* भगवान श्री कृष्ण ने जीवन के आखिरी क्षण तक माँ के हाथों भोजन का वरदान मांगा था।
* आदि शंकराचार्य की मां ने जीवन के आखिरी क्षण पर उपस्थित होने का वायदा ले कर ही उन्हें सन्यास लेने की अनुमति दि थी।
* बासुदेव बलवन्त फड़के मां की बीमारी पर छुटि न मिलने पर नोकरी छोड़ कर घर आ गए थे।
* बिनोबा भावे ने गीता का मराठी अनुवाद मां के लिए किया था। उनके देहांत के बाद गीता को ही मां माँ लिया था।
वैदिक काल मे मैत्रयी, गार्गी अपाला मनत्रदरस्टा
ऋषि थी।
शंकराचार्य को वाद मे एक बार तो हरा देने वाली भारती को कौन नहीं जानता?
वनवास जाने की आज्ञा लेने गए तो मां कौसल्या हवन कर रही थी, बाली की पत्नी तारा मन्तर्वेता थीं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण- ऋग्वेद मे 300 से अधिक ऋषि महिलाएं हैं। दीरघतमस ऋषि की माता ममता ने ऋग्वेद के दसवें सूक्त मे अग्नि उपायेन मन्त्रों की रचना की है। इनकी पत्नी उशिजा ने 8 मन्त्रों की रचना की है। ऋषि कक्षीवान की पुत्री घोष ने कुष्ठ रोग का निदान मन्त्रों से खोजा था। अम्भुज ऋषि की कन्या बाल ने पदार्थ मे ऊर्जा ओर ऊर्जा मे पदार्थ निहित है इस सिद्धान्त की खोज की थी। सुनीता बिलियमस ने 195 घण्टे स्पेस वाक तथा 105 घण्टे 40 मिनट का कीर्तिमान बनाया है। वे अपने साथ गीता व गणेश की प्रतिमा ले गयी थी।
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015
नारी तू नारायणी
शनिवार, 3 अक्टूबर 2015
अतीत से अनुप्रेरित वर्तमान चुनोतियों का सामना करने में सक्षम 'शिक्षा नीति' होगी कारगर
केंद्र की नई सरकार को बधाई देनी होगी कि उसने हाशिये पर डाल दिए शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक जनसहभागिता आमन्त्रित की है। सरकार का शिक्षा के भगवाकरण का शोर मचा कर आसमान सिर पर उठा लेने वालों की परवाह न कर इस विषय पर आगे बढ़ना सांप को मुंह से पकड़ने जैसा साहसिक कार्य है। अभी अपने बच्चों को शिक्षा के नाम पर हम अंग्रेज द्वारा बनाये सिद्धान्त ही रटाते जा रहे हैं। यही कारण है कि हमारे अधिकांश बड़े सुशिक्षित लोग भी देशभक्ति, स्वाभिमान और सामान्य जीवन मूल्यों में शून्य ही दिखाई देते हैं। 'देर आयद दुरस्त आयद' ही सही लेकिन अब इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। स्वतन्त्रता के पश्चात शिक्षा नीति बनाने में जनसुझाव मांगना सरकार का यह पहला बड़ा प्रयोग है। सरकार या सिस्टम की आलोचना नहीं सार्थक सुझाव दें- जैसे ही शिक्षा पर जन सुझाव आमन्त्रित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई तो शिक्षा विज्ञानियों में ठण्डी या यूँ कहें नाममात्र की हलचल हुई। हम लोग सरकार, सिस्टम और नेताओं की जी भर कर आलोचना करने में सिद्धहस्त होते हैं। हमारे अधिकांश विद्वान विशेषकर शिक्षा शास्त्री वैसे तो 'सुझाव वीर' ही होते हैं। लेकिन सुझाव भी सरकार तक पहुंचाने के बजाय वे अपने घर के अतिथि कक्ष या चौराहे पर देने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। वैसे सब लोग निरन्तर महंगी होती जा रही शिक्षा, इस शिक्षा से तैयार हो रही संस्कार विहीन नई पीढ़ी तथा शिक्षा पर भारी खर्चे के बाबजूद बढ़ती बेरोजगारी से बुरी तरह परेशान हैं। लेकिन इस बीच भी नई शिक्षा नीति पर सार्थक सुझाव देने में ज्यादा उत्साह नहीं देखा जा रहा है। यहां छोटी कथा अत्यंत प्रासंगिक लगती है। एक बार किसी भक्त की गरीबी से व्यथित माँ पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उसके मार्ग में कुछ मुद्राएं रख दी ताकि इनसे इस भक्त की गरीबी दूर हो सके। लेकिन जब वह व्यक्ति मुद्राओं के समीप आया तो उसने मन में विचार किया कि अंधे कैसे चलते हैं यह अनुभव भी तो करना चाहिए। और इस प्रकार भक्त जी महाराज ऑंखें बन्द कर वहां से निकल गए। इस ऐतिहासिक अवसर पर चुप्पी भी उस भक्त की तरह भाग्य को दरबाजे से वापिस लौटाने जैसा ही। एक ओर इस महत्वपूर्ण विषय पर जहां सामान्य जन की निष्क्रियता निराशाजनक है वहीं नई शिक्षा नीति को लेकर देश में कुछ तत्वों की अति सक्रियता चिंताजनक है। सुझाव देने के लिए कमन्युसिट, ईसाई और विदेशी लक्ष्यों को लेकर भारत में सक्रिय एनजीओ सक्रिय हो गयी हैं। ऐसे में कल अगर नई शिक्षा निति में अपेक्षा के अनुसार परिवर्तन नहीं आये तो दोष किसका होगा? हम जानते ही हैं कि क्योंकि सरकार भवन से ज्यादा फाइलों से चलती है इसलिए जनदवाब बनाते समय हमें चूकना नहीं होगा। अतीत में झांकना होगा- भारत की शिक्षा सम्पूर्ण विश्व के लिए आदर्श और प्रेरक रही है। प्रसिद्ध गाँधीवादी विद्वान धर्मपाल ने तथ्यों के सहित सिद्ध किया है कि अंग्रेजों से हमारे यहां साक्षरता दर लगभग शतप्रतिशत थी। हमारे यहां सम्पूर्ण विश्व के छात्र प्रवेश लेने के लिए लालायित रहते थे। नालन्दा और तक्षशिला विश्विद्यालयों का नाम कौन नहीं जानता? हम केवल अक्षर ज्ञान की शिक्षा नहीं बल्कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास पर जोर देते थे। इसलिए शिक्षा पूरी कर लेने के बाद भी कुलपति आखिरी परीक्षा लेते थे। यह परीक्षा अक्षर ज्ञान के बजाय उसके व्यक्तित्व पर केंद्रित रहती थी। इस परीक्षा जिसे गुरु दक्षिणा भी कहते थे असफल रहने के बाद उसे फिर कुछ समय और गुरुकुल में रहने को कहा जाता था। शिक्षा पूरी तरह निःशुल्क, स्वयातत् और सबके लिए समान थी। इसलिए हमारे यहां आज कृष्ण और सुदामा एक साथ पढ़ लेते थे, जो कि आज एक स्वप्न जैसा ही लगता था। इसके अतिरिक्त जीवन मूल्यों, देशभक्ति और समाज प्रेम शिक्षा का मुख्य आधार होता था। जीवन के लिए उपयोगी हो शिक्षा- आज की शिक्षा समग्रता प्रदान न कर खण्डों में व्यक्तित्व को बाँट देती है। संघ के श्रेष्ठ अधिकारी रहे श्री भाउसाहिब भुष्कुटे एक जगह लिखते हैं- 'Modern education is knowing more and more about less and less till one knows everything about nothing.' हमारे यहां नब्ज देख कर केवल रोग ही नहीं बल्कि रोगी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व बता देने वाले वैद्य गाँव गाँव थे वहीं आज आँख, नाक और कान के डॉक्टर अलग-अलग हो गए हैं। एक रोग में दूसरा डॉक्टर असहाय सा दिखता है। इसके अलावा बी.कॉम वाला छात्र बैंक के फार्म भरने, इंजीनियरिंग करने वाला छात्र भवन निर्माण आदि में सामान्य जानकारी भी नहीं रख रहा है। इसलिए बेरोजगारों की संख्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है। हमें कार्य संस्कृति और स्व रोजगार को बढ़ावा देने वाली शिक्षा भी देनी होगी। आज बिडम्बना ही है कि एक और रोजगार ढूंढने वालों और दूसरी ओर कर्मचारी ढूंढने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। वर्तमान चुनोतियों का उत्तर हो शिक्षा नीति- हमें अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान चुनोतियों का सफलतापूर्वक सामना करने वाली शिक्षा नीति बनानी होगी। विद्यालय को मन्दिर बना कर विद्या मन्दिर बनाने की आवश्यकता है जिसमे बालक हमारा आराध्य हो। राजनीति और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा को विद्या मन्दिर की चौखट से दूर रखना होगा। सम्पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए हमारे 16 भारतीय संस्कारों से परिपूर्ण शिक्षा नीति बनाने होगी। बालक को देश और समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए हमे हमारे क्रांतिकारियों, सन्तों व महापुरुषों तथा श्रेष्ठ प्राचीन इतिहास को पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। हमें आज अपने आचार्य और प्रधानाचार्य का सम्मान लौटाना सबसे बड़ी चुनोती है। इसके लिए उसे स्वतन्त्रता और आर्थिक स्वाबलम्वन प्रदान करना होगा। सबसे अंत में लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा को साधना के रूप में लेने वाला शिक्षक तैयार करना होगा। आदर्श प्रेरित शिक्षक ही आज की पीढ़ी का सम्मान अर्जित कर सकता है।
शनिवार, 29 अगस्त 2015
जनता तू कितनी नादान है!
