने वाले कार्यकर्ताओं के प्रिय बन गए। सैद्धान्तिक दृढ़ता के कारण अनेक कार्यकर्ताओं को कड़वी दवाई भी मिलती थी। लेकिन आवश्यक कठोर दिशा निर्देश के बाद वही पीठ पर प्यार भरा हाथ कार्यकर्ताओं को अपनेपन का अहसास दिला जाता था। राजनीति में टेढ़े मेढ़े चलने वाले हमारे मित्रों को उनसे बात करने में काफी हिम्मत जुटानी पड़ती थी। संघ के साथ साथ सभी संगठनों और विशेषकर भाजपा को पंजाब में शक्ति के रूप में उभराना, इसकेे लिए दूरगामी योजना और कठोर परिश्रम कार्यकर्ताओं के लिए यही उनका मन्त्र रहता था। अपनी इस बात को बड़े ही आत्मविश्वासपूर्वक और तार्किक ढंग से सब जगह रखते थे। राजनीति में सब कुछ बोलना आवश्यक नहीं होता, कुछ पचाना भी होता है, ऐसा मैं अपने सम्बधों के आधार पर उनसे आग्रह करता था। वे इसे मानते भी थे लेकिन लगता है निष्कपट मन होने के कारण वे अपने स्वभाव में ज्यादा परिवर्तन नहीं कर पाए। इस कारण बहुत लोग उनसे नाराज भी होते रहते थे लेकिन इस सबसे बेपरवाह वे अपने साधना मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। स्वामी विवेकानन्द सार्धशती में सम्भाला नेतृत्व- स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती में मुझे प्रान्त के संयोजक का दायित्व मिला था। श्री सतीश जी ( तत्कालीन सह प्रान्त प्रचारक) एवम श्री गगनेजा जी के साथ समाज जागरण की प्रभावी योजना बनी। बड़ी संख्या की उपस्थिति के युवा सम्मेलन से संगठन को नया रक्त मिला। बादल सरकार से हिंदुत्व के प्रतीक स्वामी विवेकानन्द के मुद्दे पर सब प्रकार का सहयोग अनेक लोगों के लिए आश्चर्य एवम सन्तोष का विषय था। इस सब मे श्री गगनेजा जी का सम्पूर्ण सहयोग एवम उत्साहपूर्वक हर योजना को आगे बढ़ाने में परिश्रम।याद आते ही रोमांच हो जाता है। जब कभी मन मे कुछ निराशा आ जाती थी गगनेजा जी के साथ किया भोजन या चाय ऊर्जा का कार्य करता था। समय के गतिमान प्रवाह में मेरे पास विद्या भारती का दायित्व आया तो वे विद्या मन्दिरों की स्थिति सुधारने के लिए हमेशा उत्साह देते रहते थे। हमने सरकार से बात कर विद्या मन्दिरों को आर्थिक सहयोग करने का विषय रखने को कहा तो वे मुझ से भी ज्यादा उत्साही दिखे। शायद उनके प्रभावी व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि पंजाब सरकार का अभी तक प्राप्त सबसे ज्यादा सहयोग अपने विद्या मन्दिरों को प्राप्त हुआ। पंजाब के विद्या भारती संगठन में नया उत्साह भर गया। विश्वास नहीं होता कि गगनेजा जी नहीं हैं- 6 अगस्त 2016 शाम को विद्या धाम से मैं और प्रान्त प्रचारक श्री प्रमोद जी किसी कार्य वश निकले ही थे कि इस घटना बारे फोन आ गया। पता चला कि ज्योति चौक के पास किसी सिरफिरे ने इस जाबांज को गोलियों से भून दिया। भागते दौड़ते, सभी कार्यकर्ताओं को सूचित करते हम पटेल