शनिवार, 30 जनवरी 2016

क्रूर इस्लामिक आतंकवाद के आगे विश्व असहाय क्यों! निर्दोष महिला और बच्चों को बचाने आगे आना होगा

सोचा था कि हाकिम से करेंगे शिकायत। कमबख्त वो भी तुझे चाहने वाला निकला।। आखिर इस्लामिक आतंकवाद की शिकायत कहां और किस से की जाए? आए दिन अख़बारों और सोशल मीडिया में इस्लामिक आतंकवाद की खबरें और फ़ोटो देख कर मन दहल जाता है, अत्यंत बेचैन हो जाता है। हैरानी और निराशा यह देख कर और बढ़ जाती है कि भारत और विश्व में मानवाधिकार के झंडाबरदार हों या महिला अधिकार के चैम्पियन सब मुंह में ताला लगा कर बैठे हैं। जब भारत में असहिष्णुता आदि का बिना बजह का शोर मचाने वाले या पुरष्कार लौटाने वाली गैंग भी जब रहष्यमयी चुप्पी धारण कर लेती है तो उनकी नोटँकी, दोगलापन और एक बड़े षड्यंत्र की गन्ध आना स्वाभाविक ही है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, यह प्रवचन सुनते सुनते कान पकने लग गए हैं। ये ठीक है की सारे मुसलमान आतंकवादी नहीं होंगे या इस्लाम केवल आतंकवाद नहीं सिखाता होगा लेकिन यह तो पक्का है कि इस्लाम और इस्लामिक नेतृत्व जिहाद के नाम पर गैर मुस्लिमों के साथ विशेषकर महिलाओं और बच्चों के साथ क्रूरता और नीचता की हद को छू लेता है। और इस सब में उन्हें किसी प्रकार का पछतावा या दुःख आदि न होकर सन्तुष्टि जैसी ही होती है। फर्क इतना है कि इस्लामिक नेतृत्व को लोकलाज के चलते कहीं दबी जुबान से विरोध करना पड़ता लेकिन बहुत जगह तो मानवता की सारी सीमा और संवेदनाएं पार कर इन पाषणयुगीन कृत्यों को खुला समर्थन देने से भी गुरेज नहीं करता।
धर्म के नाम पर सनकीपन- क्या महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध नीचता की हद तक उतर कर अमानवीय ढंग से अत्याचार, सेक्स स्लेव परम्परा आदि किसी धर्म का हिस्सा हो सकता है? थोड़ी देर के लिए मानव की पाशविक वृतियों के चलते दूसरी औरतों से जबरदस्ती सेक्स को स्वीकार भी लें तो भी सामूहिक दुष्कर्म और इतना ही नहीं तो उसके बाद उनकी निर्मम हत्या को क्या कहेंगे? इसके साथ ही बच्चों की निर्मम हत्याओं को सनकीपन नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे? ऐसा लगता है कि इस्लाम की आड़ में मनुष्य रूप में राक्षस वृतियां खुल कर अपना तांडव कर रही हैं। पागल कुत्ते की तरह इन दुष्प्रवृत्तियों को सख्ती से उनकी भाषा में बोलकर अर्थात निर्दयी हो कर (डॉक्टर की तरह जो मरीज के भले के लिए अपना मन पक्का कर ब्लेड से चीरफाड़ करने में गुरेज नहीं करता)  समाप्त करने के सिवाए कोई मार्ग नहीं है। कई बार तो इस्लामिक आतंकवादियों से भी ज्यादा अपराधी मुझे कथित सभ्य समाज दिखता है जो मौन धारण किए बैठा है। हम कवि की उस वाणी को क्यों भूल रहे हैं
मत समझो कि पाप का भागी केवल व्याध।
जो चुप हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध।। हरिसिंह नलवा और बन्दा बहादुर ही इस्लामिक आतंकवाद का सही उत्तर होगा।
भारत को इस्लामिक आतंकवाद के सफाए का नेतृत्व करना होगा- क्योंकि भारत ने सदियों तक इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध लगभग एक हजार साल का लम्बा संघर्ष किया है। आज जहां इस्लामिक आतंकवाद को याद कर हम सिहर उठते हैं वहीं हमारे प्रतिकार को स्मरण कर इस्लाम के कथित झंडाबरदारों की रूह भी काम्प उठती है। गुरु गोबिंदसिंह, छत्रसाल, छत्रपति शिवजी, महाराणा प्रताप बन्दा बहादुर और हरिसिंह नलवा के रूप में इस्लामिक आतंकवाद से लोहा लेने का हमारा अच्छा अनुभव है। मुसलमान कवि का दर्द भारत के असीमित साहस और शक्ति को स्मरण दिलाता है-
वो दीने इलाही का बेबाक बेड़ा न काबुल में अटका, न........
वो डूबा दहाने गंगा के आकर।।
इस्लाम की जिस आंधी ने पूरे विश्व को पैरों तले रौंद दिया, देश के देश डकारने वाला इस्लाम भारत में घुटने टेकने को बेबश हो गया था। युद्ध के नशे में चूर एक इस्लामिक बहादुर! की आप बीती भी कम रोचक नहीं है जो भारतीय वीरों से पाला पड़ते ही युद्ध का जिक्र चलने मात्र से हाय अल्लाह, हाय अल्लाह चिलाने लग पड़ता था। युद्ध में उसका भूत एक ही तलवार के बार से उतर गया था। युद्ध की बात चलने पर बार बार अपने पैरों को चूमता था कि इन्हीं पैरों की बाबत युद्ध से जान बचा कर भाग सका था। हमारी जबरदस्त आंतरिक प्रतिरोधक और सर्व समावेशक शक्ति के चलते युद्ध के साथ-साथ सांस्कृतिक मोर्चे पर भी इस्लाम भारतीय रंग में रँगने लग गया था। हमने रहीम, रसखान जैसे अनेक भारत भक्त लोगों की लम्बी श्रृंखला पैदा कर दी थी। भारत को शायद अभी और दुःख सहन करने होंगे इसलिए ठीक उसी समय अंग्रेज आ टपका नहीं तो इस्लामिक कट्टरता को हमने नकेल डाल ली थी। इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ इस लम्बे और सफल संघर्ष के कारण लगता है इस्लामिक कट्टरता के सांप फन को कुचलना यह इंग्लैंड अमेरिका के बस की बात नहीं है। इन पर तो यह उक्ति ठीक बैठती है-
  न उठी थी खंजर न उठेगी इनसे
ये बाजू मेरे अजमाए हुए हैं।
इस्लामिक आतंकवाद से संकट में पड़ रहे मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए भारत को ही आगे आना होगा। आवश्यकता राष्ट्र के रूप में फ्रांस और जापान की तरह सही सोच और स्पष्ट लक्ष्य की है। विश्व के प्रति हमें अपने दायित्व को लेकर हम मौन और तटस्थ नहीं बैठ सकते। इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध सम्पूर्ण विश्व को लामबंद करना होगा। सन्तोष का विषय है कि वर्तमान भारत सरकार ने इस दिशा में धीरे धीरे लेकिन गम्भीर प्रयास प्रारम्भ कर दिया है। जापान, इजरायल की यात्रा, बराक ओबामा और अब फ्रांस के राष्ट्रपति श्री ओलांद से दोस्ती को विकास के साथ साथ इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध धार देने की दिशा में गम्भीर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