वाह रे! वाह रे ! जनता मेरे भारत महान की
क्या तारीफ करें तेरी समझ और ज्ञान की?
तू चुपचाप सहती रही असंख्य जख्म !
ढ़ोती रही इतिहास का दर्द सीने में,
खून के आंसू रोती रही चुपचाप
उस समय तो तू बेबश थी लेकिन
आज जब समय ने करवट बदली,
दिल्ली से मिटी निशानी उस अत्याचारी ओरंगजेब की!
फिर तू चुप क्यों है भला?
कहीं कोई जश्न नहीं, कोई उत्सव नहीं
मेरे भारत महान की जनता!
तू स्थित प्रज्ञा कब से हो गयी हो!
महिमा क्या गाएं इतिहास की चीख न सुन
बहरे हुए तेरे आँख, नाक और कान की!
क्या तारीफ करें......
अपने व्यक्तिगत दर्द पर बिलबिलाने वाली,
अधिकार? छीनने के लिए गुर्राने वाली
किसी भी हद तक जाने वाली मेरी
भोली जनता तू और कितनी बार ठगी जायेगी?
किसी केजरीवाल और हार्दिक के झांसे में आकर अपनी सम्पति स्वाहा: कर,
घर फूंक तमाशा देखने की तेरी यह आदत
क्या जीभ के लिए दांत उखाड़ फैंकने की मूर्खतापूर्ण जिद नहीं है?
दांत और जीभ दोनों अपने हैं कब समझेगी तू?
पार्टी, व्यक्ति से मतभेद ठीक है लेकिन
देश और समाज ने तेरा क्या बिगाड़ा ?
जो तू आए दिन किसी के उकसावे में आकर करोड़ों का नुकसान कर लेती है
और अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेती है!
तू कब समझेगी, कब बाज आएगी तू ?
तेरी ऐसी समझ के चलते दुश्मन की क्या जरूरत
जो तू खुद ही दुश्मन जो बन बैठीअपनी इज्जत और जान की
क्या तारीफ करें तेरी समझ और ज्ञान की....
कब लालू, नितीश, मुलायम और मोदी में अंतर करना सीखेगी?
तू कब समझेगी कि
लालू , नितीश, मुलायम, मायावती को तू नहीं तेरे वोट प्यारे हैं इसलिए ये नादान!
ये सत्ता के पुजारी तेरी खूब प्रशंसा करते होंगे
तेरे लिए चाँद लाने की कसमें उठाते होंगे किन क्या तू जानती है?
इनकी चापलूसी उस चालाक मर्द जैसी है
जिसकी नजर औरत के गुणों पर नहीं बल्कि उसके जवान जिश्म पर होती है
और वो भोली उस पर लटू होती जाती है
जब होश आता है तब तक देर बहुत हो चुकी होती है! वो बेचारी लुट चुकी होती है!
मोदी तेरे लिए मीठा नहीं बोलते होंगे! लेकिन एक योग्य डॉक्टर की तरह वे मरीज को खुश करने के लिए नहीं
बल्कि उसे ठीक करने के लिए सच्चाई बोलते हैं, काम करते हैं
कहते हैं न कि राजा जनता को, सचिव राजा को, वैद मरीज को और गुरु शिष्य को खुश करने के लिए अगर सच बोलना छोड़ दें
तो विनाश निश्चित होता है
अब निर्णय तूने करना है कि तुझे उस नादाँ औरत की तरह लुटना है या रक्षा करनी है अपनी इज्जत और जान की!
तेरे निर्णय से ही तारीफ हो सकेगी तेरी समझ और ज्ञान की
वाह ! वाह रे ! जनता मेरे भारत महान की!!!
शुक्रवार, 7 अगस्त 2015
सॉरी! सपना हम तुम्हें बचा नहीं सके
मंगलवार, 16 जून 2015
उधर कोई बेबश बहाता है आंसू....
उधर कोई बेबश बहाता है आंसू, इधर भीग जाता है दामन हमारा।। ठीक ऐसी ही स्थिति इस युवा गृहणी के मन की है। प्रस्तुत लेख की नायिका जालंधर की है। नाम उजागर करना शायद उसे अच्छा नहीं लगेगा इसलिए चलो काम चलाने के लिए उसका नाम ममता रख लेते हैं। क्योंकि गरीबों, असहायों के लिए उसकी ममता का मानो बांध ही टूट पड़ता है। युवा ममता के पास सम्पन्न घर, सुंदर परिवार, प्यारे बच्चे व हर जगह सहयोगी पति.... अर्थात आनन्द के सागर में डूबे रहने के लिए सब कुछ पर्याप्त है इसके पास ! सब कुछ होते हुए भी फिर भी न जाने क्यों बेचैन और उदास रहती है ममता। समाज के लिए बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा है इस जज्बाती लेकिन धुन की पक्की महिला में। किसी दुखी को देख कर उसकी सहायता करने का इसको मानों जनून ही सवार हो जाता है। सामन्य तौर पर विनम्र और नाजुक सी दिखने वाली इस महिला में जरूरत पड़ने पर न जाने अदभुत साहस व पराक्रम कहां से आ जाता है?