हॉस्पिटल पहुंचे। क्या हो रहा है किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। सैकड़ों कार्यकर्ता हॉस्पिटल पहुंच गए। सभी हाथ जुड़े थे, एक ही प्रार्थना सब कर रहे थे कि ईश्वर कार्यकर्ताओं की श्रद्धा, आदर और प्रेम के केंद्र श्री गगनेजा जी स्वस्थ हो जाएं। बस उसके बाद तो घटनाक्रम इस तेजी से घूमा कि 22 सितम्बर 2016 को गगनेजा जी अपने हजारों चाहने वालों को निराश करते हुए स्वर्गलोक की यात्रा पर चल निकले। डा. बताते हैं कि आखिर समय तक गगनेजा जी अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से मौत से जूझते रहे। लगता था कि गगनेजा जी मौत को भी शत्रु देश का आक्रमण समझ कर एक सैनिक की तरह बचाव में पूरी तरह मोर्चे पर डटे थे। आखिर में विधाता की इच्छा को शिरोधार्य कर उन्होंने समर्पण किया होगा। गगनेजा जी की याद को स्थायी बंनाने का लघु प्रयास- तुमने दिया देश को जीवन , देश तुम्हें क्या देगा अपनी लौ को जीवित रखने नाम तुम्हारा लेगा।। महापुरुषों की याद को स्थायी बनाना सरकार और समाज की जिम्मेवारी होती है। सरकार को इस दिशा में कार्य करना चाहिए। विद्या भारती की प्रान्त ईकाई सर्वहितकारी शिक्षा समिति ने जालन्धर के लाडोवाली रोड पर स्थित अपने विद्या मंदिर को उनकी पुण्य याद को समर्पित करने का निर्णय किया है। श्री गगनेजा की प्रथम पुण्य तिथि को इस विद्यालय का नाम कारण ब्रिगेडियर जगदीश गगनेजा सर्वहितकारी विद्या मंदिर के नाम से जाना जाएगा। असहनीय है आक्रमण के रहस्य से पर्दा न उठ पाने का दर्द ब्रिगेडियर स्व.जगदीश गगनेजा जी पर हुए आक्रमण और उसके कारण असमय हुई मृत्यु का जख्म आज भी हजारों स्वयंसेवकों को बेचैन किए हुए है। प्रशासन, उस समय की पंजाब सरकार की उदासीनता से स्वयंसेवकों के मन मे भयंकर आक्रोश था। स्वयंसेवकों के आक्रोश को समाज विरोधी शक्तियां दुरुपयोग न कर सकें इसलिए देश एवम समाज के व्यापक हित को सामने रखते हुए संघ ने स्वयंसेवकों के आक्रोश को बड़ी कुशलता एवम परिश्रम से शांत किया था। केंद्र सरकार द्वारा सीबीआई की जांच की घोषणा से हत्यारों को कानून द्वारा सजा मिलने की आशा जगी थी। इसके साथ हत्यारों के पीछे की समाज और राष्ट्र विरोधी शक्तियों के पर्दाफाश होने की कुछ आशा बंधी थी । लेकिन समय बीतने के साथ साथ अब वह आशा भी धूमिल होती जा रही है। आज प्रत्येक स्वयंसेवक सोचने को बेबश हो रहा है कि आखिर संघ कब तक अपनी समझदारी की कीमत सब जगह अपने कार्यकर्ताओं को खो कर चुकाता रहेगा? केरल, बंगाल, कश्मीर तथा उत्तर पूर्व में हजारों स्वयंसेवक देश हित मे कार्य करने की कीमत अपनी जान दे कर चुका चुके हैं। आशा की जानी चाहिए कि सीबीआई शीघ्र दोषियों तक पहुंचेगी और उन्हें न्यायलय के कटघरे में खड़ा कर कानून के हाथों कठोरतम सजा दिलवाने में सफल होगी।

