शनिवार, 16 अप्रैल 2016

डॉ बाबासाहिब अम्बेडकर प्रश्नोत्तरी

प्रश्न 1- डॉ अम्बेडकर का जन्म कब हुआ था
उत्तर- 14 अप्रैल 1891
प्रश्न 2- डॉ अम्बेडकर का जन्म कहां हुआ था
उत्तर- मध्य प्रदेश इंदौर के महू छावनी में हुआ था
प्रश्न 3- डॉ अम्बेडकर के पिता का नाम क्या था
उत्तर- रामजी मोलाजी सकपाल था
प्रश्न 4- डॉ अम्बेडकर की माता का नाम क्या था
उत्तर- भीमा बाई
प्रश्न5- डॉ अम्बेडकर के पिता का क्या करते थे
उत्तर- सेना मैं सूबेदार थे
प्रश्न 6- डॉ अम्बेडकर की माता का देहांत कब हुआ
था
उत्तर-1896
प्रश्न 7- डॉ अम्बेडकर की माता के देहांत के वक्त उन
कि आयु क्या थी
उत्तर- 5 वर्ष
प्रश्न8- डॉ अम्बेडकर किस जाती से थे
उत्तर- महार जाती
प्रश्न 9- महार जाती को कैसा माना जाता था
उत्तर- अछूत (निम्न वर्ग )
प्रश्न10- डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं कहां बिठाया
जाता था
उत्तर- क्लास के बहार
प्रश्न 11- डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं पानी कैसे
पिलाया जाता था
उत्तर- ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके
हाथों परडालता था
प्रश्न12- बाबा साहब का विवाह कब और किस से
हुआ
उत्तर- 1906 में रमाबाई से
प्रश्न 13- बाबा साहब ने मैट्रिक परीक्षा कब पास
की
उत्तर- 1907 में
प्रश्न 14- डॉ अम्बेडकर के बंबई विश्वविद्यालय में
प्रवेश लेने से क्या हुवा
उत्तर- भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य
बन गये
प्रश्न 15- गायकवाड़ के महाराज ने डॉ अंबेडकर को
पढ़ने कहां भेजा
उत्तर- कोलंबिया विश्व विद्यालय न्यूयॉर्क
अमेरिका भेजा
प्रश्न 16- बैरिस्टर के अध्ययन के लिए बाबा साहब
कहां और कब गए
उत्तर- 11 नवंबर 1917 लंदन में
प्रश्न 17- बड़ौदा के महाराजा ने डॉ आंबेडकर को
अपने यहां किस पद पर रखा
उत्तर- सैन्य सचिव पद पर
प्रश्न 18- बाबा साहब ने सैन्य सचिव पद को क्यों
छोड़ा
उत्तर- छुआ छात के कारण
प्रश्न 19- बड़ौदा रियासत में बाबा साहब कहां ठहरे
थे
उत्तर- पारसी सराय में
प्रश्न 20- डॉ अंबेडकर ने क्या संकल्प लिया
उत्तर- जब तक इस अछूत समाज की कठिनाइयों को
समाप्त ने कर दूं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा
प्रश्न 21- डॉ अंबेडकर ने कौनसी पत्रिका निकाली
उत्तर- मूक नायक
प्रश्न 22- बाबासाहेब वकील कब बने
उत्तर- 1923 में
प्रश्न 23- डॉ अंबेडकर ने वकालत कहां शुरु की
उत्तर- मुंबई के हाई कोर्ट से
प्रश्न 24- अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को क्या संदेश
दिया
उत्तर- शिक्षित बनो संघर्ष करो संगठित रहो
प्रश्न 25- बाबा साहब ने बहिष्कृत भारत का
प्रकाशन कब आरंभकिया
उत्तर- 3 अप्रैल 1927
प्रश्न 26- बाबासाहेब लॉ कॉलेज के प्रोफ़ेसर कब बने
उत्तर- 1928 में
प्रश्न 27- बाबासाहेब मुंबई में साइमन कमीशन के सदस्य
कब बने
उत्तर- 1928 में
प्रश्न 28- बाबा साहेब द्वारा विधानसभा में माहर
वेतन बिल पेश कब हुआ
उत्तर- 14 मार्च 1929
प्रश्न 29- काला राम मंदिर मैं अछुतो के प्रवेश के लिए
आंदोलन कब किया
उत्तर- 03 मार्च 1930
प्रश्न 30- पूना पैक्ट किस किस के बीच हुआ
उत्तर- डॉ आंबेडकर और महात्मा गांधी
प्रश्न 31- महात्मा गांधी के जीवन की भीख मांगने
बाबा साहब के पास कौनआया
उत्तर- कस्तूरबा गांधी
प्रश्न 32- डॉ अम्बेडकर को गोल मेज कॉन्फ्रंस का
निमंत्रण कब मिला
उत्तर- 6 अगस्त 1930
प्रश्न 33- डॉ अम्बेडकर ने पूना समझौता कब किया
उत्तर- 1932
प्रश्न 34- अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का
प्रधानचार्य नियुक्त कियागया
उत्तर- 13 अक्टूबर 1935 को,
प्रश्न 35- मुझे पढे लिखे लोगोँ ने धोखा दिया ये शब्द
बाबा साहेब ने कहां कहे थे उत्तर- आगरा मे 18 मार्च
1956
प्रश्न 36- बाबा साहेब के पि. ए. कोन थे
उत्तर- नानकचंद रत्तु
प्रश्न 37- बाबा साहेब ने अपने अनुयाइयों से क्या
कहा था
उत्तर- इस करवा को मै बड़ी मुस्किल से यहाँ तक
लाया हु !