विवेकानन्द ने उड़ाई नींद - स्वामी विवेकानन्द ने अपने समय में स्वयं और बाद में उनके प्रेरक जीवन और दर्शन ने असंख्य लोगों की नींद उड़ा कर उन्हें देश व समाज के लिए जीवन न्योछावर करने को मजबूर किया है। उन्हीं की पंक्ति में ममता भी स्वयं रे गिनते रहते हैं जब सारा आलम सोता है। साल पहले तक लगभग सब ठीक ठाक ही था। समाज की असमानता थोडा परेशान तो करती थी लेकिन घर गृहश्थी और छोटा सा परिवार इसी में ममता भी पूरी तरह डूबी थी। स्वामी विवेकानन्द सार्धशती में संघ के कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आने के बाद स्वामी को थोडा थोडा पढ़ना क्या शुरू किया कि फिर तो पीछे मुड़ कर देखने का कहां समय मिला और कहां मन किया?समाज के दुःख में आंसू बहाता, रोता- बिलखता विवेकानन्द इसे अपने अंदर आकार लेता अनुभव होने लगा। इसी समय इसे 'विवेकानन्द और सेवा' विषय पर पुस्तक के लिए सामग्री जुटाने का कार्य मिल गया। इस पुस्तक के लिए स्वामी जी के विचार और प्रसंग संग्रह करते व पढ़ते रही सही कसर भी पूरी हो गयी। गरीब बच्चे बन गए आराध्य- इसके बाद तो हर गरीब बच्चा ममता के लिए आराध्य बन गया। उन्हें देखते ही इसकी ममता का सैलाब उमड़ पड़ता। गरीब बस्ती में जाकर बच्चों को एकत्र करना और उन्हें पढ़ाना, खिलाना और खेलाना तथा अच्छे संस्कार देना इसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। इसके लिए इसने संभ्रांत परिवारों की महिलाओं की अच्छी टोली बना ली। सब मिलकर साथ लगती स्लम बस्ती में जाने लगी। ममता के साथ साथ इन महिलाओं को भी नर सेवा- नारायण सेवा का मन्त्र भाने लगा। बस्ती में संस्कार केंद्र के आलावा बड़े बच्चों को खेल के लिए घर के बाहर खुले स्थान को खेल के मैदान में बदल दिया। कबड्डी और अन्य खेलें, हनुमान चालीस, देशभक्ति के गीत व प्रेरक बातें यहां की कार्य पद्धति का भाग है। इसके परिणाम स्वरूप् बच्चों ने नशा छोड़ना शुरू कर दिया है। बच्चे ममता के इशारों पर नाचते हैं। बच्चों को प्रेरित कर काम पर भेजना तथा कुछ बच्चों के लिए काम तलाशना भी ममता के कार्य में शामिल है। इसके लिए वह अपने सम्पर्क का पूरा उपयोग करती है। दीदी! कल मैं पढ़ने नहीं आउंगी, मेरी माँ मरने वाली है-एक दिन संस्कार केंद्र में पढ़ने वाली एक छोटी बच्ची ख़ुशी बोली, दीदी मैं कल पढ़ने नहीं आउंगी। मेरी माँ मरने वाली है। मैं बुआ के पास लुधियाना चली जाउंगी। यह सुनते आखिर कौन पत्थर दिल हृदय नहीं पिघलेगा? फिर ये तो गरीबों के दुःख में बेचैन रहने वाली ममता थी। सारी रात आँखों में निकल गयी। सवेरे बिना कुछ खाए पिऐ अकेली उस बच्ची ख़ुशी के घर पहुंच गयी। सारे मुहल्ले को इकट्ठा कर लिया। मुझे भी फोन आया। भैया! विवेकानन्द पढ़ने नहीं जीवन में उतारने का विषय है। मेरे केंद्र की बच्ची की माँ मर जायेगी। ऐसे हम किस को पढ़ायेंगे? पढ़ा कर क्या करेंगे? तुरन्त यहां आ जाओ। मैंने अपनी व्यस्तता बतानी चाही लेकिन उसने कहां सुनी? जब हम वहां पहुंचे तो दृश्य देख कर मन बेचैन हो गया। आखिर कब हमारा भारत गरीबों के लिए रहने लाईक बने बस्ती की स्थिति दिल्ली के विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने के स्वप्न को चिढ़ाती दिख रही थी। चारों तरफ गन्दगी, एक छोटे से कमरे में मक्खियों के बीच ख़ुशी की ममी सपना असहाय हो कर मानो मौत का ही इंतजार कर रही थी। वह जीना चाहती थी लेकिन कोई भी उसका सहारा नहीं था। मुहल्ले वालों ने बताया कि पति शराबी है। रात को आ कर दवा दारू करने के बजाय इससे लड़ता है। हमें देख कर सपना के असहाय चेहरे पर थोडा विश्वास जरूर लौटा! ममता ने सपना के इलाज के लिए अपने पति के मित्र डॉ को बुलाया। डॉ के कहते ही अस्पताल से एम्बुलेंस मंगवा कर सपना को जिला अस्पताल पंहुचाया गया। इतना ही नहीं ममता जिला अस्पताल जा कर बीमार सिस्टम में डॉक्टरों व स्टाफ से लड़-झगड़ कर, सपना का फ्री इलाज का केस बनवा कर, इलाज शुरू करवा कर ही घर आई। साहस भी कम नहीं- ममता के सेवा कार्य से ईसाई मिशनरी भी दुखी हैं। इस बार उनकी सांता क्लॉज की फेरी भी नहीं निकली। कारण इसके लिए भीड़ के लिए इसी बस्ती से बच्चे आते थे। लेकिन देश भक्ति के रंग में रंग जाने के कारण अब बच्चे कहां से आते? प्रेम, शांति और अहिंसा के पुजारी ये मिशनरी गुंडागर्दी पर उत्तर आए। कुछ दिन पहले रात्रि शाखा के समय डर का वातावरण बनाने के उदेश्य से दादा और गुंडे जैसी शक्लों वाले तीन चार लड़के मोटर साईकल पर खड़े रहते। उन्हें लगता था कि बच्चे और ये महिला डर जायेगी। इसकी कुछ सहेलियाँ डर भी गयी। लेकिन ममता तो किसी और ही मिटटी की बनी है। जब ईसाई मिशनरियों का यह दाव नहीं चला तो एक दिन दो लड़के सामान बेचने के बहाने घर में घुसने के लिए आ धमके। संयोग से उस समय ममता दरवाजे पर ही खड़ी थी। इसने तुरन्त निर्णय लेते हुए दरवाजा बन्द कर - पड़ोसी के घर जा कर आती हूँ ' कह कर चली गयी। इस प्रकार उनका यह बार भी उनका बार भी खाली चला गया। ममता की सूझबूझ एवम् ईश्वर कृपा से बड़ा हादसा टल गया। इतना सब होने पर भी ममता आत्म्विश्वास से पूरी तरह लबरेज है। समाज सेवा की अपनी धुन में सेवा कार्य में व्यस्त है। सेवा का इसका जनून बढ़ता ही जा रहा है। गरीबों की सेवा के लिए इसने अपनी सहेलियों की संस्था बनाने का संकल्प लिया है। समय का आह्वान स्वीकार करें सम्पन्न गृहिणियां- भारत को अपनी सम्पन्न महिला शक्ति से बहुत उम्मीदें हैं। महिला का दिल नरम व कोमल होता है। आज उसके अंदर की माँ के ममत्व का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। इन सम्पन्न, समझदार माताओं के प्यार की ओवर डोज के कारण इनके बच्चे बिगड़ रहे हैं और करोड़ों गरीब बच्चे ममता की छाँव के लिए तरस जाते हैं। अपने एक-दो बच्चों के लिए सारी ममता लुटाने वाली माताएं गरीब बस्तियों के बच्चों को भी अपनी सन्तान मान लें तो देश का बहुत कुछ परिदृश्य बदल जायेगा। काश! आज सम्पन्न घरों में राग- रंग में डूबी, सामाजिक सरोकार के प्रति निष्क्रिय व उदासीन, अनेक शारीरिक व मानसिक बीमारियों को निमन्त्रण देती असंख्य गृहिणियां ममता का अनुकरण करें तो समाज का चित्र बदलते देर नहीं लगेगी। लगभग 116-117 साल पहले स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से भारत की सेवा का जज्बा दिल में लिए हजारों किलोमीटर दूर आयरलेंड की मार्गरेट नोबुल भारत की सेवा के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर देती है। अपना देश, धर्म व संस्कृति छोड़ क्र मार्गरेट नोबुल से भारत भक्त निवेदिता में बदल सकती है। भारत के गरीबों का दुःख उसे सन्यस्त जीवन जीने के लिए बाध्य कर सेवा के लिए भारत में ला पटक सकता है तो भारत की हमारी बहनें अपने ही गरीब देशवासियों के दुःख के प्रति उदासीन कैसे हो सकती हैं?