अभिभावक अपने बच्चों के लिए कैसे खोजें उचित विद्यालय?

फरबरी आते आते अपने बच्चों को अच्छे विद्यालय में दाखिल कराने को लेकर अभिभावकों की धड़कन बढ़नी शुरू हो जाती है। अपने स्वप्न के विद्यालय में बच्चे के प्रवेश के लिए सारे सम्भव नैतिक अनैतिक माध्यमों का प्रयोग करने को भी उद्यत रहते हैं। बच्चे को उनकी पसन्द के विद्यालय में प्रवेश मिल पाएगा की नहीं यही चिंता उन्हें खाए जाती है। ऐसा लगता है जैसे कि अपनी कल्पना के विद्यालय में बच्चे के प्रवेश मात्र से उन्होंने बच्चे का उज्ज्वल भविष्य सुरक्षित कर लिया। जबकि सब जानते हैं कि जीवन में सफलता बहुत आगे की बात होती है और वह कई अन्य बातों पर भी निर्भर करती है। आज प्रायः हर अभिभावक अपने बच्चों के लिए सर्वोत्तम विद्यालय खोजने में परेशान दिखाई देता है। इसके साथ ही आज विद्यालय भी अच्छे बच्चों और अभिभावकों की तलाश में परेशान दीखते हैं। दोनों को एक दूसरे से पर्याप्त शिकायतें रहती हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपना विश्लेषण न करने के कारण दोनों परस्पर एक दूसरे की कमियां निकालते रहते हैं। और इस कारण दोनों की ही तलाश कभी पूरी नहीं होती। और इस कारण दोनों से सन्तुष्टि कोसों दूर रहती है। इस निराशा, खीज और असन्तुष्टि का बड़ा कारण आप अच्छा या सर्वश्रेष्ठ विद्यालय या योग्य अभिभावक मानते किसको हैं, इस प्रश्न के उत्तर में छिपी है। अभिभावक विद्या मन्दिर में क्या तलाशें इस विषय पर चिंतन करेंगे।