गुरुवार, 29 जून 2017

बहुत नाज उठा लिए तेरे ये जिंदगी


बहुत नाज उठा लिए तेरे ये जिंदगी, लगता है मैं तेरे काबिल नहीं,
निभेगी नहीं कत्तई शायद हमारी, बेहतर होगा तू मेरा हिसाब कर दे ,

हमारा मिलना महज एक संयोग था, ये तो तू भी जानती है
साथ निभाने की कोशिश ईमानदार थी ये तो तू भी जानती है।
रिश्ते मिलना और निभना एक संयोग है ये तो तू भी मानती है
लाख जतन से भी नियति से जीतना कठिन है ये तो तू भी जानती है

वैसे मुझे तो कोई शिकवा या शिकायत नही है तुझसे, ये जिंदगी
क्या करूँ तेरे रोज रोज के दुख औऱ रोने से परेशान हूं ये जिंदगी
बहुत हो गया तेरी आँखों मे आंसू अब देखे नहीं जाते, ये जिंदगी
खुशी न दे सके तुझे मेरा यह साथ, तो जा बिछुड़ जा, ये जिंदगी

इस मोड़ पर पटक दिया तूने,  तू ही बता मैं क्या करूँ? कहां जाऊं?
छोड़ साधना खुदा की अब संसार सागर में गोते लगाऊं, डूब जाऊं?
तूने तो वायदा किया था खुश रहने और मुझे खुश रखने का ये जिंदगी
मेरा साथ बस एक साधना है समझ ले, सोच ले औऱ बता दे ये जिंदगी

बुधवार, 17 अगस्त 2016

*बंटवारे का दर्द

डायरेक्ट एक्शन’ का डर...!
- प्रशांत पोल
हमारे देश में जब १८५७ का स्वातंत्र्य युध्द समाप्त होने को था, उस समय अमरीका का दृश्य बड़ा भयानक था. १८६१ से १८६५ तक वहां गृहयुध्द चल रहा था. अमरीका के ३४ प्रान्तों में से दक्षिण के ११ प्रान्तों ने गुलामी प्रथा के समर्थन में, बाकी बचे (उत्तर के) प्रान्तों के ‘यूनियन’ के विरोध में युध्द छेड़ दिया था. उनका कहना था, ‘हम विचारों के आधार पर देश चलाएंगे. इसलिए हमें अलग देश, अलग राष्ट्र चाहिए..!’

वह तो भला था अमरीका का, जिसे अब्राहम लिंकन जैसा राष्ट्रपति उस समय मिला. *लिंकन ने अमरीका के बंटवारे का पूरी ताकत के साथ विरोध किया. गृहयुध्द होने दिया, लेकिन बंटवारे को टाला..! और आज..? आज अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक और सामरिक ताकत हैं.*

यदि १८६१ में अमरीका का बंटवारा स्वीकार होता, तो क्या आज अमरीका वैश्विक ताकत बन सकता था..?

उत्तर हैं – नहीं.

*यह तो हमारा दुर्भाग्य था, की उस समय हमारे देश का नेतृत्व ऐसे हांथों में था, जिन्होंने डरकर, घबराकर, संकोचवश, अतिसहिष्णुता के कारण देश का बंटवारा मंजूर किया..! यदि अब्राहम लिंकन जैसा नेतृत्व उस समय हमें मिलता तो शायद हमारा इतिहास, भूगोल और वर्तमान कही अधिक समृध्द रहता..!*

तत्कालीन नेतृत्व की बड़ी भूल थी की वे मुस्लिम लीग के विरोध में खुलकर कभी नहीं खड़े हुए. हमेशा मुस्लिम लीग को पुचकारते रहे. गांधीजी और कांग्रेस  के कुछ नेताओं को लग रहा था की अगर हम मुस्लिम लीग की मांगे मांगेंगे तो शायद उनका ‘ह्रदय परिवर्तन’ होगा. लेकिन यह होना न था, और नहीं हुआ..!

१९३० के मुस्लिम लीग के अलाहाबाद अधिवेशन में, अध्यक्ष पद से बोलते हुए कवी इकबाल (वही, जिसने ‘सारे जहाँ से अच्छा..’ यह गीत लिखा था) ने कहा की, ‘मुसलमानों को अलग भूमि मिलना ही चाहिए. हिन्दू के नेतृत्व वाली सरकार में मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करना संभव ही नहीं हैं..!’

अलग भूमि, अलग राष्ट्र का सपना हिन्दुस्तान के मुसलमानों को दिखने लगा था. लंदन में बैठे रहमत अली ने इकबाल के भाषण का आधार ले कर अलग मुस्लिम राष्ट्र के लिए एक पुस्तक लिख डाली. उस मुस्लिम राष्ट्र को उसने नाम दिया – पाकिस्तान..!

दुर्भाग्य से गांधीजी और बाकी का कांग्रेस नेतृत्व इस भयानकता को नहीं समझ पाया. ऊपर से मुस्लिम लीग दंगे कराने का डर दिखाती थी.. और दंगे कराती भी थी. इन दंगों में कांग्रेस की भूमिका निष्क्रिय रहने की होती थी, कारण गांधीजी ने अहिंसा का व्रत लिया था. *इसी दरम्यान गांधीजी ने कहा की, ‘मुझे स्वतंत्रता या अखंडता की तुलना में अहिंसा अधिक प्रिय हैं. अगर हिंसा से स्वतंत्रता या अखंडता मिलती हैं, तो वह मुझे नहीं चाहिए..!’*

एक अब्राहम लिंकन ने दूरदर्शिता दिखाते हुए, हिंसा या गृहयुध्द के कीमत पर अमरीका को एक रखा और विश्व का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बनाया...

और हमारे यहां..?

