जिस उम्र में बच्चे टॉफी, ब्रांडेड कपड़े एवम् पॉकेट मनी के लिए घर में तूफान मचाते दिखते हैं उसी उम्र में अपने समवयस्क गरीब बच्चों के लिए शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए अपनी जेब से पैसे देने के अद्भुत कार्यक्रम का नाम है - समर्पण। यह किन्ही एक दो बच्चों का जोश में आकर गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए अपने पॉकेट मनी से कुछ राशि दान दे देने की कोई आकस्मिक घटना विशेष नहीं है बल्कि प्रतिवर्ष बसन्त पंचमी के दिन पंजाब में लगभग 40,000 बच्चे इस कार्यक्रम में भाग लेते हैं। बच्चों को प्रेरणा मिलती है विद्या भारती के अधिकारीयों, आचार्यों एवम् विद्या मन्दिर प्रबन्ध समिति के सदस्यों से जो स्वयं भी इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं। नई पीढ़ी को लेकर निराशाभरी बातें करने वालों की जानकारी हेतु बता दें कि यह चित्रण किसी देवलोक में घटित होने वाली घटना का नहीं है बल्कि सम्पूर्ण देश में विद्या भारती द्वारा संचालित लगभग 15000 विद्यालयों में प्रतिवर्ष का स्थायी आयोजन है। अपने पंजाब में भी सर्वहितकारी शिक्षा समिति द्वारा संचालित 100 से अधिक विद्यालयों में प्रतिवर्ष होने वाला समर्पण कार्यक्रम एक स्वभाव बन चुका है। विकास के लिए केवल सरकार की ओर ताकते न रह कर अपना थोड़ा ही क्यों न हो उस हेतू अपना सहयोग देने का संस्कार बाल मन पर अंकित करने का सफल प्रयास है समर्पण।आज जम्मू- कश्मीर, उत्तराखण्ड व देश के पूर्वोत्तर में इसी समर्पण राशि से अनेक विद्या मन्दिर खड़े हो चुके हैं। अनेक विद्या मन्दिर निर्माणाधीन हैं। आखिर बच्चों से कितनी धनराशि एकत्र हो जाती होगी? आपका क्या अनुमान है? आपको जानकर सुखद आश्चर्य एवम् आनन्द होगा कि प्रतिवर्ष पंजाब के हमारे ये नन्हें- मुन्ने लगभग 30 लाख रूपये का सहयोग अपने हम उम्र गरीब बच्चों के लिए एकत्र करते हैं। बून्द- बून्द घड़ा भरने या गिलहरी जैसे योगदान से इतना बड़ा कार्य हो जाता है, यह बहुत लोगों की कल्पना से बाहर है।
समाज के प्रति अपनत्व एवम् दर्द-
देश हमें देता है सब कुछ।
हम भी तो कुछ देना सीखें।।
इस भाव को बाल मन में अंकित करने का सफल प्रयास एवम् प्रयोग है समर्पण कार्यक्रम। कई बार अनेक सुझाव आते हैं कि बच्चों से दस-बीस रूपये लेने के बजाए बड़े उद्योगपतियों से मांगने पर ज्यादा बड़ी राशि प्राप्त हो सकती हैं। इस बात में बजन होने के बाद भी हमारे अधिकारी समाज से सहयोग इकठा करने के लिए प्रेरित करने के बाद भी बच्चों से सहयोग मांगने पर पूरा आग्रह बनाए रखते हैं। क्योंकि इस सहयोग राशि में राशि भी ज्यादा बाल मन में देश एवम् समाज के प्रति दर्द एवम् अपनापन उत्पन्न कर गरीब वर्ग के लिए कुछ करने का व्यवहारिक प्रशिक्षण देना है। विद्या भारती का सुविचारित मत है कि आज अगर हमारे पूंजीपतियों, नेताओं एवम् प्रसाशनिक अधिकारियों के मन में यह दर्द पैदा हो जाए तो देश का आर्थिक दृश्य बदलते देर नहीं लगेगी। हमारे विद्या मन्दिरों में औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त छात्र के सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए अनेक प्रयोग और उपक्रम लिए जाते हैं। वर्तमान समय में समाज शास्त्री नई पीढ़ी में इन्हीं गुणों की आवश्यकता अनुभव कर रहे हैं। हमारे विद्या मन्दिरों से शिक्षा प्राप्त हमारे पूर्व छात्र समाज जीवन में अपने इन्हीं गुणों एवम् व्यवहार से अलग पहचान एवम् सम्मान प्राप्त करते हैं।