इसे आगे नहीं ले जा सकते तो पीछे मत जाने देना
प्रश्न 38- देश के पहले कानून मंत्री कौन थे
उत्तर- डॉ अम्बेडकर
प्रश्न 39- स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना
किस ने की
उत्तर- डॉ अम्बेडकर
प्रश्न 40- डॉ अंबेडकर ने भारतीय संविधान कितने
समय में लिखा
उत्तर- 2 साल 11 महीने 18 दिन
प्रश्न 41- डा बी.आर. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्मं कब और
कहा अपनाया
उत्तर- 14 अक्टूबर 1956, दीक्षा भूमि, नागपुर
प्रश्न 42- डा बी.आर. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्मं कितने
लोगों के साथ अपनाया
उत्तर- लगभग 10 लाख
प्रश्न 43- राजा बनने के लिए रानी के पेट की जरूरत
नहीं,
तुम्हारे वोट की जरूरत है ये शब्द किस के है
उत्तर- डा बी.आर. अम्बेडकर
प्रश्न 44- डा बी.आर. अम्बेडकर के दुवारा लिखित
महान पुस्तक का क्या नाम है
उत्तर- दी बुद्ध एंड हिज धम्मा
प्रश्न 45- बाबा साहेब को किस पुरस्कार से
सम्मानित किया गया
उत्तर- भारत रत्न (1990)
प्रश्न 46- बाबा साहेब ने किस राजनैतिक पार्टी
का गठन किया
उत्तर- रिपब्लिकन पार्टी
प्रश्न 47- बाबा साहब ने कितनी प्रतिज्ञाएं की
उत्तर- 22
प्रश्न 48- संविधान निर्माता किसे माना जाता है
उत्तर- डॉ भीमराव अंबेडकर
प्रश्न 49- डॉ आंबेडकर ने कौन कौन सी डिग्री
हासिल की
उत्तर- एम. ए , पी.एच.डी.,(कोलम्बिया )
डी.एस.सी.,(लंदन) एल. एल. डी., (कोलम्बिया)
डी.लिट.(उस्मानिया ) बार. अंट. ला.(लंदन)
प्रश्न 50- बाबा साहब ने किस राजनैतिक पार्टी
का गठन किया
उत्तर- रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया
प्रश्न 51- बाबा साहेब का महा परीनिर्वाण कब
हुआ
उत्तर- 6 दिसंबर 1956
प्रश्न 52 डा बी.आर. अम्बेडकर ने अंतिम सांस कहा
ली
उत्तर- 26,अलीपुर रोड दिल्ली

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

वर्षप्रतिपदा पर विशेष

प्रकृति के सौंदर्य पर निखार ,
खेतों में फसलों की बहार ,
लेकर आता है नया साल ।
नव पत्र-पुष्प पेड़ पौधों में ,
जगत को चहूं और रंगों में ,
लेकर आता है नया साल ।                               चित्त में नव संकल्प-विकल्प ,
मन में नव उमंग नव तरंग ,                               लेकर आता है नया साल ।                              अंतकरण में नव प्रवाह नव उत्कर्ष ,
जीवन में नव राह नव हर्ष ,
लेकर आता है नया साल ।
सृष्टि की रचना का प्रथम दिन ,
भारतीय संवतो का प्रथम दिन ,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को आता है नया साल ।
कला से रचना होती है ,
कला की तरफ ,
ले कर जाता है नया साल ।                          सौंदर्यबोध एक अनुभूति है प्रकृति की ,
सौंदर्यबोध की तरफ ,                                      ले कर जाता है नया साल ।
राष्ट्रभक्ति से प्रगति होती है देश की ,
राष्ट्रीयता की तरफ ,
ले कर जाता है नया साल ।
युगाब्द 5118,विक्रमी संवत2073
चैत्र शुक्ल प्रतिप्रदा की हार्दिक बधाई।
       हर्ष कुमार

मंगलवार, 29 मार्च 2016

आरएसएस नहीं तो क्या झूठ, फरेब का व्यापार करने वाले वामपंथी या आशुतोष जैसे पत्रकारिता को बदनाम करने वाले होंगे भगत सिंह के बारिस!