अभिभावक क्या ढूंढें विद्या मन्दिर में-

  अभिभावक के रूप में अपने बच्चे के लिए सबसे बढ़िया विद्यालय खोजना हर व्यक्ति की चाहत होना स्वाभावविक है। लेकिन अच्छे विद्यालय का आधार क्या रहता है और क्या रहना चाहिए, यह यक्ष प्रश्न है। आज शिक्षा जगत में बाज़ारवाद खुलकर खेलता देखा जा सकता है। शिक्षा क्षेत्र में बड़े घराने उतर आ जाने से यह गलाकाट प्रतियोगिता अपने पूरे उफान पर है। अधिकांश अभिभावक विद्यालयों की चकाचौन्ध में खो जाते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह सारा मायाजाल उनकी जेब से गए या जाने वाले पैसे का चमत्कार है। इससे भी बड़ी बात बच्चे की शिक्षा के स्तर का एसी बस, कमरे आदि का को खास सम्बद्ध नहीं है। अभिभावक होने के नाते बच्चे की सुख सुविधा को लेकर चिंता करना ठीक है लेकिन इसके साथ ही हमें विचार करना होह कि बच्चे को अंदर से मजबूत बनाना है या छईमुई बना कर जीवन संग्राम के लिए तैयार करना है। हमे अपनी प्राचीन शिक्षा व्यवस्था जहां राजा और र्नक सभी के बच्चे गुरुकुल में समान सुविधाओं में समान शिक्षा प्राप्त करते थे। हमें याद रखना होगा कि जीवन माँ की गोद की तरह मुलायम नहीं है। इसे सफलता पूर्वक पार करने के लिए बालक को शरीर मन बुद्धि और आत्मा से मजबूत होना आवश्यक है। दुःख का विषय है कि छात्र के विकास के इस महत्वपूर्ण पक्ष की ओर न विद्यालय का और न ही अभिभावकों का ध्यान या प्राथमिकता है। घर और स्कूल सब जगह पढ़ाई पढ़ाई और पढ़ाई! छाई रहती है। अभिभावकों को इस तथ्य को विस्मरण नहीं करना चाहिए कि स्वस्थ शरीर और मन में ही बच्चे का भविष्य सुखद और सुरक्षित है।

शिक्षा के साथ संस्कारक्षम वातावरण हो प्राथमिकता-

आज अधिकांश अभिभावक और विद्यालय बच्चों को गणित, विज्ञान या अंग्रेजी को रटाने को ही शिक्षा समझने लगे हैं। जबकि प्रायः सभी शिक्षा शास्त्री मानते हैं कि बच्चे को शिक्षा के प्रति लगॉव, खेल, व्यायाम तथा नैतिक मूल्य पैदा हो जाने के बाद उचित समय पर इन विषयों में विद्यार्थी स्वयं प्रगति कर लेता है। छात्र का व्यक्त्तिव विकास विद्यालयों और अभिभावकों की प्राथमिकता होनी चाहिए।  इसके बिना अगर बालक औपचारिक अध्ययन से बड़ा अफसर बन भी गया तो समाज और परिवार के लिए सरदर्द ही बनेगा। आज अधिकांश भरष्टाचारी, आतंकवादी और बड़े अधिकारी अपने शैक्षिक कैरियर में तो सबसे आगे ही थे। घर या विद्यालयों में सम्पूर्ण व्यक्त्तिव का विकास न होने के कारण आज अधिकांश डॉक्टर, इंजीनियर या प्रशासनिक अधिकारी व्यक्तिगत जीवन में अब्बल दर्जे के स्वार्थी, नशेड़ी और नैतिक मूल्यों से दूर होते हैं। जिन माता पिता ने कभी उनके अच्छे अंक प्राप्त कर सफलता के शिखर छूने पर मिठाई बांटी होती है वही जब

वृद्ध आश्रम की ओर रुख करते हैं तो उनके मन पर क्या बीतती होगी? आखिर इसमें दोष किसका है? यहां तो 'बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से आएं... कहावत ठीक बैठती है। केवल कलियुग, आधुनिक वातावरण को दोष देकर समस्या का हल नहीं मिल सकता। हमें याद रखना होगा कि अपने शिशु के लिए विद्यालय का चययन और वृद्व आश्रम में अपने कमरे की बुकिंग  का सीधा सम्बद्ध है। इसलिए औपचारिक शिक्षा के अतिरिक्त भारतीय संस्कार, बच्चों में देश समाज के प्रति संवेदना तथा कुछ करने का जज्बा पैदा करने में प्रयासरत विद्यालय को ही अपने बच्चे के लिए चुनना चाहिए। इसके लिए हमें अपने बच्चों के लिए सर्वहितकारी (विद्या भारती), डीएवी, तथा सामाजिक संस्थाओं द्वारा संचालित विद्यालय या भारतीय संस्कृति को आधार बना कर शिक्षा देने को कटिबद्ध निजी विद्यालयों को प्राथमिकता देनी होगी। कॉन्वेंट या कॉन्वेंट पैटर्न पर पाश्चात्य संस्कारों में उन्हें मात देने में लगे निजी विद्यालयों से बचना चाहिए। याद रखें कि अपने बच्चे के लिए अच्छे विद्यालय का चययन बच्चे के साथ साथ हमारे अपने सुखद भविष्य का आधार बनने वाला है। ऊंचीं फ़ीस, बाहरी चकाचौन्ध में बहने वाले हमारे अभिभावकों को अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन का अपने बेटे के प्रिंसिपल को लिखा पत्र अवश्य पढ़ लेना चाहिए।