अभिनव प्रयोग है 'समर्पण' - स्वामी विवेकानन्द कहते थे कि जीवन में अपना हाथ ऊपर अर्थात देने की मुद्रा में रहना चाहिए। जैसा हम सोचते हैं, इच्छा करते हैं ईश्वर हमें वैसी स्थिति में पहुंचा देते हैं। जब हम 'बसुधैव कटुम्बकम' का उद्घोष कर सम्पूर्ण विश्व के लिए जीते थे तब हम विश्व गुरु थे। हमारे यहां सोने और चांदी का धुंआ निकलता था। इसके विपरीत जबसे हमने मैं ...मैं
का राग अलापना शुरू किया और सब जगह से लेने के लिए हाथ पसारने शुरू कर दिए तो हम भिखारी जैसी अवस्था में पहुंच गए। हमें हजारों वर्षों की गुलामी और घोर गरीबी की यातना झेलनी पड़ी। आज यद्यपि हम स्वतंत्र हो गए हैं लेकिन मानसिकता में स्वाभिमान और दूसरों के लिए जीने का स्वभाव नहीं बना इस के परिणामस्वरूप आज भी 40/ 50 करोड़ देशवासी भयंकर गरीबी का सामना करने को बेबश हैं। करोड़ों बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। हमारे यहां विकास का प्रारूप भी कुछ ऐसा बिचित्र सा है कि प्रतिवर्ष करोड़पतियों की संख्या एवम् झुग्गी झोपड़ियों की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज हो रही है। हमारे देश में एशिया के सबसे ज्यादा दौलतमंद धन्नासेठ हैं। एक बार हमारे मन में सम्पूर्ण समाज के प्रति अपनापन और प्रत्येक देशवासी के प्रति ममत्व उत्पन्न हो जाए तो झुग्गी झोंपड़ी मुक्त भारत बनते देर नहीं लगेगी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा प्राप्त विद्या भारती नई पीढ़ी के बाल मन में ऐसे ही श्रेष्ठ संस्कार पैदा करने के लिए प्रयासरत है। इसी प्रयास में प्रमुख कार्यक्रम है समर्पण।
कैसे करते हैं समर्पण- विद्या मन्दिरों में समर्पण को लेकर अनेक प्रकार के प्रयोग किए जाते हैं। समर्पण से कुछ दिन पूर्व आचार्य कक्षाओं में समर्पण का महत्व एवम् पद्धति को लेकर चर्चा करते हैं। कार्यक्रम वाले दिन बच्चे माँ सरस्वती के चित्र के आगे प्रणाम कर अपनी सहयोग राशि भेंट करते हैं। कार्यक्रम संस्कार एवम् भावप्रद रहे इसके लिए विद्यालय में उत्सव जैसा माहौल बनाया जाता है। लेने की तो होड़ समाज में सर्वदूर देखी जाती है लेकिन समाज के लिए देने को उत्सव में बदलने का प्रयास किया जाता है। देशभक्ति के गीत, समाज के आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग को कैसी परिस्थितयों से जूझना पड़ता उसका सचित्र व सजीव चित्रण के लिए फ़िल्म व् लघु चित्रपट भी दिखाए जाते हैं। बच्चा समर्पण वाले दिन माता पिता से मांग कर धन राशि न लाकर वर्ष भर संग्रह करे, ऐसा आग्रह किया जाता है। बच्चे अपने गली मुहल्ले व गाँव में भी संग्रह करते हैं। समाज के लिए मांगने का भी अपना एक संस्कार एवम् आनन्द रहता है इस कार्यक्रम से यह संस्कार बाल मन में अंकित हो जाता है। समर्पण कार्यक्रम में आचार्य एवं प्रबन्ध समिति के सदस्य भी उत्साहपूर्वक सहभाग करते हैं। प्रतिवर्ष समर्पण कार्यक्रम करने के कारण अब तो बच्चे व् उनके अभिभावक बसन्त पंचमी की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करते हैं। प्रत्येक विद्यार्थी समर्पण करते समय यही गुनगुनाता रहता है-
ढूंढे से भी न दर्शन हों दीन दुखी के यहां कभी।
अन्न वस्त्र गुह्यआत्म ज्ञान के भरे रहें भण्डार सभी।।
रविवार, 28 फ़रवरी 2016
बड़े लक्ष्य के लिए आगे आते छोटे छोटे हाथ
शनिवार, 30 जनवरी 2016
क्रूर इस्लामिक आतंकवाद के आगे विश्व असहाय क्यों! निर्दोष महिला और बच्चों को बचाने आगे आना होगा