देशभक्ति के प्रतीक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को कटघरे में खड़ा करने, संघ की देशभक्ति, क्रांतिकारियों के प्रति प्रेम या स्वतन्त्रता आंदोलन में संघ के योगदान आदि पर प्रश्न उठाने के दुष्प्रयास पहली बार नहीं हो रहे हैं। ये प्रयास एक बड़े षड्यंत्र अर्थात अपनी बेईमानी जगजाहिर न हो, उसकी ओर समाज का ध्यान न जाए या पकड़े गए तो भारी जनाक्रोश का सामना न करना पड़े इसलिए देशभक्ति के प्रायः बन चुके संघ को ही प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दो। इनकी स्थिति ठीक ऐसी ही है 'मेरे नंगे होने पर कोई सवाल न करे तो सामने वाले के कपड़े भी उतार दो'। अगर प्रश्न ईमानदार हों तो चिंता की बात नहीं लेकिन ये लोग अपने ही खड़े किए प्रश्नों के उत्तर भी नहीं चाहते। इनको तो गाली दे कर भाग जाना होता है। प्रश्नों के उत्तर के लिए रुकें भी क्यों, क्योंकि इनको अपनी बेमानी का पता जो होता है।
  संघ को तो भगवान कृष्ण की तरह बचपन से ही विरोध झेलने की आदत सी बन गयी है। संघ विरोधियों की समस्या 'मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यूँ ज्यूँ दवा की' की तरह है। परेशान हैं बेचारे करें तो क्या करें? विरोध करें तो, न करें तो जनता का इस संगठन के प्रति प्रेम बढ़ता ही जा रहा है। पिछले दिनों संघ विरोध में कुछ नए चेहरे भी उभरे हैं। संघ विरोध अब कुछ दुर्योधनवंशी लोगों के लिए जनून की हद तक बढ़ता जा रहा है। अपने विरोध के पागलपन में सत्य, नैतिकता आदि को बहुत पीछे छोड़ दे रहे हैं ये लोग। संघ विरोध में छाज तो बोले लेकिन अब तो आशुतोष जैसी छलनियां भी मैदान में उतरती देखी जा सकती हैं। बेशर्मी की हद तक झूठ का सहारा लेने में इतिहास के अनेक खलनायकों को भी मात करते दिख रहे हैं। करें भी क्या बेचारे सवाल अस्तित्व का जो खड़ा हो गया है! कल तक आम जनता की खून पसीने की कमाई पर पल रहे, पञ्च सितारा संस्कृति में आकण्ठ डूबे ये लोग अब सुविधाओं की आपूर्ति बन्द हो जाने पर बिलों से बाहर आ कर बदहवाश से घूम रहे हैं, जहर उगल रहे हैं। एक ओर सत्ता मुंह नहीं लगा रही और इधर जनता जागरूक हो रही है।  देश और दुनिया में मुंह छुपाते फिर रहे हैं । लेकिन इनका ये प्रयास भी उसी तरह बेकार हो रहा है जैसे एक नई नवेली दुल्हन का अचानक ससुर के आने सास के घूंघट लेने को कहने पर सर ढकने के चक्कर में बेचारी घाघरा उठा मुंह छुपा लेती है।
  श्री आशुतोष ने अपने लेख में एक के बाद एक बचकानी बातें कही हैं। कहते हैं संघ को भगत सिंह से अचानक प्यार हो गया है। ये महाशय! भूल रहे हैं कि संघ तो क्रन्तिकारी देशभक्तों का प्रारम्भ से ही दीवाना रहा है। 2007 में भगत सिंह जन्मशताब्दी केवल संघ ने धूमधाम से मनाई थी। आशुतोष और इनकी गैंग का भगत सिंह प्रेम उस समय कहां गायब हो गया था? रही बात नेताजी सुभाष और सरदार पटेल के प्रति संघ की हमदर्दी या इन महापुरुषों के संघ के प्रति स्नेह की तो कहना पड़ेगा कि आशुतोष जैसों को उस ऊंचाई या गहयाई तक जाने में कई जन्म लेने पड़ेंगे। संघ संस्थापक डा. हेडगेवार के नेता जी सुभाष से सम्बद्ध, नेता जी का स्वयं डा. साहिब के दर्शन के लिए नागपुर जाना और इतना ही नहीं तो जेल से रिहा होने पर आशुतोष के नायक! श्री जवाहर लाल नेहरू के पिता जी स्वयं श्री मोतीलाल नेहरू का स्वागत के लिए खड़े होना क्या आशुतोष जानते हैं? इतना ही नहीं लाहौर बम कांड के बाद राजगुरु का अंग्रेज पुलिस से सुरक्षित स्थान के लिए विश्वस्त सूत्र डा. हेडगेवार के पास जाना और डा. हेडगेवार द्वारा उनकी योग्य व्यवस्था करने को क्या कहेंगे जनाब! रही सरदार पटेल का संघ पर प्रतिबन्ध की बात तो स्वयं पटेल द्वारा संघ पर प्रतिबन्ध को लेकर नेहरू को लिखे पत्र पढ़ लें, तो इन्हें आयना स्वयं दिख जायेगा।