बुधवार, 3 जून 2015
शिक्षा और शिक्षक विकास को समर्पित विद्या भारती का आचार्य प्रशिक्षण वर्ग
नर से नारायण बना देने, समय की धारा का मुख मोड़ देने, भगवान से भी पहले पॉन्व छूने के अधिकारी हमारे गुरु अपनी यात्रा में आज शिक्षक, अध्यापक के पड़ाव पार करते हुए शुद्ध वेतनभोगी कर्मचारी या टयूसन में पूरी तरह डूबे प्राणी के रूप में देखे जा सकते हैं। किसी समय का यह श्रेष्ठ वर्ग कुछ अपवाद छोड़ कर आज सरस्वती के स्थान पर लक्ष्मी की आराधना में जुट गया लगता है। आखिर यह सब क्यों और कैसे हुआ? हमारी इस महान संस्था का यह पतन क्यों और कैसे हुआ? इस विषय पर चिंतन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह गिरावट केवल इस गुरु संस्था की नहीं बल्कि हमारे राष्ट्र के पतन का मूल भी इसी मे छिपा है। इस गम्भीर विषय पर योग्य विद्वान चिंतन कर चुके है आगे भी करेंगे। लेकिन आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति को समाप्त कर गुरु को केवल वेतनभोगी कर्मचारी में बदलने का जो काम अंग्रेजों ने किया वह आज भी उसी तरह चल रहा है। वर्तमान परिस्थिती में हमारे अध्यापकों की स्थिति - न खुदा मिला न बिसाले सनम' जैसी हो गयी है। आर्थिक दौड़ में भी हम अध्यापक आज कहीं नहीं दिखते और इज्जत की तो बात ही क्या? यद्यपि सबकी स्थिति ऐसी नहीं, आज भी हमारी श्रेष्ठ गुरु परम्परा की टिमटिमाती ज्योति को कुछ महानुभाव कहीं-कहीं थामे देखे जा सकते हैं।
आचार्य की महान परम्परा- आज से 2072 साल पहले एक आचार्य ने इतिहास की धारा का मुंह मोड़ दिया था। सत्ता के नशे में चूर राजा को न केवल सत्ताच्युत किया बल्कि विदेशी आक्रमणकारी को भी करार जबाब दिया। इसके बाद सैकड़ों वर्षों तक विदेशी हमलावरों को भारत की ओर बुरी नजर से देखने का साहस नहीं हुआ। इतिहास के इस महान नायक और उनके सभी साथियों के नाम हम निश्चित जान ही गए होंगे। इसके साथ ही हमारी गुरु शिष्यों की लम्बी श्रृंखला है। इसमें प्रमुख शिवाजी- समर्थ गुरु रामदास, बन्दा बहादुर- श्री गुरु गोबिंद सिंह और आधुनिक काल के रामकृष्ण परमहंस-स्वामी विवेकानन्द तथा बिरजानन्द - स्वामी दयानन्द आदि गुरु- शिष्य की जोड़ी ने नया इतिहास रच दिया दिया था। हमारे आचार्य अदभुत मिटटी से बने होते थे। इनके तेजस्वी व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि दशरथ जैसे महान पराक्रमी राजा नंगे पान्व उन्हें लेने दरवाजे पर आते थे। कुलपति से मिलने के लिए राजा को प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। हमे देश के उत्थान के लिए अपने आचार्यों का वह तेज वापिस लौटाना होगा। इसके लिए आचार्यों को भी वहुत कुछ करना होगा और समाज को भी। समाज को आचार्य के आर्थिक पक्ष की चिंता करनी होगी। दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी शिक्षण को सबसे ज्यादा आकर्षक बना होगा ताकि समाज का प्रतिभशाली वर्ग इस क्षेत्र में आगे आए। आज कुछ अपवाद छोड़ कर जिसको कहीं नॉकरी नहीं मिलती वह अध्यापन के क्षेत्र में आ जाता है। शिक्षक जैसा कोई गुण इनमे नहीं दिखाई देता। विद्यालय के तुरन्त बाद प्रॉपर्टी या अन्य व्यवसाय में ये महानुभाव खोये देखे जा सकते हैं। आचार्य वर्ग को अपना स्तर स्वयं ऊँचा उठाना होगा।
आचार्य को प्रतिष्ठत करने मे प्रयासरत विद्या भारती- शिक्षा जगत की उपरोक्त समस्या का वर्णन एक बात है लेकिन प्राचीन गौरव के प्रकाश में समाधान की दिशा में कुछ कर लेना यह अलग विषय है। वर्तमान अध्यापक को आचार्य या गुरु जैसे श्रेष्ठ पद का दायित्व बोध कराने की दिशा में हुए प्रयास भी नगण्य जैसे कहे जा सकते हैं। सन्तोष और प्रसन्नता का विषय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा प्राप्त कर नाना जी देशमुख ने सन् 1952 में एक छोटे से शिशु मन्दिर के रूप में एक चिराग जलाया। वर्तमान में इस संस्थान के द्वारा लगभग 15000 विद्या मंदिर तथा 10000 के आसपास संस्कार केंद्र सफलतापूर्वक चलाये जा रहे हैं। सरकार के बाद सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था बन गयी है विद्या भारती। भारतीय जीवन मूल्यों के आधार पर आधुनिक एवम् संस्कारप्रद शिक्षा देने के लिए एक बड़ा प्रयास चल रहा है। अध्ययन, अध्यापन पुस्तक लेखन एवम् शोध के लिए गम्भीर प्रयास चल रहे हैं।
आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का अदभुत वातावरण- विद्या भारती शिक्षा एवम् शिक्षकों का स्तर ऊँचा उठाने के लिए प्रतिवर्ष आचार्य प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन करती है। पंजाब में सर्वहितकारी शिक्षा समिति द्वारा दस दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन नाभा में किया गया। 40 विद्यामन्दिरों से 168 आचार्य दीदियों ने प्रशिक्षण ग्रहण किया। शिविर के उद्घाटन पर कोटकपूरा से स्वामी 1008 हरि गिरी जी महाराज तथा समापन केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के कुलपति डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री उपस्थित थे। शिक्षा का भारतीय स्वरूप्, आदर्श शिक्षक, शिक्षण की वैज्ञानिक एवम् आधुनिक पद्धतियाँ आदि विषयों के अतिरिक्त सामाजिक सरोकारों पर भी शिक्षकों का मार्गदर्शन किया गया। इसके साथ प्रात: जागरण से लेकर रात्रि सोने तक अनुशासित दिनचर्या का अभ्यास कराया गया। शिक्षा स आदर्श आचार्य बनने का संकल्प एवम् शिक्षण के अनुरूप कक्षा में अध्यापन के उत्साह के साथ सभी आचार्य-दीदियां अपने घरों को लौटे।
रविवार, 31 मई 2015
देशभक्ति अर्थात जन जन में हो मिटटी का हर कण पवित्र का भाव
नागरिकता या देशभक्ति- क्या नागरिकता ही देशभक्ति की कसौटी है? अगर विचार करेंगे तो ध्यान में आता है कि नागरिकता देशभक्ति का पहली सीढ़ी हो सकती है लेकिन देशभक्ति कुछ क़ानूनी प्रक्रिया से बहुत आगे की चीज है। यह सहज विकसित होती है या पर्यत्नपूर्वक मन में धारण करनी पड़ती है। देशभक्ति नितांत भाव और भावना का विषय है। इसी बात को स्पष्ट करते हुए प्रसिद्ध चिंतक, राजनेता, संघ के प्रचारक तथा भारतीय जनसंघ के मार्गदर्शक पण्डित दीनदयाल उपाध्याय अपने बौद्धिक में कहते थे कि हमारे लिए भारत मातृभूमि है भूमि मात्र नहीं। ऊपरी तौर से तो यह मात्र शब्दों का क्रम परिवर्तन जैसा लगता है लेकिन चिंतन की प्रक्रिया शुरू होते ही अंतर ध्यान में आना प्रारम्भ हो जाता है। जिन लोगों के लिए भारत भूमि मात्र है वे इस महान भूमि को उपयोगितावाद तथा भोगवाद के सिद्धान्त से देखते हैं। वे प्रकति के दोहन नहीं शोषण में विश्वास रखते हैं। वे मुर्गी के सारे अंडे एक ही दिन निकाल लेना चाहते हैं। लालच के अंधे इन लोगों को मुर्गी के जीवन की भी चिंता नहीं होती। इतना सब होने के बाद भी ए दिल अभी भरा नहीं ... की तर्ज पर हमेशा असन्तुष्ट ही रहते हैं, भारत को गालियां ही निकालते रहते हैं। भारत के प्रति कोई विशेष भावनाएं उनके मन में नहीं होती हैं। हम सब जानते हैं कि भावना विहीन व्यक्ति मशीन से अधिक कुछ नहीं होता। उसे गणेश शंकर विद्यार्थी ने तो मृतक तक की संज्ञा तक दे दी है-
जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है।।