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

कैसे बनें हम भऱष्टाचारमुक्त राष्ट्र व् समाज?

जो देश शिष्टाचार और जीवन मूल्यों के लिए जाना जाता था आज वहां सब जगह गहरी जड़ें जमाये बैठे भरष्टाचार को देख कर हैरानी होती है। आज स्थिति यहां तक आ गयी है कि आज ये सब जीवन मूल्य हाशिये पर चले गए लगते हैं। इस में सबसे बड़ी चिंता का विषय भरष्टाचार का समाजीकरण अर्थात प्रतिष्ठा प्राप्त होना है। प्रसिद्ध साध्वी ऋतम्भरा का कहना अत्यंत सार्थक लगता है- कुछ दशक पहले जब कोई व्यक्ति किसी को काम के बदले कुछ देने की बात करता था तो उसकी सहज प्रतिक्रिया होती थी- ना, बाबा ना! हम बाल बच्चे दार हूँ , ऐसा पैसा स्वीकार नहीं कर सकता।' और आज स्थिति यह है कि काम के बदले खुल कर मांगता है और समझाने पर कहता है कि क्या करूं आखिर बाल बच्चेदार हूँ, इसलिए मजबूरी है।' आज सबने भ्रष्टाचार को एक आवश्यक बुराई के रूप मे स्वीकार जैसा कर लिया है। भ्र्ष्टाचार को लेकर थोड़ी चीख पुकार दहेज की तरह तभी होती जब व्यक्ति को स्वयं इसका शिकार हो जाता है, उसे स्वयं रिश्वत देनी पड़ती है। लेते समय व्यक्ति अनेक तर्क देकर रिश्वत को न्यायोचित बता कर स्वीकार कर लेता है। इसलिए यह चीख पुकार चाय के कप मे तूफान से अधिक कुछ नहीं होता। आखिर यह सब कैसे हुआ? कौन है इसके लिए जिम्मेवार? कैसे निकल सकते हैं हम इस भयंकर समाजिक अभिशाप से? भरष्टाचार के कारण कितनी जवानियाँ, उनके अरमान सब तबाह हो जाते हैं? इसलिए इस महत्वपूर्ण विषय पर गम्भीर चिंतन-मन्थन कर कुछ कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है। आज जब केंद्र मे भरष्टाचार रहित ईमानदार सरकार देने के लिए प्रधानमन्त्री ओर उनकी टीम संकल्पबद्द है, देश का युवा ईमानदार व्यवस्था चाह रहा है ऐसे में लगता है कि सब मिलकर इस भरस्टाचार रूपी राक्षस पर धावा बोलें तो बात बन सकती है। घोर निराशा के वातावरण में एक अच्छी खबर है कि नई सरकार के थोड़े से प्रयास से ही अब नई रेटिंग में भारत में भरष्टाचार में भरी गिरावट आई है। किसी ने ठीक ही कहा है कौन कहता है कि आसमान में छेद नहीं हो सकता एक पत्थर तबीयत से उछालो तो यारो। जड़ कहाँ है भरस्टाचार की- सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी या प्रकृति कितने भी नियम से चलें तो भी मनुष्य मन की तरह व्यक्ति का स्वभाव नियम में चलने का नहीं है। किसी न किसी प्रकार से कोई न कोई रास्ता निकलने की तिकड़म में व्यक्ति लगा रहता है। भारत में तो आज नियम से, धैर्यपूर्वक काम करवाना तो पिछड़ेपन की निशानी बनता जा रहा है इसके विपरीत जुगाड़ तकनीक से आगे बढ़ने को बहादुरी और स्टेट्स का प्रतीक माना जाने लगा है। यह जीवन शैली ही भरस्टाचार को उतपन्न करती है। इसके अलावा समाज जीवन में पैसे का वर्चस्व भी बड़ा कारण है। सर्वे गुणा: काञ्चनम् आश्रीति... अर्थात जिदे घर दाने उदे कमले भी सयाने। इसलिए देश में धन कमाने की अंधी दौड़ शुरू हो गयी। फिर जीवन मूल्य बेचारे क्या करते? आज समाज जीवन का शायद ही कोई भाग इस गिरावट से बचा हो। कैसे निजात मिले इस बुराई से- हमें धन से ज्यादा गुणों व आचरण को प्रतिष्ठित करना होगा। लोष्ठवत द्रब्येशु... अर्थात दूसरे के धन को मिट्टी समझना चाहिए। इसके अलावा अगर हम धैर्यपूर्वक नियमानुसार अपने काम करवाने के लिए बजिद जो जाएं तो भरस्टाचार रूपी राक्षस का दम घुटने लग जायेगा। हम दूसरें के समय तो नियम कानून की बात करते हैं और अपनी बारी आने पर सब कुछ भूल कर अपना काम करवा लेना चाहता है। हमें भरष्टाचार को आर्थिक से आगे ले जा कर अन्य पहलुओं में भी देखना होगा। वेतन पूरा और काम में चमड़ी बचाना, अपने वचन से पीछे हटना और चारित्रिक अवमूल्यन भी इसी ढंग से देखना चाहिए। जहां तक निजात पाने का विषय है उसमें राष्ट्र का कोई बड़ा लक्ष्य स्थापित करना भी सहायक हो सकता है। लक्ष्य प्रेरित व्यक्ति ओर समाज अपने व्यवहार को स्व नियंत्रित करता है। हमें विश्व गुरु भारत का लक्ष्य प्रत्येक देशवासी में पैदा करना होगा। इस महान लक्ष्य की दीवानगी प्रत्येक नागरिक में पैदा करनी होगी। इसके बाद हमारी अनेक बुराईयां स्वयं ही मिटती और सिर पर पैर रख कर भागती हुई दिखेंगी। और हम एक बार फिर दुनिया में सबसे अच्छे व्यवहार वाले नागरिकों वाला देश बन जाएंगे।