हिंसा के भय से, प्रतिकार करने के डर से हमारे नेतृत्व ने विभाजन स्वीकार किया..!

आगे चलकर मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन की धमकी दी. कहा की ‘पाकिस्तान को मंजूरी दो, नहीं तो १६ अगस्त १९४६ को हम ‘डायरेक्ट एक्शन’ लेंगे..’

*अखंड बंगाल का मुख्यमंत्री उस समय था, हसन सुऱ्हावर्दी. उसने १६ अगस्त से १९ अगस्त, इन चार दिनों में चार हजार हिन्दुओं का कत्ले-आम किया. बीस हजार से ज्यादा हिन्दू गंभीर रूप से जख्मी हुए. कितने माँ-बहनों की इज्जत लूटी गई, इसकी कोई गिनती नहीं हैं..!*

और इस ‘डायरेक्ट एक्शन’ से कांग्रेसी नेता डर गए. यही बड़ी भूल थी.

प्रतिकार भी किया जा सकता था. दुनिया के सामने मुस्लिम लीग के इस बर्बरता को रखा जा  सकता था. हम लोगों में प्रतिकार करने की शक्ति थी.

अखंड भारत के पश्चिम प्रान्त में बड़ी संख्या में हिन्दू थे. इरान से सटा हुआ था, बलोचिस्तान. *इस बलोचिस्तान में और बगल के सिस्तान प्रान्त में बहुत बड़ी संख्या में हमारे सिन्धी भाई रहते थे. क्वेटा, डेरा बुगती, पंजगुर, कोहलू, लोरालई... यहां से तो कराची, हैदराबाद (सिंध) तक... इन सभी स्थानों पर हमारे सिन्धी भाई हजारों वर्षों से रहते आये थे. पश्चिम से आने वाले हर-एक आक्रांता की नजर सबसे पहले इन्ही पर पड़ती थी. लेकिन ये सब राजा दाहिर के वंशज थे. पराक्रमी थे. इतने आक्रमणों के बाद भी इन्होने अपना धर्म नहीं छोड़ा था, और न ही छोड़ी थी अपनी जमीन..!*

लेकिन दुर्भाग्य इस देश का... कांग्रेस वर्किंग कमिटी के विभाजन स्वीकार करने वाले निर्णय ने इन पुरुषार्थ के प्रतीकों को, अदम्य साहस दिखाने वाले वीरों को एवं प्रतिकूल परिस्थिति में भी टिके रहने की क्षमता रखने वाले इन योध्दाओं को, हजारों वर्षों की अपनी पुश्तैनी जमीन छोडनी पड़ी..!!          (क्रमशः)
- प्रशांत पोल

माननीय गगनेजा जी पर हमले से पंजाब आहत !

विगत 6 अगस्त सायं लगभग 8 बजे पंजाब प्रांत के जालंधर शहर के व्यस्ततम क्षेत्र ज्योति चौक पर अपनी पत्नी के साथ खरीददारी करने आए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंजाब के सह-संघचालक ब्रिगेडियर (से.नि.) जगदीश गगनेजा को दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मारी और फरार हो गए। आसपास के लोगों ने उन्हें उठाया और स्थानीय पटेल अस्पताल में तत्कालीन उपचार के लिए ले गए। अगले दिन उन्हें लुधियाना के दयानंद मेडिकल कालेज में ले जाया गया जहां पांच विशेष डाक्टरों की टीम के द्वारा उनका ईलाज चल रहा है।

इस लोमहर्षक घटना ने सबको आश्चर्यचकित कर दिया। जहां एक ओर माननीय गगनेजा जी संघ के प्रांतीय अधिकारी के नाते सर्वदूर प्रांत में परिचित हैं वहीं दूसरी ओर एक अनुशासित सैनिक अधिकारी के नाते भी उनका समाज में प्रतिष्ठिïत स्थान है। ब्रिगेडियर गगनेजा भारतीय सेना के ऐसे अधिकारी रहे हैं जिन्होंने देश की सीमा पर विभिन्न मोर्चों पर दुश्मन से लोहा खुद आगे बढ़ कर लिया और सेवानिवृति के बाद भी राष्ट्रहित और राष्ट्र सुरक्षा की दृष्टि से संघ में दायित्व प्राप्त किया। खुद से अधिक भारत के हर नागरिक की भावना, श्री गगनेजा की इस बात सेही महसूस की जा सकती है, उन्होंने प्रशासन द्वारा सुरक्षा कर्मी उपलब्ध करवाने की पेशकश को यह कह कर नहीं स्वीकारा कि उनसे अधिक सामान्य जन की सुरक्षा जरूरी है। वर्तमान में जब सरकारी अंगरक्षक सटेटस सिंबल होने का चलन समाज में बढ़ रहा हो, ऐसे में श्री गगनेजा की यह भूमिका उन्हें एक आदर्श के रूप में स्थापित करने वाली है।
स्वभाविक है कि इस प्रकार के व्यक्तित्व का किसी से किसी प्रकार का कोई वैरभाव नहीं था। फिर भी यह घटना हुई।