भावनाएं ही जीवन में रस भरती हैं, इसे जीने लायक बनाती हैं। भावना और प्यार पशु तथा पेड़-पौधों तक को झूमने को मजबूर कर देता है, उसे वश में कर देता है, गुलाम बना देता है फिर मनुष्य की क्या विसात है? विज्ञान ने हमे जहां बहुत कुछ दिया है वहीं इसने हमारी प्रसन्नता छीन कर हमारे जीवन को नीरस बना दिया है। हमसे चन्दा मामा छीन लिया, बिल्ली मौसी नहीं रही, तुलसी, गंगा, गऊ या गीता आदि माताओं से भी हमें दूर कर दिया। हम एक प्रकार से सब कुछ होते हुए भी अनाथ से हो गए हैं। इसका अर्थ हम अन्धविश्वास से घिरे रहें कतई नहीं है। हमें विज्ञान से लाभान्वित होते हुए भी अपनी संवेदनाओं तथा भावनाओं को बचा के रखना होगा। आज समाज में सर्वदूर फैली निराशा, हताशा व् डिप्रेसन से बचने के लिए हमें जीवन को भावना प्रधान बनाने की जरूरत है।
मातृभूमि भारत- अनादि काल से ही हमारे लिए यह भूमि साक्षात् देवी रही है। सवेरे उठते ही हमारे पूर्वज यह श्लोक बड़ी श्रद्धा से बोलते आएं हैं- समुद्र वसने देवी पर्वतस्तनमण्डले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यम पादस्पर्शमक्षमस्वमैव।।
अर्थात समुद्ररूपी वस्त्र धारण करने वाली तथा पर्वत जिसके स्तनमण्डल हैं ऐसी विष्णुपत्नी देवी को मैं प्रणाम करता हूँ। हे देवी! मैं पैरों से तुझे स्पर्श कर रहा हूँ इसके लिए मुझे क्षमा करें। हम इसे सजीव देवी मानते हैं। यही भावना हमारे शास्त्रों में अनेक ऋषियों 'माता भूमि पुत्रोsअहं पृथिव्या:।' इसी प्रकार गुरवाणी में भी यही भाव व्यक्त हुए हैं 'पवनगुरु पानी पिता माता धरत महत'। आधुनिक काल में बंकिम चन्द्र चटर्जी ने आनन्दमठ में भारत माता की स्तुति में इसे साक्षात् दुर्गा कहा है। स्वामी विवेकानन्द, महृषि अरविन्द एवम् संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी आदि सभी इसे साक्षात् ईश्वर मानते थे।
प्रेरणास्रोत रही है हमारी पुण्य भूमि- स्वामी विवेकानन्द के जीवन की एक प्रेरक घटना है। जब स्वामी जी पहली विदेश यात्रा से लौट कर भारत में सुमद्री जहाज से उतरे। लोगों को आश्चर्य हुआ तब हुआ स्वामी जी स्वागत के लिए उत्सुकता से इंतजार कर रहे भारी जनसमुदाय की ओर न जाकर मिटटी में लोटपोट होने लगे। पागलों की भांति अपने ऊपर बालू के कणों को अपने ऊपर फैंकने लगे। थोड़ी देर बाद शांत और प्रसन्न मन से जनता की ओर बढ़े। बाद में पूछने पर बोले कि यूरोप के भोगवाद के जो कीटाणु मेरे शरीर और मन में आ गए थे उन्हें भारत की मिटटी से धो रहा था। इसी प्रकार एक अन्य प्रश्न के उत्तर में बोले कि विदेश यात्रा से पहले भारत को प्यार करता था लेकिन अब भारत की मिटटी का एक एक कण मेरे लिए पवित्र है। स्वामी रामतीर्थ तो स्वयं को भारत ही मानते थे। महृषि अरविन्द अपनी धर्मपत्नी को पत्र में अत्यंत सुंदर भाव से समझते हैं कि जब तक अंग्रेज हमारी भारत माता का शोषण कर रहा है भारत के प्रत्येक युवक का प्रथम कर्तव्य रागरंग छोड़ कर माँ की सेवा में स्वयं को समर्पित करे। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता -' वीरों का कैसा हो वसन्त' में भी यही भाव आएं हैं।
क्रांतिकारियों की आराध्य रही है भारतमाता-
भारत की स्वतंत्रता को समर्पित क्रन्तिकारी भारतमाता को अपनी आराध्य मानते थे। इस माँ की आजादी के स्वयं को न्योछावर करने में धन्यता मानी। सभी क्रन्तिकारी इस श्रेष्ठ भाव से अनुप्रेरित थे-
तन समर्पित, मन समर्पित और यह जीवन समर्पित ।।
चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं।। थोडा विचार करें कि ऐसे समर्पण भाव से युक्त युवाओं के देश के लिए दुनिया क्या कुछ प्राप्त करना असम्भव है?
भारत के प्रत्येक ग्राम नगर को सन्तों ने अपनी साधना से पवित्र किया।
चन्दन है इस देश की माटी, तपोभूमि हर ग्राम है।
हर बाला देवी की प्रतिमा बच्चा बच्चा राम है।। इस गीत में भारत के इस शाश्वत सत्य की अभिव्यक्ति है। भारत में प्रायः हर मत के साधु-सन्तों ने मुक्तकण्ठ से भारतभक्ति में साहित्य सृजन जिया है। भारत में तो प्राचीन काल के शक हूण कुषाण आदि हमलावरों से लेकर आधुनिक काल के भक्ति आंदोलन ने मुगल, मुस्लिम और अंग्रेज जैसी विश्व शक्तियों से जूझने के लिए समाज को प्रेरित ही नहीं बल्कि सफलतापूर्वक प्रतिकार के लिए खड़ा किया। हमारे ये सन्त सम्पूर्ण देश में यात्रा कर देशवासियों को देश और धर्म के प्रति जागरूक करते रहते थे। समाज जागरण के लिए गुरु नानक की उदासियां प्रसिद्ध हैं। पंजाब में गुरु परम्परा, महाराष्ट्र में समर्थ गुरु रामदास आदि ऐसे हर प्रान्त में सन्तों की लम्बी श्रृंखला है। हमारे सन्तों ने भारतभक्ति तथा धर्म भक्ति को ही इस्लाम और अंग्रेज जैसी अपने समय की अपराजेय शक्तियों से जूझने के लिए मन्त्र के रूप में प्रयोग किया। स्वंतत्रता के बाद अल्पसंख्यक तुष्टिकरण तथा वोट राजनीती ने सेक्ल्यूरिज्म के नाम पर देश का बहुत बड़ा अहित कर दिया। देशभक्ति को जनांदोलन बनाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लाखों स्वयंसेवक प्रतिदिन महामङ्गले पुण्यभूमे त्वदर्थे का श्रद्धापूर्वक गान करते हैं। संघ आज लाखों युवकों को देशसेवा के मार्ग पर सफलतापूर्वक बढ़ाने में सफल हो रहा है। दुर्भाग्यवश स्वतंत्रता के तुरन्त बाद भारत की प्राणदायनि शक्ति धर्म, सन्तों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पुष्ट करने के बजाए अपमानित किया गया। इनके मार्ग में रोड अटकाए गए। इसके परिणामस्वरूप हमारे नागरिकों में देश को विश्व में नम्बर एक बनाने का का उत्साह और जज्वा गायब हो गया। देशवासी तटस्थ और उदासीन जैसे हो गए। आजादी के संघर्ष के समय का देशभक्ति का ज्वार दूध में आए तूफान की तरह शांत हो गया। सौभाग्य से दशकों बाद आज फिर युवकों में देश को दुनिया का सिरमौर बनाने का जज्वा पैदा हो रहा है। यह हमारे देश के लिए शुभ संकेत है। इस जनून को बनाए रखने और आगे बढ़ाने की आवश्यक्ता है।
बुधवार, 18 मार्च 2015
सच्चाई से कोसों दूर है वरिष्ठ पुलिस अधिकारी रिबेरियो की बेचैनी
पंजाब के पूर्व पुलिस प्रमुख 86 वर्षीय श्री रॉबर्ट रिबरियो की खीज, घबराहट और निराशाभरे वक्तव्य की ओर देश का ध्यान जाना स्वाभाविक है। लेकिन उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत जी, प्रधानमन्त्री श्री मोदी और हिन्दुत्व को कठघरे में खड़ा करने का जो प्रयास किया है उससे उनकी अपनी छवि को धक्का जरूर लगा है। पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध लोहा लेकर देशवासियों की जो श्रद्धा और सम्मान रिबेरियो के प्रति है ऐसे बयानों से मिटटी होता जाएगा। लोगों के मन में प्रश्न आ रहा है कि क्या आतंकवाद के समय पुलिस का नेतृत्व कर उन्होंने देश के प्रति अपना कर्तव्य निभाया था या कोई एहसान किया था? उन्हें याद होगा कि पंजाब में आतन्कवाद के विरुद्ध लोहा पुलिस अधिकारी रिबेरियो ने लिया था न कि ईसाई प्रचारक रिबेरियो ने। और देश की श्रद्धा भी पुलिस अधिकारी रिबेरियो के प्रति है ईसाई रिबेरियो के प्रति नहीं। भारत में सेना और पुलिस में जाति, धर्म नहीं बल्कि व्यक्ति की देशभक्ति और कर्मठता ही सोचने और व्यवहार करने का प्रमुख आधार होता है। आश्चर्य है कि पुलिस अधिकारी रिबेरियो के ऊपर इस उम्र में ईसाई रिबेरियो कैसे हावी हो गया?