सोचा था कि हाकिम से करेंगे शिकायत। कमबख्त वो भी तुझे चाहने वाला निकला।। आखिर इस्लामिक आतंकवाद की शिकायत कहां और किस से की जाए? आए दिन अख़बारों और सोशल मीडिया में इस्लामिक आतंकवाद की खबरें और फ़ोटो देख कर मन दहल जाता है, अत्यंत बेचैन हो जाता है। हैरानी और निराशा यह देख कर और बढ़ जाती है कि भारत और विश्व में मानवाधिकार के झंडाबरदार हों या महिला अधिकार के चैम्पियन सब मुंह में ताला लगा कर बैठे हैं। जब भारत में असहिष्णुता आदि का बिना बजह का शोर मचाने वाले या पुरष्कार लौटाने वाली गैंग भी जब रहष्यमयी चुप्पी धारण कर लेती है तो उनकी नोटँकी, दोगलापन और एक बड़े षड्यंत्र की गन्ध आना स्वाभाविक ही है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, यह प्रवचन सुनते सुनते कान पकने लग गए हैं। ये ठीक है की सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होंगे या इस्लाम केवल आतंकवाद नहीं सिखाता होगा लेकिन यह तो पक्का है कि इस्लाम और इस्लामिक नेतृत्व जिहाद के नाम पर गैर मुस्लिमों के साथ विशेषकर महिलाओं और बच्चों के साथ क्रूरता और नीचता की हद को छू लेता है। और इस सब में उन्हें किसी प्रकार का पछतावा या दुःख आदि न होकर सन्तुष्टि जैसी ही होती है। फर्क इतना है कि इस्लामिक नेतृत्व को लोकलाज के चलते कहीं दबी जुबान से विरोध करना पड़ता लेकिन बहुत जगह तो मानवता की सारी सीमा और संवेदनाएं पार कर इन पाषणयुगीन कृत्यों को खुला समर्थन देने से भी गुरेज नहीं करता।
धर्म के नाम पर सनकीपन- क्या महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध नीचता की हद तक उतर कर अमानवीय ढंग से अत्याचार, सेक्स स्लेव परम्परा आदि किसी धर्म का हिस्सा हो सकता है? थोड़ी देर के लिए मानव की पाशविक वृतियों के चलते दूसरी औरतों से जबरदस्ती सेक्स को स्वीकार भी लें तो भी सामूहिक दुष्कर्म और इतना ही नहीं तो उसके बाद उनकी निर्मम हत्या को क्या कहेंगे? इसके साथ ही बच्चों की निर्मम हत्याओं को सनकीपन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? ऐसा लगता है कि इस्लाम की आड़ में मनुष्य रूप में राक्षस वृतियां खुल कर अपना तांडव कर रही हैं। पागल कुत्ते की तरह इन दुष्प्रवृत्तियों को सख्ती से उनकी भाषा में बोलकर अर्थात निर्दयी हो कर (डॉक्टर की तरह जो मरीज के भले के लिए अपना मन पक्का कर ब्लेड से चीरफाड़ करने में गुरेज नहीं करता) समाप्त करने के सिवाए कोई मार्ग नहीं है। कई बार तो इस्लामिक आतंकवादियों से भी ज्यादा अपराधी मुझे कथित सभ्य समाज दिखता है जो मौन धारण किए बैठा है। हम कवि की उस वाणी को क्यों भूल रहे हैं
मत समझो कि पाप का भागी केवल व्याध।
जो चुप हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।। हरिसिंह नलवा और बन्दा बहादुर ही इस्लामिक आतंकवाद का सही उत्तर होगा।
भारत को इस्लामिक आतंकवाद के सफाए का नेतृत्व करना होगा- क्योंकि भारत ने सदियों तक इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध लगभग एक हजार साल का लम्बा संघर्ष किया है। आज जहां इस्लामिक आतंकवाद को याद कर हम सिहर उठते हैं वहीं हमारे प्रतिकार को स्मरण कर इस्लाम के कथित झंडाबरदारों की रूह भी काम्प उठती है। गुरु गोबिंदसिंह, छत्रसाल, छत्रपति शिवजी, महाराणा प्रताप बन्दा बहादुर और हरिसिंह नलवा के रूप में इस्लामिक आतंकवाद से लोहा लेने का हमारा अच्छा अनुभव है। मुसलमान कवि का दर्द भारत के असीमित साहस और शक्ति को स्मरण दिलाता है-
वो दीने इलाही का बेबाक बेड़ा न काबुल में अटका, न........