मंगलवार, 13 अक्टूबर 2015

नारी तू नारायणी

* भगवान श्री कृष्ण ने जीवन के आखिरी क्षण तक माँ के हाथों भोजन का वरदान मांगा था।
* आदि शंकराचार्य की मां ने जीवन के आखिरी क्षण पर उपस्थित होने का वायदा ले कर ही उन्हें सन्यास लेने की अनुमति दि थी।
* बासुदेव बलवन्त फड़के मां की बीमारी पर छुटि न मिलने पर नोकरी छोड़ कर घर आ गए थे।
* बिनोबा भावे ने गीता का मराठी अनुवाद मां के लिए किया था। उनके देहांत के बाद गीता को ही मां माँ लिया था।
वैदिक काल मे मैत्रयी, गार्गी अपाला मनत्रदरस्टा
ऋषि थी।
शंकराचार्य को वाद मे एक बार तो हरा देने वाली भारती को कौन नहीं जानता?
वनवास जाने की आज्ञा लेने गए तो मां कौसल्या हवन कर रही थी, बाली की पत्नी तारा मन्तर्वेता थीं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण- ऋग्वेद मे 300 से अधिक ऋषि महिलाएं हैं। दीरघतमस ऋषि की माता ममता ने ऋग्वेद के दसवें सूक्त मे अग्नि उपायेन मन्त्रों की रचना की है। इनकी पत्नी उशिजा ने 8 मन्त्रों की रचना की है। ऋषि कक्षीवान की पुत्री घोष ने कुष्ठ रोग का निदान मन्त्रों से खोजा था। अम्भुज ऋषि की कन्या बाल ने पदार्थ मे ऊर्जा ओर ऊर्जा मे पदार्थ निहित है इस सिद्धान्त की खोज की थी। सुनीता बिलियमस ने 195 घण्टे स्पेस वाक तथा 105 घण्टे 40 मिनट का कीर्तिमान बनाया है। वे अपने साथ गीता व गणेश की प्रतिमा ले गयी थी।

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

अतीत से अनुप्रेरित वर्तमान चुनोतियों का सामना करने में सक्षम 'शिक्षा नीति' होगी कारगर