काल्पनिक सवाल और आशंकाएं-
रॉबर्ट रिबेरियो द्वारा उठाए गए काल्पनिक सवालों और आशंकाओं से वे पुलिस अधिकारी से ज्यादा ईसाई मिशनरी अधिक लग रहे हैं। क्या इस पुलिस अधिकारी पर उम्र हावी हो रही है? बुढ़ापे में धार्मिक होना, अपने धर्म के प्रति ज्यादा निष्ठावान होना अच्छी बात है लेकिन सच्चाई का दामन छोड़ देना तो ठीक नहीं। क्या ईसाई मिशनरी और अंतर्राष्ट्रीय शक्तियां उभरते भारत के विजय रथ को रोकने के लिए, दुनिया में सरकार और देश की छबि खराब करने के लिए इस पुलिस अधिकारी को प्रयोग करने में सफल हो गयी हैं? रिबेरियो का यह कहना कि मैं अब भारतीय नहीं रह गया हूँ कम से कम उन लोगों के लिए तो कदापि नहीं, जो हिन्दू राष्ट्र के पक्षधर हैं...प्रश्न उठ रहा है कि रिबेरियो साहिब को अपने बारे अचानक यह आशंका क्यों हो रही है? क्या किसी ने रिबेरियो को कुछ कहा है? अगर ये महाशय देश में ईसाई मिशनरियों के विरुद्ध दिख रहे गुस्से को अपना व्यक्तिगत विरोध मान रहे हों तो इन्हें स्वामी विवेकानन्द ने ईसाई मिशनरियों के सम्बद्ध में जो कहा था, उसे याद करना ठीक होगा- हिन्द महासागर में जितना कीचड़ है अगर सारे भारतवासी मिलकर उस कीचड़ को ईसाईयों पर फैंकने लगें तो भी यह उस अन्याय जो ईसाईयों ने भारत के साथ किया है, का शतांश भी बदला नहीं होगा। जहां तक हिन्दू राष्ट्र की बात है तो रिबेरियो साहिब जरूर जानते होंगे कि भारत ही है जहां ईसाई और इस्लाम ही नहीं तो पारसी जैसे नगण्य समाज भी पूरा मान-सम्मान और सुविधाएँ प्राप्त कर रहे हैं, इतना ही नहीं तो बहुसंख्यक समाज से कहीं ज्यादा तो यह हिन्दू भाव के कारण ही है। नहीं तो पाक, बंग्लादेश और अरब देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति क्या है, सारी दुनिया जानती ही है। इसलिए किसी को हिन्दू राष्ट्र से एलर्जी का कोई कारण नहीं होना चाहिए। रिबेरियो साहिब, भारत के बड़े दिल का और क्या प्रमाण चाहते हैं कि ईसाई, मुसलमानों का अत्याचार भरा अतीत आदि सब कुछ भूल कर भारत फिर भी ईसाई और मुसलमानों को गले से लगा रहा है। फिर भी ईसाई और मुसलमान अगर भारत में खुश नहीं तो किसी ने ठीक ही कहा है-
हम बाबफा थे इसलिए गिर गए तुम्हारी निगाहों से
तुम्हे शायद किसी बेबफा की तलाश थी।।
बड़पन्न भारत का या ईसाई मुसलमानों का?
रिबेरियो लिखते हैं कि पुलिस प्रमुख, सेना अध्यक्ष और वायुसेना प्रमुख आदि ईसाई रह चुके हैं। तब किसी ने उनकी निष्ठा को लेकर सवाल नहीं उठाये और अब....! महोदय, सवाल तो अब भी कोई नहीं उठा रहा है। ऐसे प्रश्न खड़े कर, सेना और पुलिस अधिकारीयों को धर्म के तराजू में खड़े कर सवालों को जन्म तो आप खुद दे रहे हैं। अगर आपकी नहर से देखें तो ईसाई या मुसलमानों के कड़वे अतीत के बाबजूद इतने बड़े पदों के लिए देश आप पर भरोसा करता है तो इसमें बड़पन्न किसका है? दुनिया में कोई देश बता दो जहां अल्पसंख्यकों को सर्वोच्च पदों पर बिना किसी भेदभाव के बैठाया जाता हो। इतना सब होने पर भी भारत के अहसानमन्द होने के बजाए भारत की मंशा पर सवाल उठाना कौन सी मानसिकता का सूचक है?
ईसाई मिशनरियों की मासूमियत के क्या कहने? रिबेरियो कहते हैं कि ईसाई समाज बहुत ही शांतिप्रिय और छोटा समाज है। पुलिस अधिकारी रह चुके रिबेरियो अगर यह कहते हैं तो जरूर दाल में बहुत कुछ काला लगता है। इनको अगर इनकी भाषा में ही समझाने की कोशिश करें तो- न्यायमूर्ति वेणुगोपाल आयोग अपनी रिपोर्ट में लिखते हैं- 1982 में तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में हुए भीषण दंगों के लिए ईसाई पादरियों द्वारा किया जा रहा धर्मान्तरण ही मुख्य कारण है। आयोग ने सुझाव दिया कि मतांतरण को प्रतिबन्धित करने के लिए शीघ्र केंद्रीय कानून बनाया जाए। नागालैंड के राज्यपाल ओ पी शर्मा (4 फरबरी 1994) Nationalist Socialist Council of Nagaland को world council के 17 चर्चों से धन मिलता है। रिबेरियो साहिब आपने नियोगी कमीशन की केंद्र सरकार को दी सिफारिशें जरूर पढ़ी होंगी। नहीं तो ईसाई मिशनरियों के चेहरे से सेवा और मासूमियत का नकाब उतारने के लिए जरूर पढ़ लें। ईसाई और इस्लाम की शक्तियों को लेकर संघ प्रमुख गोलवलकर, सुदर्शन या भागवत न सही, महात्मा गांधी, वीर सावरकर, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानंद जैसे महापुरुषों ने देश को किन शब्दों में सावधान किया है जरूर याद करना चाहिए।
आतंकवाद के पीछे चर्च?