वो डूबा दहाने गंगा के आकर।।
इस्लाम की जिस आंधी ने पूरे विश्व को पैरों तले रौंद दिया, देश के देश डकारने वाला इस्लाम भारत में घुटने टेकने को बेबश हो गया था। युद्ध के नशे में चूर एक इस्लामिक बहादुर! की आप बीती भी कम रोचक नहीं है जो भारतीय वीरों से पाला पड़ते ही युद्ध का जिक्र चलने मात्र से हाय अल्लाह, हाय अल्लाह चिलाने लग पड़ता था। युद्ध में उसका भूत एक ही तलवार के बार से उतर गया था। युद्ध की बात चलने पर बार बार अपने पैरों को चूमता था कि इन्हीं पैरों की बाबत युद्ध से जान बचा कर भाग सका था। हमारी जबरदस्त आंतरिक प्रतिरोधक और सर्व समावेशक शक्ति के चलते युद्ध के साथ-साथ सांस्कृतिक मोर्चे पर भी इस्लाम भारतीय रंग में रँगने लग गया था। हमने रहीम, रसखान जैसे अनेक भारत भक्त लोगों की लम्बी श्रृंखला पैदा कर दी थी। भारत को शायद अभी और दुःख सहन करने होंगे इसलिए ठीक उसी समय अंग्रेज आ टपका नहीं तो इस्लामिक कट्टरता को हमने नकेल डाल ली थी। इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ इस लम्बे और सफल संघर्ष के कारण लगता है इस्लामिक कट्टरता के सांप फन को कुचलना यह इंग्लैंड अमेरिका के बस की बात नहीं है। इन पर तो यह उक्ति ठीक बैठती है-
न उठी थी खंजर न उठेगी इनसे
ये बाजू मेरे अजमाए हुए हैं।
इस्लामिक आतंकवाद से संकट में पड़ रहे मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए भारत को ही आगे आना होगा। आवश्यकता राष्ट्र के रूप में फ्रांस और जापान की तरह सही सोच और स्पष्ट लक्ष्य की है। विश्व के प्रति हमें अपने दायित्व को लेकर हम मौन और तटस्थ नहीं बैठ सकते। इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण विश्व को लामबंद करना होगा। सन्तोष का विषय है कि वर्तमान भारत सरकार ने इस दिशा में धीरे धीरे लेकिन गम्भीर प्रयास प्रारम्भ कर दिया है। जापान, इजरायल की यात्रा, बराक ओबामा और अब फ्रांस के राष्ट्रपति श्री ओलांद से दोस्ती को विकास के साथ साथ इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध धार देने की दिशा में गम्भीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।
शुक्रवार, 29 जनवरी 2016
अभिभावक अपने बच्चों के लिए कैसे खोजें उचित विद्यालय?