केंद्र की नई सरकार को बधाई देनी होगी कि उसने हाशिये पर डाल दिए शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक जनसहभागिता आमन्त्रित की है। सरकार का शिक्षा के भगवाकरण का शोर मचा कर आसमान सिर पर उठा लेने वालों की परवाह न कर इस विषय पर आगे बढ़ना सांप को मुंह से पकड़ने जैसा साहसिक कार्य है। अभी अपने बच्चों को शिक्षा के नाम पर हम अंग्रेज द्वारा बनाये सिद्धान्त ही रटाते जा रहे हैं। यही कारण है कि हमारे अधिकांश बड़े सुशिक्षित लोग भी देशभक्ति, स्वाभिमान और सामान्य जीवन मूल्यों में शून्य ही दिखाई देते हैं। 'देर आयद दुरस्त आयद' ही सही लेकिन अब इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। स्वतन्त्रता के पश्चात शिक्षा नीति बनाने में जनसुझाव मांगना सरकार का यह पहला बड़ा प्रयोग है। सरकार या सिस्टम की आलोचना नहीं सार्थक सुझाव दें- जैसे ही शिक्षा पर जन सुझाव आमन्त्रित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई तो शिक्षा विज्ञानियों में ठण्डी या यूँ कहें नाममात्र की हलचल हुई। हम लोग सरकार, सिस्टम और नेताओं की जी भर कर आलोचना करने में सिद्धहस्त होते हैं। हमारे अधिकांश विद्वान विशेषकर शिक्षा शास्त्री वैसे तो 'सुझाव वीर' ही होते हैं। लेकिन सुझाव भी सरकार तक पहुंचाने के बजाय वे अपने घर के अतिथि कक्ष या चौराहे पर देने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। वैसे सब लोग निरन्तर महंगी होती जा रही शिक्षा, इस शिक्षा से तैयार हो रही संस्कार विहीन नई पीढ़ी तथा शिक्षा पर भारी खर्चे के बाबजूद बढ़ती बेरोजगारी से बुरी तरह परेशान हैं। लेकिन इस बीच भी नई शिक्षा नीति पर सार्थक सुझाव देने में ज्यादा उत्साह नहीं देखा जा रहा है। यहां छोटी कथा अत्यंत प्रासंगिक लगती है। एक बार किसी भक्त की गरीबी से व्यथित माँ पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव ने उसके मार्ग में कुछ मुद्राएं रख दी ताकि इनसे इस भक्त की गरीबी दूर हो सके। लेकिन जब वह व्यक्ति मुद्राओं के समीप आया तो उसने मन में विचार किया कि अंधे कैसे चलते हैं यह अनुभव भी तो करना चाहिए। और इस प्रकार भक्त जी महाराज ऑंखें बन्द कर वहां से निकल गए। इस ऐतिहासिक अवसर पर चुप्पी भी उस भक्त की तरह भाग्य को दरबाजे से वापिस लौटाने जैसा ही। एक ओर इस महत्वपूर्ण विषय पर जहां सामान्य जन की निष्क्रियता निराशाजनक है वहीं नई शिक्षा नीति को लेकर देश में कुछ तत्वों की अति सक्रियता चिंताजनक है। सुझाव देने के लिए कमन्युसिट, ईसाई और विदेशी लक्ष्यों को लेकर भारत में सक्रिय एनजीओ सक्रिय हो गयी हैं। ऐसे में कल अगर नई शिक्षा निति में अपेक्षा के अनुसार परिवर्तन नहीं आये तो दोष किसका होगा? हम जानते ही हैं कि क्योंकि सरकार भवन से ज्यादा फाइलों से चलती है इसलिए जनदवाब बनाते समय हमें चूकना नहीं होगा। अतीत में झांकना होगा- भारत की शिक्षा सम्पूर्ण विश्व के लिए आदर्श और प्रेरक रही है। प्रसिद्ध गाँधीवादी विद्वान धर्मपाल ने तथ्यों के सहित सिद्ध किया है कि अंग्रेजों से हमारे यहां साक्षरता दर लगभग शतप्रतिशत थी। हमारे यहां सम्पूर्ण विश्व के छात्र प्रवेश लेने के लिए लालायित रहते थे। नालन्दा और तक्षशिला विश्विद्यालयों का नाम कौन नहीं जानता? हम केवल अक्षर ज्ञान की शिक्षा नहीं बल्कि सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास पर जोर देते थे। इसलिए शिक्षा पूरी कर लेने के बाद भी कुलपति आखिरी परीक्षा लेते थे। यह परीक्षा अक्षर ज्ञान के बजाय उसके व्यक्तित्व पर केंद्रित रहती थी। इस परीक्षा जिसे गुरु दक्षिणा भी कहते थे असफल रहने के बाद उसे फिर कुछ समय और गुरुकुल में रहने को कहा जाता था। शिक्षा पूरी तरह निःशुल्क, स्वयातत् और सबके लिए समान थी। इसलिए हमारे यहां आज कृष्ण और सुदामा एक साथ पढ़ लेते थे, जो कि आज एक स्वप्न जैसा ही लगता था। इसके अतिरिक्त जीवन मूल्यों, देशभक्ति और समाज प्रेम शिक्षा का मुख्य आधार होता था। जीवन के लिए उपयोगी हो शिक्षा- आज की शिक्षा समग्रता प्रदान न कर खण्डों में व्यक्तित्व को बाँट देती है। संघ के श्रेष्ठ अधिकारी रहे श्री भाउसाहिब भुष्कुटे एक जगह लिखते हैं- 'Modern education is knowing more and more about less and less till one knows everything about nothing.' हमारे यहां नब्ज देख कर केवल रोग ही नहीं बल्कि रोगी का सम्पूर्ण व्यक्तित्व बता देने वाले वैद्य गाँव गाँव थे वहीं आज आँख, नाक और कान के डॉक्टर अलग-अलग हो गए हैं। एक रोग में दूसरा डॉक्टर असहाय सा दिखता है। इसके अलावा बी.कॉम वाला छात्र बैंक के फार्म भरने, इंजीनियरिंग करने वाला छात्र भवन निर्माण आदि में सामान्य जानकारी भी नहीं रख रहा है। इसलिए बेरोजगारों की संख्या सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती ही जा रही है। हमें कार्य संस्कृति और स्व रोजगार को बढ़ावा देने वाली शिक्षा भी देनी होगी। आज बिडम्बना ही है कि एक और रोजगार ढूंढने वालों और दूसरी ओर कर्मचारी ढूंढने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। वर्तमान चुनोतियों का उत्तर हो शिक्षा नीति- हमें अतीत से प्रेरणा लेकर वर्तमान चुनोतियों का सफलतापूर्वक सामना करने वाली शिक्षा नीति बनानी होगी। विद्यालय को मन्दिर बना कर विद्या मन्दिर बनाने की आवश्यकता है जिसमे बालक हमारा आराध्य हो। राजनीति और व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा को विद्या मन्दिर की चौखट से दूर रखना होगा। सम्पूर्ण व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए हमारे 16 भारतीय संस्कारों से परिपूर्ण शिक्षा नीति बनाने होगी। बालक को देश और समाज के लिए उपयोगी बनाने के लिए हमे हमारे क्रांतिकारियों, सन्तों व महापुरुषों तथा श्रेष्ठ प्राचीन इतिहास को पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। हमें आज अपने आचार्य और प्रधानाचार्य का सम्मान लौटाना सबसे बड़ी चुनोती है। इसके लिए उसे स्वतन्त्रता और आर्थिक स्वाबलम्वन प्रदान करना होगा। सबसे अंत में लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा को साधना के रूप में लेने वाला शिक्षक तैयार करना होगा। आदर्श प्रेरित शिक्षक ही आज की पीढ़ी का सम्मान अर्जित कर सकता है।