गांधी, नेहरु, पटेल, और भगत सिंह और डा. हेडगेवार के परस्पर सम्बद्ध क्या थे, कैसे थे? अच्छा है महापुरुषों के परस्पर सम्बंधों पर सार्वजनिक टिप्पणियों से बचा जाए। अपनी सोच के अनुसार नेहरू या गांधी की प्रशंसा करना, उनके भक्त होना एक बात है। इसमें कुछ गलत भी नहीं है। लेकिन इस प्रयास में अन्य महापुरुषों की खिल्ली उड़ाना यह वामपंथी या अशुतोषि ढंग त्यागना ही होगा। आज तक इन्होंने ऐसा ही तो किया गया। योजनापूर्वक गांधी नेहरू परिवार की स्तुति तक ही सारे स्वंतंत्रता आंदोलन को समेट दिया था। आजादी के बाद सारी योजना- परियोजनाओं को गांधी नेहरू को समर्पित कर दिया। देश की स्वंतत्रता आंदोलन में जवानियाँ समर्पित करने वाले सावरकर बन्धु, चाफेकर बन्धु जैसे असंख्य देशभक्त गुमनामी के अँधेरे में धकेल दिए गए। क्या यह राष्ट्रीय अपराध नहीं है? इतना ही नहीं भगतसिंह के ये उपासक वर्षों तक नई पीढ़ी को भगतसिंह को आतंकवादी पढ़ाये जाते मूक हो कर देखते रहे। भगतसिंह के प्रति आपकी भक्ति घास चरने चली गयी थी क्या? कोर्ट में जाकर ऐसे अंश हटाने का काम किसी वामपंथी या अशुतोषि ने नहीं बल्कि साम्प्रदायिक! संघ के लोगों ने ही किया है महाशय! इसके आलावा भगत सिंह आर्यसमाजी थे, गीता पाठ करते थे। भारत भक्ति ही उनका एकमात्र धर्म था आदि ऐसी बातें प्रयत्नपूर्वक देश से छुपाई गयीं। हाँ! अंध ईश्वर भक्ति या धर्मभक्ति की आलोचना की है उन्होंने, लेकिन इसमें गलत क्या है? याद रखें भगत सिंह एवम् अन्य क्रन्तिकारी कम्युनिस्ट कत्तई नहीं थे। वामपंथियों ने अपनी राजनीति को स्वीकार्य बनाने के लिए कांग्रेस के साथ मिलकर भगत सिंह आदि को वामपंथी सिद्ध करने का भयंकर षड्यंत्र किया। साम्यवाद के प्रति प्रेम रूस में लेनिन आदि की तात्कालिक सफलता का सहज परिणाम था। इसके साथ एक और तथ्य ध्यान में रखना होगा कि वामपंथी या साम्यवादी होना एक बात है और इन वादों की आड़ में देश से गद्दारी दूसरी बात है जिसे भगत सिंह जैसे लोग स्वप्न में भी स्वीकार नहीं करते। साम्यवादी और अशुतोषि गैंग पहले रूस, चीन आदि देशों में स्वदेश से गद्दारी के बदले मलाई खाते रहे जब उन्हें इनकी ओकात पता लग गयी और उन्होंने दुत्कार दिया तो फिर भारत में कांग्रेस या अन्य स्रोत खोजने लग पड़े।
जहां तक संघ के गांधी के समर्थन या विरोधी होने की बात है तो अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और भारत विभाजन को  छोड़कर संघ गांधी दर्शन का प्रारम्भ से समर्थक रहा है। हाँ! संघ ने गांधी या किसी और को राष्ट्रपिता आदि की अवधारणा का कभी समर्थन नहीं किया। हमारा मानना है कि राष्ट्र की केवल सन्तान होती है पिता, माता या बहू आदि नहीं। एक पक्ष और ध्यान देने योग्य है। आज गांधी जी के प्रिय विषय स्वदेशी, खादी, लघु उद्योग या ग्राम विकास आदि पर गम्भीर प्रयास भी साम्प्रदायिक! संघ के लोग ही कर रहे हैं! गांधी-नेहरू समर्थक तो गांधी जी की एक इच्छा पूरी करने के लिए ईमानदार प्रयास करते दिख रहे हैं अर्थात कांग्रेस मुक्त भारत! और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों को बाजार में अपनी रोजी रोटी के लिए बेचने वाले वामपंथी और असुतोषि विरादरी इस महान! कार्य में सहयोगी बन रहे हैं। वास्तव में आशुतोष विरादरी को भगत सिंह या कन्हैया से कहीं ज्यादा प्रेम अपनी पंच सितारा सुख सुविधाओं से है। एक और प्रश्न इन्होंने उठाया है कि अगर आज भगत सिंह होते तो कन्हैया का समर्थन और संघ का तीव्र विरोध करते। अगर थोड़ी देर के लिए ऐसा मान भी लें तो भगत सिंह आप जैसे  सत्ता के दलालों को तो अंग्रेज का अंश और वंश मान कर बम और पिस्तौल की भाषा में जरूर समझाते। इसलिए भगत सिंह को बाजार में अपनी राजनीति के लिए बेचने के दिन लद गए आशुतोष जी!