समाचार पत्रों तथा सामान्यजनों की बातचीत में चार कारणों पर चर्चा हो रही है जिनके चलते यह घटना हुई हो सकती है।
पहला अकाली दल-भाजपा गठबंधन विपक्षी दलों के साथ-साथ कुछ अलगाववादी तत्वों की आंखों में खटक रहा है। उनका एकमात्र एजेंडा अगला चुनाव जीतना है। इसके लिए समाज को तोडऩे तथा आपस में लड़ाने का कार्य चल रहा है। ऐसा पहले भी होता रहा है, परंतु इस बार इसके लिए नए-नए किस्म के प्रयोग किए जा रहे लगते हैं।

दूसरा पिछले एक वर्ष से पंजाब में क्रमश: कई घटनाएं हुई हैं जैसे, श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी, अलगाववादी तत्वों के द्वारा सरबत खालसा का आयोजन, खन्ना तथा फगवाड़ा में हिंदू नेताओं की हत्या, मालेरकोटला में कुरान शरीफ की बेअदबी, नामधारी संप्रदाय के प्रमुख की माता चंद कौर की हत्या तथा उत्तïर भारत के प्रसिद्धï गौसेवक स्वामी कृष्णानंद जी की गुमशुदगी को लेकर प्रशासन की असफलता पर विपक्षी दलों द्वारा निरंतर प्रहार जारी हैं। चाहे प्रशासन द्वारा बेअदबी की घटनाओं के जिम्मेवारी लोगों की गिरफ्तारी भी की गई है, कुरान की बेअदबी के लिए जिम्मेवार आम आदमी पार्टी के विधायक को भी गिरफ्तार किया गया। स्वयंभू सरबत खालसा की घटना के बाद प्रदेश भर में फैले तनाव को कम करने के लिए बहुत सारे लोगों की गिरफ्तारियां हुईं व सरकार ने चार सद्भावना रैलियां करके सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने का प्रयास किया है। उपरोक्त सभी घटनाओं में घटना की जांच तथा अपराधियों की गिरफ्तारी से पूर्व ही प्रदेश का वातावरण खराब करने के प्रयास हो चुके हैं।

तीसरा देश भर में राष्ट्रीय विचारों पर आधारित संगठन तथा उनके विचारों के लोगों द्वारा राजकीय क्षेत्र में भी मिल रही विजय का क्रम पंजाब में भी सुदूर देखने को मिल रहा है। स्थान-स्थान पर लोग राष्ट्रीय विचारों के साथ जुडऩे को उत्सुक हो रहे हैं। स्वभाविक ही है वर्षों से अलगाववाद की राजनीति कर रहे लोगों को इस राष्ट्रीय विचार की वृद्धिï भी हज्म नहीं हो रही है। वह उसे हर हाल में रोकना चाहते हैं। चाहे इसके लिए किसी की भी हत्या की जाए और समाज को आपस में लड़ाया जाए।

चौथा जैसा कि हम सब जानते हैं कि संघ के सामान्य स्वयंसेवक से लेकर अधिकारी तक व्यक्तिगत सुरक्षा नहीं रखते। इसलिए देशविरोधियों द्वारा उन पर कहीं पर भी हमला करना आसान होता है। परंतु इस घटना में यह बात ध्यान में आती है कि गगनेजा जी को बड़ी आसानी से उनके निवास, कार्यालय या कहीं आते-जाते हुए रास्ते में भी उन पर हमला किया जा सकता था। लेकिन ऐसा न कर शहर के व्यस्ततम क्षेत्र में हमला कर हमलावरों ने प्रशासन को चुनौती दी तथा वे विरोधी पार्टियों  को मौका दिया कि उनके दिये बयान सिद्ध साबित हो कि पंजाब में प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है। इसके अलावा संघ के बड़े अधिकारी पर हमला कर हिंदू समाज को उत्तेजित कर सड़कों पर उतरने पर मजबूर करना भी उनकी एक साजिश का हिस्सा था।