शनिवार, 29 अगस्त 2015

जनता तू कितनी नादान है!

वाह रे! वाह रे ! जनता मेरे भारत महान की
क्या तारीफ करें तेरी समझ और ज्ञान की?
तू चुपचाप सहती रही असंख्य जख्म !
ढ़ोती रही इतिहास का दर्द सीने में,
खून के आंसू रोती रही चुपचाप
उस समय तो तू बेबश थी लेकिन
आज जब समय ने करवट बदली,
दिल्ली से मिटी निशानी उस अत्याचारी ओरंगजेब की!
फिर तू चुप क्यों है भला?
कहीं कोई जश्न नहीं, कोई उत्सव नहीं
मेरे भारत महान की जनता!
तू स्थित प्रज्ञा कब से हो गयी हो!
महिमा क्या गाएं इतिहास की चीख न सुन
बहरे हुए तेरे आँख, नाक और कान की!
क्या तारीफ करें......
अपने व्यक्तिगत दर्द पर बिलबिलाने वाली,
अधिकार?  छीनने के लिए गुर्राने वाली
किसी भी हद तक जाने वाली मेरी
भोली जनता तू और कितनी बार ठगी जायेगी?
किसी केजरीवाल और हार्दिक के झांसे में आकर अपनी सम्पति स्वाहा: कर,
घर फूंक तमाशा देखने की तेरी यह आदत
क्या जीभ के लिए दांत उखाड़ फैंकने की मूर्खतापूर्ण जिद नहीं है?
दांत और जीभ दोनों अपने हैं कब समझेगी तू?
पार्टी, व्यक्ति से मतभेद ठीक है लेकिन
देश और समाज ने तेरा क्या बिगाड़ा ?
जो तू आए दिन किसी के उकसावे में आकर करोड़ों का नुकसान कर लेती है
और अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेती है!
तू कब समझेगी, कब बाज आएगी तू ?
तेरी ऐसी समझ के चलते दुश्मन की क्या जरूरत
जो तू खुद ही दुश्मन जो बन बैठीअपनी इज्जत और जान की 

क्या तारीफ करें तेरी समझ और ज्ञान की....

कब लालू, नितीश, मुलायम और मोदी में अंतर करना सीखेगी? 

तू कब समझेगी कि

लालू , नितीश,  मुलायम, मायावती को तू नहीं तेरे वोट प्यारे हैं इसलिए ये नादान!
ये सत्ता के पुजारी तेरी खूब प्रशंसा करते होंगे
तेरे लिए चाँद लाने की कसमें उठाते होंगे                             किन क्या तू जानती है? 