मंगलवार, 1 मार्च 2016

' जालन्धर मेगा स्लम सर्वे ' जवानी को सेवा पथ पर बढ़ाने का एक अभिनव प्रयोग

युवकों की जवानी और बहता पानी इसका सदुपयोग अगर देश हित में हो जाए तो देश का परिदृश्य बदलते देर नहीं लगेगी। इस असीमित ऊर्जा का सार्थक उपयोग न होने पर देश और समाज को भारी नुकसान झेलना पड़ता है। लक्ष्य के आभाव में जवानी कैसा तांडव कर सकती है अभी अभी हरियाणा में जाट आरक्षण के नाम पर मचायी गयी तबाही इसका ताजा एवम् दुखदायक उदाहरण है। इसी प्रकार जेएनयू में सरकारी पैसे के बल पर पल रहे युवा देश विरोध में कार्य करने में शर्मिंदगी अनुभव करने के बजाए अपना गौरव मानते हैं। इसी प्रकार अनियंत्रित पानी प्रतिवर्ष  कितनी ही उपजाऊ भूमि के साथ जान मॉल की क्षति कर सकता है यह हम सब जानते ही हैं।
पिछले दिनों सर्वहितकारी शिक्षा समिति (पंजी.) पंजाब  ने युवकों की अथाह ऊर्जा को राष्ट्र सेवा में उपयोग करने के लिए पंजाब केसरी लाला लाजपतराय के 150 जन्मवर्ष को निमित बना कर दो प्रमुख प्रयोग किए। सामान्य धारणा है कि आज के युवक अच्छा साहित्य नहीं पढ़ते। समिति ने पंजाब में युवकों तक सत साहित्य पहुंचाने के लिए साहित्य रथ चलाया। युवकों ने सारी धारणाओं को चकनाचूर कर दिया। साहित्य रथ से अब तक  छात्र लगभग 5 लाख की पुस्तकें खरीद चुके हैं। इस प्रकल्प ने सिद्ध कर दिया कि अगर अच्छा साहित्य उपलब्ध करवाया जाए तो हमारे युवा खूब रूचि दिखाते हैं। इसी प्रकार अभी तक प्राप्त आंकड़ों के अनुसार लाला लाजपतराय 150 जन्म वर्ष पर आयोजित कार्यक्रमों में 10,000 से ज्यादा छात्र शामिल हो चुके हैं। उल्लेखनीय है कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों की सहभागिता पूर्णत: स्वैच्छिक व् स्वयंस्फुर्त थी।
स्लम सेवा की ओर जवानी- साहित्य रथ के समय छात्रों से बात करते समय उनसे लाला लाजपतराय के प्रेरक जीवन से प्रेरणा ले कर समाज सेवा के लिए आगे आने का आह्वान किया गया था। इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए हमने 'स्लम सर्वेक्षण' की योजना बनाई। उसके लिए छात्रों की एक दिवसीय कार्यशाला करने की योजना की। इस कार्यशाला में 8 कालेजों से 180 छात्रों से भाग लिया। कार्यशाला में समाज सेवा में छात्रों की रूचि पर्याप्त उत्साहवर्धक थी।  प्रस्तावना सत्र में सर्वहितकारी पंजाब के प्रान्त संगठनमंत्री श्री विजय नड्डा ने छात्रों को देश व् समाज के प्रति उनके दायित्व का स्मरण कराया। उन्होंने प्रत्येक छात्र से जीवन का लक्ष्य 'भारत सेवा' रखने का आह्वान किया। उन्होने कहा कि डॉक्टर, इंजनियर, आईएएस, वैज्ञानिक, राजनेता आदि हमने देश सेवा के लिए बनना है। इसी सत्र में युवा आईएएस श्री जितेंद्र जोरवार ने छात्रों को समाज सेवा के लिए आगे आने का आह्वान किया। दूसरे सत्र में सर्वेक्षण प्रोजेक्ट डाइरेक्टर श्री संजीव नवल ने छात्रों से सर्वेक्षण की प्रक्रिया पर विस्तृत चर्चा की। इसी सत्र में वरिष्ठ आईएएस एच एस नन्दा डिविजनल कमिश्रर ने छात्रों को समाज सेवा के पथ पर आगे आने के लिए बधाई दी। उन्होंने छात्रों से सर्वेक्षण पर न रुक कर गरीब वर्ग की समस्याओं के समाधान में प्रभावी भूमिका निभाने का आग्रह किया। इस कार्य के लिए श्री नन्दा जी ने अपना सहयोग और सेवा प्रस्तुत की। इसके बाद  विद्यार्थी कालेज के अनुसार बैठे। इन बैठकों में प्रधानाचार्य श्री देश