प्रभु कृपा से उनका यह मंसूबा पूरा न हो सका। उसका कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्यपद्धïत्तिï को साजिशकर्ता नहीं जानते हैं। 90 वर्षों के अपने जीवन काल में संघ समाज विरोधी शक्तियों से ही मुकाबला करता आ रहा है। पंजाब में चले आतंकवाद के दौरान मोगा, लुधियाना, बरनाला, डबवाली में भी शाखा में स्वयंसेवकों की नृशंस हत्या के बाद भी पूरे देश में संघ ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया जिससे हिंदू-सिख एकता पर प्रतिकूल असर पड़ता हो।

इस घटना में भी संघ ने अपने मूल चरित्र को ही प्रकट किया है। उसी का परिणाम है कि आज प्रशासन पूरी ताकत से हमलावरों को पकडऩे में जुटा हुआ है और निश्चित ही इसमें उसे सफलता मिलेगी ऐसा हमारा विश्वास है। पंजाब के कुशल डाक्टरों की एक टीम गगनेजा जी को स्वस्थ करने में पूरी तनमन्यता से जुटी हुई है। पंजाब भर में प्रत्येक नगर-कस्बे में सामान्य नागरिक उनके कुशलक्षेम के लिए हवन यज्ञ, हनुमान चालीसा तथा श्री सुखमनी साहिब के पाठ कर रहे हैं तथा पंजाब का पूरा मीडिया इस मामले में गंभीरता से अपनी भूमिका अदा कर रहा है। समस्या के समाधान का यह तरीका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का है, जिसके कारण आज पंजाब में भाईचारा बरकरार नजर आ रहा है तथा विरोधी शक्तियां पराजित दिखाई दे रही हैं।
रामगोपाल
प्रचार प्रमुख,
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पंजाब।
मो. 099157-14305

सोमवार, 2 मई 2016

कितना जायज है फ़ीस वृद्धि को ले कर अभिभावक आक्रोश !