फरबरी आते आते अपने बच्चों को अच्छे विद्यालय में दाखिल कराने को लेकर अभिभावकों की धड़कन बढ़नी शुरू हो जाती है। अपने स्वप्न के विद्यालय में बच्चे के प्रवेश के लिए सारे सम्भव नैतिक अनैतिक माध्यमों का प्रयोग करने को भी उद्यत रहते हैं। बच्चे को उनकी पसन्द के विद्यालय में प्रवेश मिल पाएगा की नहीं यही चिंता उन्हें खाए जाती है। ऐसा लगता है जैसे कि अपनी कल्पना के विद्यालय में बच्चे के प्रवेश मात्र से उन्होंने बच्चे का उज्ज्वल भविष्य सुरक्षित कर लिया। जबकि सब जानते हैं कि जीवन में सफलता बहुत आगे की बात होती है और वह कई अन्य बातों पर भी निर्भर करती है। आज प्रायः हर अभिभावक अपने बच्चों के लिए सर्वोत्तम विद्यालय खोजने में परेशान दिखाई देता है। इसके साथ ही आज विद्यालय भी अच्छे बच्चों और अभिभावकों की तलाश में परेशान दीखते हैं। दोनों को एक दूसरे से पर्याप्त शिकायतें रहती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपना विश्लेषण न करने के कारण दोनों परस्पर एक दूसरे की कमियां निकालते रहते हैं। और इस कारण दोनों की ही तलाश कभी पूरी नहीं होती। और इस कारण दोनों से सन्तुष्टि कोसों दूर रहती है। इस निराशा, खीज और असन्तुष्टि का बड़ा कारण आप अच्छा या सर्वश्रेष्ठ विद्यालय या योग्य अभिभावक मानते किसको हैं, इस प्रश्न के उत्तर में छिपी है। अभिभावक विद्या मन्दिर में क्या तलाशें इस विषय पर चिंतन करेंगे।
अभिभावक क्या ढूंढें विद्या मन्दिर में-
अभिभावक के रूप में अपने बच्चे के लिए सबसे बढ़िया विद्यालय खोजना हर व्यक्ति की चाहत होना स्वाभावविक है। लेकिन अच्छे विद्यालय का आधार क्या रहता है और क्या रहना चाहिए, यह यक्ष प्रश्न है। आज शिक्षा जगत में बाज़ारवाद खुलकर खेलता देखा जा सकता है। शिक्षा क्षेत्र में बड़े घराने उतर आ जाने से यह गलाकाट प्रतियोगिता अपने पूरे उफान पर है। अधिकांश अभिभावक विद्यालयों की चकाचौन्ध में खो जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह सारा मायाजाल उनकी जेब से गए या जाने वाले पैसे का चमत्कार है। इससे भी बड़ी बात बच्चे की शिक्षा के स्तर का एसी बस, कमरे आदि का को खास सम्बद्ध नहीं है। अभिभावक होने के नाते बच्चे की सुख सुविधा को लेकर चिंता करना ठीक है लेकिन इसके साथ ही हमें विचार करना होह कि बच्चे को अंदर से मजबूत बनाना है या छईमुई बना कर जीवन संग्राम के लिए तैयार करना है। हमे अपनी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था जहां राजा और र्नक सभी के बच्चे गुरुकुल में समान सुविधाओं में समान शिक्षा प्राप्त करते थे। हमें याद रखना होगा कि जीवन माँ की गोद की तरह मुलायम नहीं है। इसे सफलता पूर्वक पार करने के लिए बालक को शरीर मन बुद्धि और आत्मा से मजबूत होना आवश्यक है। दुःख का विषय है कि छात्र के विकास के इस महत्वपूर्ण पक्ष की ओर न विद्यालय का और न ही अभिभावकों का ध्यान या प्राथमिकता है। घर और स्कूल सब जगह पढ़ाई पढ़ाई और पढ़ाई! छाई रहती है। अभिभावकों को इस तथ्य को विस्मरण नहीं करना चाहिए कि स्वस्थ शरीर और मन में ही बच्चे का भविष्य सुखद और सुरक्षित है।
शिक्षा के साथ संस्कारक्षम वातावरण हो प्राथमिकता-