राज शर्मा, संघ के पंजाब प्रान्त सह संघचालक  ब्रिगे. जगदीश गगनेजा,  प्रान्त प्रचार प्रमुख श्री रामगोपाल जी तथा श्री संजीव नवल  ने छात्रों से बात की। अंतिम सत्र में श्री विजय नड्डा ने छात्रों के प्रश्नों के उत्तर दिए। छात्रों को सम्बोधित करते हुए श्री देश राज जी ने समस्या समाधान से पहले उसे समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने सर्वेक्षण के लिए बड़ी संख्या में छात्रों के शामिल होने को सरहनीय बताया। श्री गगनेजा जी ने अपने रोचक अंदाज में छात्रों से देश समाज सेवा के लिए सदैव आगे आने का आह्वान किया।
छात्र अपनाएंगे स्लम बस्तियां- जालन्धर में कालेज छात्र समाज सेवा में नया अध्याय लिखेंगे। योजनानुसार सर्वेक्षण के पश्चात छात्रों को सेवा बस्तियों में सेवा व संस्कार केंद्र प्रारम्भ करने का आग्रह किया जायेगा। आगे चल कर इच्छुक छात्रों को व्यवहारिक प्रशिक्षण भी देने की योजना है। प्रयास है कि कालेज अपनी रुचि और सामर्थ्य के अनुसार एक या दो बस्तियां स्थायी रूप से अपना लें। कालेज अपनी तय  बस्तियों में  विद्यार्थी व  अध्यापकों के माध्यम से बस्ती विकास के प्रकल्प प्रारम्भ करे। कालेज द्वारा बस्ती गोद ले लेने से बस्ती विकास में सातत्य बना रहेगा। प्रारम्भिक उत्साहजनक प्रतियुतर से लगता है कि जालन्धर में 10 कालेज लगभग 10 बस्तियां अपना लेंगे। इस बस्तियों में छात्र संस्कार केंद्र, साक्षरता केंद्र तथा सरकारी योजना का लाभ जरूरतमन्द तक पहुंचने के लिए योजनाओं की जानकारी और उनमे जन सहभाग सुनिश्चत करने के लिए जनजागरण आदि कार्य अपने हाथ में लेंगे। आज जब राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी तथा धन कुवेर समाज के प्रति अपने दायित्व में सार्थक और प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं तो लगता है देश की जवानी को यह चुनोती स्वीकार करनी होगी। और सब जानते हैं कि जो जवानी चुनोती  स्वीकार न करे उसे जवानी कहा भी कैसे जा सकता है? कहा भी गया है-
होता है जो होने दे यह पौरषहीन कथन है,
होगा वही जो हम चाहेंगे यही युवापन है। युवाओं के इन सेवा कार्यों से कितने जीवन व घर रोशन होंगे, यह एक विचारणीय विषय हो सकता है। लेकिन अंग्रेजी कहावत 'seeing is believing' के अनुसार सबसे बड़ा लाभ युवकों को जीवन का असली अर्थ ध्यान में आएगा। इनके कोमल मन में गरीबों के प्रति दर्द एक जिम्मेवार नागरिक बनाएगा। इन्हें असली भारत का साक्षात्कार होगा। इसी साक्षात्कार ने नरेंद्र विवेकानन्द बन सकता है, मार्गरेट नोबुल निवेदिता बन सकती है तो हमारे आज के युवाओं के जीवन में सकारत्मक परिवर्तन क्यों नहीं आ सकता? अपनी आँखों से, नजदीक से गरीबी देखने के कारण युवा समाज के प्रति अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होंगे। जीवन में जब कभी ये कुछ करने की स्थिति में आएंगे तो भरष्टाचार आदि रोगों से इन्हें दूर रहेंगे। ऐसे जागरूक, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ नागरिक ही तो किसी देश और समाज की असली ताकत होते हैं। ऐसे नागरिक निर्माण करने में सर्वहितकारी शिक्षा समिति यह छोटा सा प्रयास है यह प्रकल्प

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

बड़े लक्ष्य के लिए आगे आते छोटे छोटे हाथ