पंजाब में पिछले दिनों निजी विद्याल्यों के बाहर फ़ीस आदि को ले कर चल रहे धरने प्रदर्शनों का दौर क्या संकेत है? क्या यह अभिभावक केवल आक्रोश है या अभिभावकों के गुस्से को राजनीति के खिलाडी अपने स्वार्थ के लिए उपयोग कर रहे हैं? आखिर राजनेताओं को अभिभावकों से इतना प्यार कहां से उमड़ पड़ा? जिस विद्या मन्दिर में आप अपने बच्चे को पढ़ा रहे हैं उस की फ़ीस आदि आप जानते हुए भी उसे वहीं दाखिल करवाते ही क्यों हैं ? एक ओर आप बच्चे को अच्छा ए सी कमरा, एसी बस, अच्छे अध्यापक और ए क्लास का इंफ्रास्ट्रक्चर चाहते हैं वहीं दूसरी ओर उसके अनुसार फ़ीस भी नहीं देना चाहते हैं तो क्या जादू के बल पर स्कूल मैनेजमेंट यह सब कर करेगी? 'सब कुछ मुफ़्त' के इस खेल में आखिर सरकार को भी हाथ जोड़ने पड़े जिसके पास अथाह खजाना है फिर सामाजिक संस्थाएं या निजी क्षेत्र ऐसे में कितने दिन और स्कूल चला लेंगें? और अगर निजी क्षेत्र या सामाजिक संस्थाएं विद्यालय चलाने में असमर्थ हो कर तौबा कर लेते हैं तो क्या अभिभावक सरकारी स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने को तैयार हैं?
 आक्रोश के पीछे है राजनीति-
पिछले समय से निजि विद्यालयों के विरुद्ध अभिभावकों का गुस्सा सार्वजनिक रूप से प्रकट होता दिख रहा है। आगे यह मुद्दा और भी विकट रूप धारण कर सकता है। क्या यह गुस्सा स्वयंस्फूर्त है या कृत्रिम है? यह गुस्सा सभी अभिभावकों का है या शिक्षा जैसे पवित्र मुद्दे पर भी अपनी राजनीति की सम्भावना तलाश रहे लोग अनावश्यक हवा तो नहीं दे रहे है? वैसे तो आज मंहगाई की मार से प्राय: हर व्यक्ति परेशान है। स्थिति कमोवेश यही है - यह मत पूछो कहां दर्द है। जहां हाथ लगाओ वहीं दर्द है! इसीलिए अधिक फ़ीस को कम करने की बात कह कर कोई भी सड़क छाप राजनेता भी अभिभावकों को अपने पीछे लगा ले रहा है। मजेदार बात है कि इस आक्रोश का शिकार भी सामान्य विद्यालय ही हो रहे हैं। क्योंकि इन्हीं विद्यालयों में सामान्य परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं। क्या वास्तव में जो विद्यालय खुलेआम शिक्षा को व्यापार में बदल रहे है वहां कोई विरोध हो रहा है? अभी तक तो सभी बड़े निजि स्कूल, कान्वेंट स्कूल इस विरोध से दूर दिख रहे हैं। अभी तो सामान्य निजी विद्यालय ही कथित अभिभावकों के निशाने पर लगते हैं। इसीलिए इस विरोध की नीयत पर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। कौन है इस आक्रोश को हवा देने वाले लोग? समाज और अभिभावकों को समय रहते इस विषय की गहराई में जाने की जरूरत है।  क्या सभी विद्यालय इस गुस्से और अविश्वास के काबिल हैं? सनातन धर्म, आर्यसमाज जैसी अनेक संस्थाएं शिक्षा को समर्पित रही हैं। इनका इस क्षेत्र में बहुत बड़ा योगदान भी रहा है। लेकिन कम फ़ीस के कारण अभिभावकों की अपेक्षा के अनुरूप शिक्षक और तन्त्र न दे पाने के कारण आज ये संस्थाएं अपना आकर्षण खोती जा रही हैं। समय की मांग के अनुरूप डीएवी ने अपने को बदला तो अधिक फ़ीस का लेबल भी लग गया। आखिर विकल्प क्या है? सामान्य फ़ीस पर फाइव स्टार सुविधाओं की अपेक्षा कितनी जायज है? आज देश में विद्या भारती संस्कार युक्त शिक्षा देने में सरकार के बाद सबसे बड़ा प्रयास है। विद्या भारती सामान्य फ़ीस में अच्छी शिक्षा देने के लिए संघर्षरत है। 80 से 90 प्रतिशत फ़ीस अध्यापकों के वेतन पर खर्च करती है। इसके अतिरिक्त समाज के गरीब वर्ग तक शिक्षा पहुंचाने के लिए अपनी सामर्थ्य से भी अधिक अनेक प्रयोग और प्रयास करती रहती है। लेकिन कथित अभिभावक आक्रोश की आड़ में 'गेहूं में घुन' भी पिस रहा है। कहां तो समाज को ऐसी संस्थाओं के प्रयास को प्रोत्साहित करना चाहिए और कहां सभी विद्यालयों के विरोध के साथ ही राजनीति प्रेरित या अनजाने में अभिभावक इन विद्यालयों के आगे भी नारे लगा रहे हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