पंजाब और पर्वोत्तर भारत में आतँकवाद के पीछे भारत और दुनिया के चर्च सक्रिय रहे हैं और अभी भी हैं, यह पुलिस अधिकारी के रूप में रिबेरियो से ज्यादा कौन जनता है? क्या रिबेरियो साहिब नहीं जानते हैं कि ईसाईयत के प्रचार के नाम पर इस समय भारत में प्रमुख विदेश संस्थाएं सक्रिय हैं? अरबों रूपये विदेशों से इसी काम के लिए आते हैं? अगर नाम ही गिनाने हों तो - बर्ल्ड विजन, वर्ल्ड रीच, यूनिसेफ, केथोलक बिशप कान्फ्रेन्स ऑफ़ इंडिया, इंडिया बाईबल लिटरेचर, हेल्पेज इंडिया क्राई,तथा समाधान आदि आदि। जहां तक इनके भोलेपन का सवाल है तो फ़िल्मी गीत की पंक्तियाँ याद आती हैं -
भोलापन तेरा खा गया मुझको.... केवल इतिहास का एक उदाहरण ही काफी है-1541में जेवियर नाम के ईसाई विजेता ने लाखों हिंदुओं को बलात् ईसाई बनाया। हिन्दू मन्दिरों को तोड़ कर चर्च बनाए गए। हिन्दू विधि से विवाह, यगोपवीत संस्कार अवैध घोषित कर दिए। सिर पर चोटी, घर के बाहर तुलसी का पौधा पर भारी दण्ड था। इसी समय ईसाई अधिकारियों को हिन्दू महिलाओं से बलात्कार करने का अधिकार प्राप्त था। जिन हिन्दू महिलाओं ने विरोध किया, उन्हें पकड़ कर जेलों में डाल कर अपनी काम वासना पूरी कर हेरेटिक्स अर्थात ईसाई मत के प्रति अविश्वासी घोषित कर जिन्दा जला दिया। (दा गोआ- इन्विजिशन - प्रयोलकर) क्या ये केवल अतीत की बातें हैं? काश! ये सच होता? आज भी देश में ईसाई मिशनरी भोले भाले गरीब हिन्दुओं का किस चालाकी से धर्मान्तरण कर रहे हैं, सारा पूर्वोत्तर ही नहीं तो देश के अनेक राज्यों सहित अब तो पंजाब भी चीख चीख कर अपनी बेदना कहता सुना जा सकता है। भोले-भाले मासूम स्कूली बच्चों के दिल में ईसा की महानता बैठाने के लिए भगवान राम, कृष्ण के नाम से बस को धक्का लगवाना और न चलने पर ईसा का नाम लेकर बस चला देना, भगवान राम, कृष्ण की लोहे की मूर्ति को पानी में डूबने देना और ईसा की लकड़ी की मूर्ति को तेरा कर बच्चों के सामने सिद्ध कर देना कि ईसा ही उन्हें भवसागर में तैरा कर पर लगा सकते हैं। ऐसे और कितने ही चालाकी भरे कृत्य मिशनरी करते हैं कि स्वर्ग में बैठे ईसा भी शरमा रहे होंगे। रिबेरियो साहिब ठीक कहते हैं कि ईसाई लोगों ने शिक्षा, चिकित्सा में बहुत योगदान दिया है यह बात भारत भी स्वीकार करता है, इसके लिए इन्हें धन्यवाद भी देता है, लेकिन इन सेवा संस्थानों और कार्यों की आड़ में कितना धर्मान्तरण हुआ है जब इसका विचार करते हैं तो इन ईसा के दूतों की सज्जनता, भोलेपन और सेवाभाव का सारा नकाब उतर जाता है। क्या रिबेरियो साहिब एक सवाल का जबाब देश को देंगे? देश के उन्हीं हिस्सों में अलगावाद, आतँकवाद, देश के बिरुद्ध गाली-गोली की बात क्यों सुनाई देती हैं जहां ईसाई या मुसलमान अधिक संख्या में होते हैं? जम्मूकश्मीर से लेकर नागालैंड, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, मणिपुर, बंगाल आसम और अरुणाचल आदि राज्य इसका सीधा प्रमाण हैं।
संघ को कितना जानते हैं रिबेरियो?
अपनी धुन में रिबेरियो प्रधानमन्त्री श्री मोदी के साथ ही संघ और संघ प्रमुख मोहन भागवत को भी लपेट गए। क्या रिबेरियो संघ को जानते हैं? संघ की देशभक्ति की दाद तो संघ के कट्टर विरोधी भी देते रहे हैं। संघ की देशभक्ति सेना या पुलिस से किसी भी अर्थ में कम नहीं है फर्क केवल इतना है की सेना और पुलिस में सेवा के बदले वेतन मिलता है जबकि संघ में घर फूँक तमाशा देखना होता है। लगता है संघ पर प्रश्न उठा कर उन्होंने अपनी अज्ञानता और खीज का ही परिचय दिया है। उन्होंने मदर टेरसा को लेकर मोहन भागवत के जिस वक्तव्य की बात की है क्या वे जानते हैं कि यह बात मोहान भागवत ने नहीं, बल्कि कार्यक्रम के अध्यक्ष ने कही थी। मोहन भागवत ने तो कहा कि मदर टेरसा क्या थी और उनके उद्देशय क्या थे हम नहीं जानते हम तो केवल अपना बता सकते हैं कि हम गरीबों की शुद्ध सेवा भाव से करते हैं। पुलिस अधिकारी रह चुके रिबेरियो ने भी तथ्यों की जाँच पड़ताल किए बगैर ही संघ के बिरुद्ध मोर्चा खोल दिया तो क्या कहा जा सकता है? हालाँकि मदर टेरसा को लेकर अब कोई भ्रम नहीं रहा है। स्वयं उन्होंने कई जगह अपने सारे सेवा कार्यों के पीछ का उद्देशय शुद्ध धर्म परिवर्तन बताया है। अगर सेवा ही उद्देशय था तो क्या ईसाई देशों में गरीबी, भेदभाव समाप्त हो चुका था जो वह भारत में आ डटी? हम मदर टेरसा की इज्जत करते हैं, जो उन्होंने सेवा कार्य किए उसके लिए हृदय से धन्यवाद भी करते हैं लेकिन इस सबके बाबजूद सच्चाई से पीछे भागना कहां तक ठीक है? रिबेरियो साहिब जरूर जानते होंगे कि अपने सेवा कार्यों और मासूमियत के बल पर ईसाईयत देशों के देश निगल गयी। मात्र 2000 सालों में 100 से ज्यादा देश ईसाई हो चुके हैं। क्या यह केवल ईसाईयत की महानता के कारण हुआ या धोखा, धक्का इसके पीछे का मूल कारण है? अफ़्रीकी देश केन्या के राष्ट्रपति की बेदना सुनें- जब ईसाई मिशनरी इस देश में आए तो अफ्रीकियों के पास जमीन थी और मिशनरियों के पास बाईबल। उन्होंने हमें आँख बन्द करके प्रार्थना करना सिखाया जब हमने ऑंखें खोली तो देखा कि उनके पास जमीन है और हमारे पास बाईबल! संघ को ईसाईयत या इस्लाम से कोई समस्या नहीं है। देशवासी ईसा और मुहम्मद का सम्मान सब करते हैं। भारत में सबकी पूजा पद्धति, मत मतांतर का सम्मान करने की परम्परा है। गोआ में सबसे पहले आए ईसाई पादरियों और इस्लाम के अनुयायियों को चर्च और मस्जिदें हमने स्वयं बना कर दी हैं। लेकिन देश का युवा जानना चाह रहा है हमे हमारी इस उदारता का क्या सिला मिला? पंजाबी गीत की पंक्तियाँ यहां सटीक बैठती हैं-
अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का!
यार ने ही लूट लिया घर यार का!!
संघ देश को सावधान और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता रहता है कि ईसाईयत और इस्लाम मजहब के नाते स्वीकार्य स्वीकार्य हैं लेकिन इनकी आड़ में देश विरोधी तत्वों या शक्तियों को पनपने न दें। संघ का कोई अपराध है तो बस इतना ही है। अगर अन्य देशवासियों के साथ-2 ईसाई व् इस्लाम के बन्धुओं से देशभक्ति की अपेक्षा करना अपराध है तो हमारा तो यही कहना है-
वो कौन हैं जिन्हें तौबा को मिल गयी फुर्सत।
हमें तो गुनाह करने को भी जिंदगी कम है।।
अब अपने आप को देशबाह्य शक्तियों से दूर रखना, देश की मिटटी से जुड़े रहना ये जिम्मेदारी ईसाई और इस्लाम नेतृत्व की भी है। किसी को पसन्द आए या नहीं लेकिन भविष्य के भारत में सम्मान और विश्वास प्राप्त करने के लिए यह पूर्व शर्त जरूर है।
रविवार, 15 मार्च 2015
समाज मन्थन का कुम्भ है संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की वार्षिक बैठक इस वर्ष मार्च13 से 15 तक नागपुर में सम्पन्न हुई। संघ की नीति निर्धारक इस सर्वोच्च सभा की बैठक देश विदेश में सबके लिए उत्सुकता का विषय रहती है। संघ का चुनाव वर्ष होने के कारण इस बार यह उत्सुकता और रोमांच थोडा ज्यादा ही दिख रहा था। मीडिया ने तो अपनी सीमा पार करते हुए कल्पना के घोड़े दौड़ाते हुए संघ की नई कार्यकारिणी का गठन भी कर दिया था। लेकिन संघ की कार्यकारिणी को देख कर उन्हें थोड़ी निराशा जरूर हुई होगी। एक हजार से अधिक प्रतिनिधि देश की वर्तमान परिस्थितियों, चुनोतियों, कार्यविस्तार तथा संगठन के अनेक पहलुओं पर विचार विमर्श करने के लिए तीन दिन डटे रहे। इस प्रतिनिधि सभा में संघ के नेतृत्व के अतिरिक्त संघ प्रेरणा से चल रहे संगठनों की अखिल भारतीय टोली इस बैठक में रहती है।