जिस उम्र में बच्चे टॉफी, ब्रांडेड कपड़े एवम् पॉकेट मनी के लिए घर में तूफान मचाते दिखते हैं उसी उम्र में अपने समवयस्क गरीब बच्चों के लिए शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अपनी जेब से पैसे देने के अद्भुत कार्यक्रम का नाम है - समर्पण। यह किन्ही एक दो बच्चों का जोश में  आकर गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए अपने पॉकेट मनी से कुछ राशि दान दे देने की कोई आकस्मिक घटना विशेष नहीं है बल्कि प्रतिवर्ष बसन्त पंचमी के दिन पंजाब में लगभग 40,000 बच्चे इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं। बच्चों को प्रेरणा मिलती है विद्या भारती के अधिकारीयों, आचार्यों एवम् विद्या मन्दिर प्रबन्ध समिति के सदस्यों से जो स्वयं भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं। नई पीढ़ी को लेकर निराशाभरी बातें करने वालों की जानकारी हेतु बता दें कि यह चित्रण किसी देवलोक में घटित होने वाली  घटना का नहीं है बल्कि सम्पूर्ण देश में विद्या भारती द्वारा संचालित लगभग 15000 विद्यालयों में प्रतिवर्ष का स्थायी आयोजन है। अपने पंजाब में भी सर्वहितकारी शिक्षा समिति द्वारा संचालित 100 से अधिक विद्यालयों में प्रतिवर्ष होने वाला समर्पण कार्यक्रम एक स्वभाव बन चुका है। विकास के लिए केवल सरकार की ओर ताकते न रह कर अपना थोड़ा ही क्यों न हो उस हेतू अपना सहयोग देने का संस्कार बाल मन पर अंकित करने का सफल प्रयास है समर्पण।आज जम्मू- कश्मीर, उत्तराखण्ड व देश के पूर्वोत्तर में इसी समर्पण राशि से अनेक विद्या मन्दिर खड़े हो चुके हैं। अनेक विद्या मन्दिर निर्माणाधीन हैं। आखिर बच्चों से कितनी धनराशि एकत्र हो जाती होगी? आपका क्या अनुमान है? आपको जानकर सुखद आश्चर्य एवम् आनन्द होगा कि प्रतिवर्ष पंजाब के हमारे ये नन्हें- मुन्ने लगभग 30 लाख रूपये का सहयोग अपने हम उम्र गरीब बच्चों के लिए एकत्र करते हैं। बून्द- बून्द घड़ा भरने या गिलहरी जैसे योगदान से इतना बड़ा कार्य हो जाता है, यह बहुत लोगों की कल्पना से बाहर है।
समाज के प्रति अपनत्व एवम् दर्द-
          देश हमें देता है सब कुछ।
          हम भी तो कुछ देना सीखें।।
इस भाव को बाल मन में अंकित करने का सफल प्रयास एवम् प्रयोग है समर्पण कार्यक्रम। कई बार अनेक सुझाव आते हैं कि बच्चों से दस-बीस रूपये लेने के बजाए बड़े उद्योगपतियों से मांगने पर ज्यादा बड़ी राशि प्राप्त हो सकती हैं। इस बात में बजन होने के बाद भी हमारे अधिकारी समाज से सहयोग इकठा करने के लिए प्रेरित करने के बाद भी बच्चों से सहयोग मांगने पर पूरा आग्रह बनाए रखते हैं। क्योंकि इस सहयोग राशि में राशि भी ज्यादा बाल मन में देश एवम् समाज के प्रति दर्द एवम् अपनापन उत्पन्न कर गरीब वर्ग के लिए कुछ करने का व्यवहारिक प्रशिक्षण देना है। विद्या भारती का सुविचारित मत है कि आज अगर हमारे पूंजीपतियों, नेताओं एवम् प्रसाशनिक अधिकारियों के मन में यह दर्द पैदा हो जाए तो देश का आर्थिक दृश्य बदलते देर नहीं लगेगी। हमारे विद्या मन्दिरों में औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त छात्र के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए अनेक प्रयोग और उपक्रम लिए जाते हैं। वर्तमान समय में समाज शास्त्री नई पीढ़ी में इन्हीं गुणों की आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं। हमारे विद्या मन्दिरों से शिक्षा प्राप्त हमारे पूर्व छात्र समाज जीवन में अपने इन्हीं गुणों एवम् व्यवहार से अलग पहचान एवम् सम्मान प्राप्त करते हैं।