निजि विद्यालयों का शिक्षा में योगदान- निजि स्कूलों का विरोध करने से पहले हमें शिक्षा क्षेत्र में इन विद्या मन्दिरों के योगदान का बारीकी से अध्ययन कर लेना होगा। शिक्षा हमारे यहां अत्यंत साधना का विषय रहा है। हमारे यहां गुरुकुल निशुल्क ही शिक्षा देते आएं हैं। सरकार तो अंग्रेजों के बाद ही योजनापूर्वक इस क्षेत्र में उतरी है। और जब से सरकार ने शिक्षा अपने हाथ में ली तभी से शिक्षा में नैतिक मूल्यों एवम् भवन आदि के रखरखाव में भारी न्यूनता आ गयी। जब तक शिक्षा गुरुकुलों या निजी क्षेत्र के हाथ में थी हम दुनिया में सबसे ज्यादा सुशिक्षित देश थे। आजादी के आंदोलन को गति और दिशा देने के लिए राष्ट्रीय विद्यालय प्रारम्भ हुए। लाला लाजपतराय, मदनमोहन मालवीय, तिलक एवम् स्वामी दयानन्द आदि महापुरुषों ने शिक्षा को अपने हाथ में लिया और देशभक्त पीढ़ी का निर्माण किया। आज भी सरकार से  ज्यादा नहीं तो बराबर अवश्य निजी विद्यालय ही शिक्षा का भार अपने कन्धों पर ढो रहे हैं। इस योगदान के लिए सरकार और समाज की शाबाशी के बदले  निजी विद्यालय अविश्वास और आक्रोश का केंद्र बनते जा रहे हैं। मजेदार बात है कि आज भी अभिभावकों की प्रथम पसन्द निजी विद्यालय ही बने हुए हैं। यह तो 'प्यार भी और इकरार भी सब तुम्हीं से' वाली स्थिति है।
विद्यालय और अभिभावकों में अविश्वास क्यों- हमारे यहां बहुत समय से सामाजिक संस्थाएं और कुछ कुछ व्यवसायिक लोग भी सफलतापूर्वक शिक्षादान का कार्य करते आ रहे हैं। पिछले दो दशकों से जब से निजि घरानों ने शिक्षा को शुद्ध व्यवसाय के रूप में अपनाया तब से थोड़ी समस्या खड़ी होने लगी है। कहना होगा कि कुछ लोगों ने अन्य  व्यवसायों की तरह शिक्षा से जी भर कर माया बटोरी। लेकिन यहां भी हमारे अभिभावक इस स्थिति की जिमेवारी से बच नहीं सकते जो फाइव स्टार की सुविधा बच्चों के लिए चाहते हैं और ज्यादा फीस पर हाय- तौबा मचाते हैं। अब जो व्यक्ति विद्यालय पर करोड़ों रुपया खर्च करेगा तो फिर वह वहां से अच्छी आमदनी क्यों नहीं चाहेगा? इस सारे घालमेल में सबसे ज्यादा शिकार सामाजिक संस्थाएं हो रही हैं जो अपनी आय का 80 प्रतिशत से भी अधिक अध्यापकों के वेतन पर खर्च कर देती हैं। अभिभावकों को गुस्सा प्रकट करते समय संस्थागत विद्यालयों और निजि विद्यालयों में अंतर करना होगा। इसके साथ ही निजि विद्यालयों को भी विद्यालय से कितना कमाना है इसकी कोई मर्यादा निश्चित करनी होगी। अधिक लाभ के लिए उन्हें अन्य व्यवसायों में उतरना चाहिए।
विद्या मन्दिर और अभिभावक परस्पर पूरक हैं- विद्या मन्दिर संचालकों को विचार करना होगा आखिर जो अभिभावक अपने बच्चों को विश्वास कर विद्यालयों के हवाले कर देते हैं आज उन्हीं के विरुद्ध यह जनाक्रोश क्यों दिख रहा है। यहीं पर अभिभावकों को भी सोचना होगा कि अगर निजी क्षेत्र विद्यालय समेट लेते हैं तो क्या सरकार हमारे बच्चों को इससे अच्छी शिक्षा दे सकती है? अत्यंत मधुर सम्बंधों अभिभावक- विद्या मन्दिर वाला यह 'माँ -बेटी'जैसा पावन रिश्ता आज 'सास-बहू' के रिश्ते के परस्पर अविश्वास और द्वेष का रूप क्यों लेता जा रहा है? लगता है इस अविश्वास को पाटने के लिए सभी को प्रयास करने होंगें।
सरकार समाज को आगे आना होगा- लगता है कि सरकार और समाज को इस सबमे अपनी सार्थक भूमिका निभानी होगी। बिना मतलब के स्कूल प्रबन्धकों पर दबाब बनाने से कुछ हासिल नहीं होगा। सभी विद्या मन्दिरों को लुटेरों के रूप में चित्रित करने से परस्पर अविश्वास बढ़ेगा इससे किसी का भी भला नहीं होगा। एक ओर सरकार का अध्यापकों को अच्छा वेतन, भवन और प्रयोगशाला आदि की अच्छी सुविधाएँ देने का दबाब और दूसरी और फ़ीस को लेकर तरह तरह की बयानबाजी सस्ती राजनीति के सिवाय और क्या है? सरकार को दरोगा की भूमिका से आगे बढ़कर सहयोगी की भूमिका अपनानी होगी। इसके साथ ही जो लोग वास्तव में ही खुलेआम एक एक लाख की एडमिशन फ़ीस तथा भारी भरकम ट्यूशन फ़ीस लेकर अन्य विद्यालयों को भी कटघरे में खड़ा कर रहे हैं सरकर को ऐसे तत्वों को कठोरता से नियंत्रित करना चाहिए। आज तक तो ऐसे सभी बड़े ब्रांड और क्रिश्चन स्कूल सरकार और समाज के गुस्से से अछूते हैं। अभी तक तो 'गुस्सा सास पर और मारना बिल्ली को' वाली स्थिति अधिक है।