संविधान का अक्षरशः पालन होता है संघ में-
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने आप में अदभुत संगठन है। वर्तमान में राजनैतिक दलों में सांगठनिक चुनावों में मचती भागदौड़ व उठापटक और अपना वर्चस्व कायम रखने की तिकड़मबाजी सर्वदूर देखी जा सकती है। इतना ही नहीं तो आज जब इस जोड़तोड़ की बीमारी के वायरस की लपेट में आने से बहुत कम सामाजिक व् धार्मिक संगठन बच पाएं हैं ऐसे में संघ संगठन में चुनाव सौहार्दपूर्ण वातावरण में शांतिपूर्वक हो जाना अधिकांश लोगों की समझ से परे है। वास्तव में संघ को समझने के लिए संघ का चश्मा जरूरी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक पारिवारिक संगठन है और इसे इसी नजरिये से देखेंगे तो आसानी से सब कुछ समझ आ जायेगा। प्रसन्नता की बात है कि संघ आज भी विशुद्ध परिवार भावना से कार्य करता है। इसी कारण यहां चुनाव के समय टांग खिंचाई का सब जगह दिखने वाला चुनावी परिदृश्य गायब रहता है। शायद कम लोगों को पता होगा कि संघ में पहले तो लिखित संविधान भी नहीं था। संघ का मानना है कि परिवार में कोई लिखित संविधान न होने के बाद भी हमारे देश में लाखों वर्षों से परम्परा से परिवार चलते आए हैं। इसी आधार पर सामाजिक संगठन क्यों नहीं चल सकते? यहां अधिकारी मतलब अधिक काम करने वाला और अधिक कष्ट उठाने वाला होता है। संघ में पद से नहीं अपने व्यवहार से सम्मान प्राप्त करना होता है। ऐसे में पद की होड़ सिर पैर रख कर गायब नहीं होगी तो क्या होगा? संघ की इस अदभुत कार्यपद्धति का ही परिणाम है कि प्रतिनिधि सभा में आपके आगे पीछे कौन बैठा है? साथ में भोजन कौन कर होता है किसी को पता नहीं चलता। जिनको मिलने के लिए बाहर लोगों में होड़ रहती है यहां वे भी अनाम और साधारण कार्यकर्ता की तरह देखे जा सकते हैं।
संघ संविधान की यात्रा
संघ स्थापना की प्रक्रिया, नामकरण, व्यक्ति के बजाए गुरु के रूप में भगवा झंडा स्वीकार करना और कोई औपचारिक सदस्यता आदि न रखना अपने आप में लोगों को हैरान करता है। संविधान को लेकर भी कुछ कुछ ऐसा ही है। प्रारम्भ में संघ का कोई संविधान नहीं था।
सन् 1948 में गांधी हत्या के आरोप में संघ से प्रतिबन्ध हटाने के लिए सरकार की लिखित संविधान की जिद के चलते संघ ने लिखित संविधान स्वीकार किया। एकबार संविधान स्वीकार कर लेने पर संघ पूरी श्रद्धा से मनसा, वाचा और कर्मणा अपने संविधान का पालन करता आया है।
क्या है संघ् का संविधान
वैसे तो संविधान संविधान पढ़ कर संघ में आना और कार्य करने वालों की संख्या अपवाद ही होगी। साधारण स्वयंसेवकों को छोड़ भी दें तो जिन्होंने संघ् के लिए जीवन दिया है ऐसे प्रचारक बन्धुओं में से भी कितनों ने ध्यान से पूरा संघ संविधान पढ़ा होगा यह सर्वेक्षण का विषय हो सकता है। मात्र 8/10 पेज का संघ संविधान शायद सबसे छोटा और साधारण होगा। संविधान के अनुसार प्रत्येक प्रतिज्ञा लिया हुआ 5 साल से सक्रिय स्वयंसेवक शाखा प्रतिनिधि के लिए मतदान कर सकता है, प्रत्याशी भी हो सकता है। प्रत्येक 40 सक्रिय प्रतिज्ञत स्वयंसेवकों पर एक शाखा प्रतिनिधि चुना जाता है। ऐसे 50 शाखा प्रतिनिधि एक अखिल भारतीय प्रतिनिधि चुनते हैं। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में सभी चुने हुए प्रतिनिधि, प्रान्त व क्षेत्र प्रचारक, कार्यवाह और संघचालक सरकार्यवाह के चुनाव में मतदाता होते हैं। संघ के अभी तक के इतिहास में सरकार्यवाह का चुनाव सर्वसम्मत लेकिन पूरी चुनावी प्रक्रिया पूर्ण कर होता आया है। संघ् की कार्यपद्धति का ही कमाल है कि सबको लगता है कि नया सरकार्यवाह जैसे उनकी अपनी ही पसन्द है। चुनाव जिस सौहार्द और हंसी मजाक में पूरा होता है आज के इस राजनैतिक द्वेष के वातावरण में उसके साक्षी बनना देव दुर्लभ अवसर ही कहा जा सकता है। यह चुनाव किसी भी प्रकार से देवलोक में हुए घटनाक्रम से कम नहीं कहा जा सकता। हालाँकि देवलोक में भी ईर्ष्या द्वेष की कई कहानियाँ सुनाई देती हैं लेकिन संघ पर ईश्वर कृपा है कि यह संगठन अपनी स्थापना के नो दशक पूरे करने के बाद भी मनुष्य जीवन की सहज कमियों से बचा हुआ है। इसका अर्थ कुछ विषयों पर मतभेद नहीं होते , यह कहना तो ठीक नहीं लेकिन मतभेद स्वस्थ वातावरण में स्नेह के आधार पर सुलझा लिए जाते हैं। संघ की सफलता के पीछे यह बहुत बड़ा कारण कहा जा सकता है। अभी-अभी हुए चुनाव में उतरी क्षेत्र के संघचालक डॉ. बजरँग लाल गुप्त चुनाव अधिकारी थे। उन्होंने पूरी चुनावी प्रक्रिया सम्पन्न करायी। एक ही नाम आने के कारण सरकार्यवाह के रूप में भैया जी जोशी जी तीसरी बार पुन: चुने गए। चुनाव के बाद नवनिर्वाचित सरकार्यवाह तीन साल के लिए केंद्रीय कार्यकारिणी चुनते हैं। संगठन में संघचालक और सरकार्यवाह का चुनाव और शेष सभी पदाधिकारियों का चयन होता है।
देश समाज की परिस्थितियों का होता है गहन विश्लेषण
प्रतिनिधि सभा में सम्पूर्ण देश की परिस्थितियों का बारीक़ विश्लेषण होता है। समाज, सरकार और स्वयंसेवकों को दिशा देने के लिए कुछ प्रस्ताव पास किए जाते हैं। संगठन कार्य की गति- प्रगति, दिशा और दशा आदि सब विषयों पर चिंतन- मनन होता है। संघ् कार्य में देशभर में हुए नए प्रयोगों का वर्णन सबके सामने रखा जाता है। इस वर्ष संघ कार्य में सन्तोषजनक वृद्धि दर्ज की गयी। पहली बार 50 हजार से ज्यादा शाखाएं हुई हैं। अगले वर्ष एक लाख गांवों तक पहुंचने का लक्ष्य तय किया गया। संघ प्रेरणा से चल रहे विविध संगठनों के कार्य का संक्षिप्त वृत्त भी रखा जाता है। हर एक संगठन अपने आप में पूर्ण सृष्टि लगता है। समय आभाव में बड़े बड़े संगठनों को भी तीन चार मिनट में ही अपनी बात कहने के लिए मिल पाते हैं। सब कुछ सुनकर लगता है कि संघ संगठन का यह जगन्नाथ रूपी रथ भारत को विश्वगुरु के पद आरूढ़ किये बिना कैसे रुक सकता है? संगठन कार्य और समाज की नवीन रचना के लिए कैसे कैसे लोग, कितना त्याग और बलिदान कर रहे हैं, सुन कर रोमांच होता है। इस वर्ष दो विषयों पर प्रस्ताव पास किये गए। पहले प्रस्ताव में कम से कम प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में हो इसके सरकार तथा अभिभावकों का आवाहन किया गया तथा दूसरे प्रस्ताव में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योगदिवस स्वीकार कराने के लिए सरकार, सरकारी अधिकारीयों के परिश्रम के लिए तथा यू एन सबका धन्यवाद किया गया। इसके साथ ही स्वयंसेवकों तथा समाज को योगदिवस को जन-जन का आंदोलन बनाने का आवाहन किया गया। प्रतिनिधि सभा के आखिर में सरसंघचालक जी के पाथेय ने सभी प्रतिनिधि नए जोश और उत्साह के साथ अपने अपने कार्यक्षेत्र में वापिस लौटे।