अभिनव प्रयोग है 'समर्पण' - स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि जीवन में अपना हाथ ऊपर अर्थात देने की मुद्रा में रहना चाहिए। जैसा हम सोचते हैं, इच्छा करते हैं ईश्वर हमें वैसी स्थिति में पहुंचा देते हैं। जब हम 'बसुधैव कटुम्बकम' का उद्घोष कर सम्पूर्ण विश्व के लिए जीते थे तब हम विश्व गुरु थे। हमारे यहां सोने और चांदी का धुंआ निकलता था। इसके विपरीत जबसे हमने मैं ...मैं
का राग अलापना शुरू किया और सब जगह से लेने के लिए हाथ पसारने शुरू कर दिए तो हम भिखारी जैसी अवस्था में पहुंच गए। हमें हजारों वर्षों की गुलामी और घोर गरीबी की यातना झेलनी पड़ी। आज यद्यपि हम स्वतंत्र हो गए हैं लेकिन मानसिकता में स्वाभिमान और दूसरों के लिए जीने का स्वभाव नहीं बना इस के परिणामस्वरूप आज भी 40/ 50 करोड़ देशवासी भयंकर गरीबी का सामना करने को बेबश हैं। करोड़ों बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। हमारे यहां विकास का प्रारूप भी कुछ ऐसा बिचित्र सा है कि प्रतिवर्ष करोड़पतियों की संख्या एवम् झुग्गी झोपड़ियों की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज हो रही है। हमारे देश में एशिया के सबसे ज्यादा दौलतमंद धन्नासेठ हैं। एक बार हमारे मन में सम्पूर्ण समाज के प्रति अपनापन और प्रत्येक देशवासी के प्रति ममत्व उत्पन्न हो जाए तो झुग्गी झोंपड़ी मुक्त भारत बनते देर नहीं लगेगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा प्राप्त विद्या भारती नई पीढ़ी के बाल मन में ऐसे ही श्रेष्ठ संस्कार पैदा करने के लिए प्रयासरत है। इसी प्रयास में प्रमुख कार्यक्रम है समर्पण।
कैसे करते हैं समर्पण- विद्या मन्दिरों में समर्पण को लेकर अनेक प्रकार के प्रयोग किए जाते हैं। समर्पण से कुछ दिन पूर्व आचार्य कक्षाओं में समर्पण का महत्व एवम्  पद्धति को लेकर चर्चा करते हैं। कार्यक्रम वाले दिन बच्चे माँ सरस्वती के चित्र के आगे प्रणाम कर अपनी सहयोग राशि भेंट करते हैं। कार्यक्रम संस्कार एवम् भावप्रद रहे इसके लिए विद्यालय में उत्सव जैसा माहौल बनाया जाता है। लेने की तो होड़ समाज में सर्वदूर देखी जाती है लेकिन समाज के लिए देने को उत्सव में बदलने का प्रयास किया जाता है।  देशभक्ति के गीत, समाज के आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को कैसी परिस्थितयों से जूझना पड़ता उसका सचित्र व सजीव चित्रण के लिए फ़िल्म व् लघु चित्रपट भी दिखाए जाते हैं। बच्चा समर्पण वाले दिन माता पिता से मांग कर धन राशि न लाकर वर्ष भर संग्रह करे, ऐसा आग्रह किया जाता है। बच्चे अपने गली मुहल्ले व गाँव में भी संग्रह करते हैं। समाज के लिए मांगने का भी अपना एक संस्कार एवम् आनन्द रहता है इस कार्यक्रम से यह संस्कार बाल मन में अंकित हो जाता है। समर्पण कार्यक्रम में आचार्य एवं प्रबन्ध समिति के सदस्य भी उत्साहपूर्वक सहभाग करते हैं। प्रतिवर्ष समर्पण कार्यक्रम करने के कारण अब तो बच्चे व् उनके अभिभावक बसन्त पंचमी की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। प्रत्येक विद्यार्थी समर्पण करते समय यही गुनगुनाता रहता है-
ढूंढे से भी न दर्शन हों दीन दुखी के यहां कभी।
अन्न वस्त्र गुह्यआत्म ज्ञान के भरे रहें भण्डार सभी।।