आज अधिकांश अभिभावक और विद्यालय बच्चों को गणित, विज्ञान या अंग्रेजी को रटाने को ही शिक्षा समझने लगे हैं। जबकि प्रायः सभी शिक्षा शास्त्री मानते हैं कि बच्चे को शिक्षा के प्रति लगॉव, खेल, व्यायाम तथा नैतिक मूल्य पैदा हो जाने के बाद उचित समय पर इन विषयों में विद्यार्थी स्वयं प्रगति कर लेता है। छात्र का व्यक्त्तिव विकास विद्यालयों और अभिभावकों की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसके बिना अगर बालक औपचारिक अध्ययन से बड़ा अफसर बन भी गया तो समाज और परिवार के लिए सरदर्द ही बनेगा। आज अधिकांश भरष्टाचारी, आतंकवादी और बड़े अधिकारी अपने शैक्षिक कैरियर में तो सबसे आगे ही थे। घर या विद्यालयों में सम्पूर्ण व्यक्त्तिव का विकास न होने के कारण आज अधिकांश डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी व्यक्तिगत जीवन में अब्बल दर्जे के स्वार्थी, नशेड़ी और नैतिक मूल्यों से दूर होते हैं। जिन माता पिता ने कभी उनके अच्छे अंक प्राप्त कर सफलता के शिखर छूने पर मिठाई बांटी होती है वही जब
वृद्ध आश्रम की ओर रुख करते हैं तो उनके मन पर क्या बीतती होगी? आखिर इसमें दोष किसका है? यहां तो 'बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से आएं... कहावत ठीक बैठती है। केवल कलियुग, आधुनिक वातावरण को दोष देकर समस्या का हल नहीं मिल सकता। हमें याद रखना होगा कि अपने शिशु के लिए विद्यालय का चययन और वृद्व आश्रम में अपने कमरे की बुकिंग का सीधा सम्बद्ध है। इसलिए औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त भारतीय संस्कार, बच्चों में देश समाज के प्रति संवेदना तथा कुछ करने का जज्बा पैदा करने में प्रयासरत विद्यालय को ही अपने बच्चे के लिए चुनना चाहिए। इसके लिए हमें अपने बच्चों के लिए सर्वहितकारी (विद्या भारती), डीएवी, तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित विद्यालय या भारतीय संस्कृति को आधार बना कर शिक्षा देने को कटिबद्ध निजी विद्यालयों को प्राथमिकता देनी होगी। कॉन्वेंट या कॉन्वेंट पैटर्न पर पाश्चात्य संस्कारों में उन्हें मात देने में लगे निजी विद्यालयों से बचना चाहिए। याद रखें कि अपने बच्चे के लिए अच्छे विद्यालय का चययन बच्चे के साथ साथ हमारे अपने सुखद भविष्य का आधार बनने वाला है। ऊंचीं फ़ीस, बाहरी चकाचौन्ध में बहने वाले हमारे अभिभावकों को अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन का अपने बेटे के प्रिंसिपल को लिखा पत्र अवश्य पढ़ लेना चाहिए।
गुरुवार, 17 दिसंबर 2015
मंगलवार, 1 दिसंबर 2015
कैसे बनें हम भऱष्टाचारमुक्त राष्ट्र व् समाज?
जो देश शिष्टाचार और जीवन मूल्यों के लिए जाना जाता था आज वहां सब जगह गहरी जड़ें जमाये बैठे भरष्टाचार को देख कर हैरानी होती है। आज स्थिति यहां तक आ गयी है कि आज ये सब जीवन मूल्य हाशिये पर चले गए लगते हैं। इस में सबसे बड़ी चिंता का विषय भरष्टाचार का समाजीकरण अर्थात प्रतिष्ठा प्राप्त होना है। प्रसिद्ध साध्वी ऋतम्भरा का कहना अत्यंत सार्थक लगता है- कुछ दशक पहले जब कोई व्यक्ति किसी को काम के बदले कुछ देने की बात करता था तो उसकी सहज प्रतिक्रिया होती थी- ना, बाबा ना! हम बाल बच्चे दार हूँ , ऐसा पैसा स्वीकार नहीं कर सकता।' और आज स्थिति यह है कि काम के बदले खुल कर मांगता है और समझाने पर कहता है कि क्या करूं आखिर बाल बच्चेदार हूँ, इसलिए मजबूरी है।' आज सबने भ्रष्टाचार को एक आवश्यक बुराई के रूप मे स्वीकार जैसा कर लिया है। भ्र्ष्टाचार को लेकर थोड़ी चीख पुकार दहेज की तरह तभी होती जब व्यक्ति को स्वयं इसका शिकार हो जाता है, उसे स्वयं रिश्वत देनी पड़ती है। लेते समय व्यक्ति अनेक तर्क देकर रिश्वत को न्यायोचित बता कर स्वीकार कर लेता है। इसलिए यह चीख पुकार चाय के कप मे तूफान से अधिक कुछ नहीं होता। आखिर यह सब कैसे हुआ? कौन है इसके लिए जिम्मेवार? कैसे निकल सकते हैं हम इस भयंकर समाजिक अभिशाप से? भरष्टाचार के कारण कितनी जवानियाँ, उनके अरमान सब तबाह हो जाते हैं? इसलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर गम्भीर चिंतन-मन्थन कर कुछ कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। आज जब केंद्र मे भरष्टाचार रहित ईमानदार सरकार देने के लिए प्रधानमन्त्री ओर उनकी टीम संकल्पबद्द है, देश का युवा ईमानदार व्यवस्था चाह रहा है ऐसे में लगता है कि सब मिलकर इस भरस्टाचार रूपी राक्षस पर धावा बोलें तो बात बन सकती है। घोर निराशा के वातावरण में एक अच्छी खबर है कि नई सरकार के थोड़े से प्रयास से ही अब नई रेटिंग में भारत में भरष्टाचार में भरी गिरावट आई है। किसी ने ठीक ही कहा है कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता एक पत्थर तबीयत से उछालो तो यारो। जड़ कहाँ है भरस्टाचार की- सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी या प्रकृति कितने भी नियम से चलें तो भी मनुष्य मन की तरह व्यक्ति का स्वभाव नियम में चलने का नहीं है। किसी न किसी प्रकार से कोई न कोई रास्ता निकलने की तिकड़म में व्यक्ति लगा रहता है। भारत में तो आज नियम से, धैर्यपूर्वक काम करवाना तो पिछड़ेपन की निशानी बनता जा रहा है इसके विपरीत जुगाड़ तकनीक से आगे बढ़ने को बहादुरी और स्टेट्स का प्रतीक माना जाने लगा है। यह जीवन शैली ही भरस्टाचार को उतपन्न करती है। इसके अलावा समाज जीवन में पैसे का वर्चस्व भी बड़ा कारण है। सर्वे गुणा: काञ्चनम् आश्रीति... अर्थात जिदे घर दाने उदे कमले भी सयाने। इसलिए देश में धन कमाने की अंधी दौड़ शुरू हो गयी। फिर जीवन मूल्य बेचारे क्या करते? आज समाज जीवन का शायद ही कोई भाग इस गिरावट से बचा हो। कैसे निजात मिले इस बुराई से- हमें धन से ज्यादा गुणों व आचरण को प्रतिष्ठित करना होगा। लोष्ठवत द्रब्येशु... अर्थात दूसरे के धन को मिट्टी समझना चाहिए। इसके अलावा अगर हम धैर्यपूर्वक नियमानुसार अपने काम करवाने के लिए बजिद जो जाएं तो भरस्टाचार रूपी राक्षस का दम घुटने लग जायेगा। हम दूसरें के समय तो नियम कानून की बात करते हैं और अपनी बारी आने पर सब कुछ भूल कर अपना काम करवा लेना चाहता है। हमें भरष्टाचार को आर्थिक से आगे ले जा कर अन्य पहलुओं में भी देखना होगा। वेतन पूरा और काम में चमड़ी बचाना, अपने वचन से पीछे हटना और चारित्रिक अवमूल्यन भी इसी ढंग से देखना चाहिए। जहां तक निजात पाने का विषय है उसमें राष्ट्र का कोई बड़ा लक्ष्य स्थापित करना भी सहायक हो सकता है। लक्ष्य प्रेरित व्यक्ति ओर समाज अपने व्यवहार को स्व नियंत्रित करता है। हमें विश्व गुरु भारत का लक्ष्य प्रत्येक देशवासी में पैदा करना होगा। इस महान लक्ष्य की दीवानगी प्रत्येक नागरिक में पैदा करनी होगी। इसके बाद हमारी अनेक बुराईयां स्वयं ही मिटती और सिर पर पैर रख कर भागती हुई दिखेंगी। और हम एक बार फिर दुनिया में सबसे अच्छे व्यवहार वाले नागरिकों वाला देश बन जाएंगे।