इनकी चापलूसी उस चालाक मर्द जैसी है

जिसकी नजर औरत के गुणों पर नहीं बल्कि उसके जवान जिश्म पर होती है
और वो भोली उस पर लटू होती जाती है
जब होश आता है तब तक देर बहुत हो चुकी होती है! वो बेचारी लुट चुकी होती है!
मोदी तेरे लिए मीठा नहीं बोलते होंगे! लेकिन एक योग्य डॉक्टर की तरह वे मरीज को खुश करने के लिए नहीं
बल्कि उसे ठीक करने के लिए सच्चाई बोलते हैं, काम करते हैं
कहते हैं न कि राजा जनता को, सचिव राजा को, वैद मरीज को और गुरु शिष्य को खुश करने के लिए अगर सच बोलना छोड़ दें
तो विनाश निश्चित होता है
अब निर्णय तूने करना है कि तुझे उस नादाँ औरत की तरह लुटना है या रक्षा करनी है अपनी इज्जत और जान की!
तेरे निर्णय से ही तारीफ हो सकेगी तेरी समझ और ज्ञान की
वाह ! वाह रे ! जनता मेरे भारत महान की!!!

शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

मंगलवार, 16 जून 2015

उधर कोई बेबश बहाता है आंसू....

उधर कोई बेबश बहाता है आंसू, इधर भीग जाता है दामन हमारा।।  ठीक ऐसी ही स्थिति इस युवा गृहणी के मन की है। प्रस्तुत लेख की नायिका जालंधर की है। नाम उजागर करना शायद उसे अच्छा नहीं लगेगा इसलिए चलो काम चलाने के लिए उसका नाम ममता रख लेते हैं। क्योंकि गरीबों, असहायों के लिए उसकी ममता का मानो बांध ही टूट पड़ता है। युवा ममता के पास सम्पन्न घर, सुंदर परिवार, प्यारे बच्चे व हर जगह सहयोगी पति.... अर्थात आनन्द के सागर में डूबे रहने के लिए सब कुछ पर्याप्त है इसके पास !  सब कुछ होते हुए भी फिर भी न जाने क्यों बेचैन और उदास रहती है ममता। समाज के लिए बहुत कुछ कर गुजरने का जज्बा है इस जज्बाती लेकिन धुन की पक्की महिला  में। किसी दुखी को देख कर उसकी सहायता करने का इसको मानों जनून ही सवार हो जाता है। सामन्य तौर पर विनम्र और नाजुक सी दिखने वाली इस महिला में जरूरत पड़ने पर न जाने अदभुत साहस व पराक्रम कहां से आ जाता है?
विवेकानन्द ने उड़ाई नींद - स्वामी विवेकानन्द ने अपने समय में स्वयं और बाद में उनके प्रेरक जीवन और दर्शन ने असंख्य लोगों की नींद उड़ा कर उन्हें देश व समाज के लिए जीवन न्योछावर करने को मजबूर किया है। उन्हीं की पंक्ति में ममता भी स्वयं रे गिनते रहते हैं जब सारा आलम सोता है।                  साल पहले तक लगभग सब ठीक ठाक ही था। समाज की असमानता थोडा परेशान तो करती थी लेकिन घर गृहश्थी और छोटा सा परिवार इसी में ममता भी पूरी तरह डूबी थी। स्वामी विवेकानन्द सार्धशती में संघ के कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में आने के बाद स्वामी को थोडा थोडा पढ़ना क्या शुरू किया कि फिर तो पीछे मुड़ कर देखने का कहां समय मिला और कहां मन किया?समाज के दुःख में आंसू बहाता, रोता- बिलखता विवेकानन्द इसे अपने अंदर आकार लेता अनुभव होने लगा। इसी समय इसे  'विवेकानन्द और सेवा' विषय पर पुस्तक के लिए सामग्री जुटाने का कार्य मिल गया। इस पुस्तक के लिए स्वामी जी के विचार और प्रसंग संग्रह करते व पढ़ते रही सही कसर भी पूरी हो गयी।     गरीब बच्चे बन गए आराध्य- इसके बाद तो हर गरीब बच्चा ममता के लिए आराध्य बन गया। उन्हें देखते ही इसकी ममता का सैलाब उमड़ पड़ता। गरीब बस्ती में जाकर बच्चों को एकत्र करना और उन्हें पढ़ाना,  खिलाना और खेलाना तथा अच्छे संस्कार देना इसकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। इसके लिए इसने संभ्रांत परिवारों की महिलाओं की अच्छी टोली बना ली। सब मिलकर साथ लगती स्लम बस्ती में जाने लगी। ममता के साथ साथ इन महिलाओं को भी नर सेवा- नारायण सेवा का मन्त्र भाने लगा। बस्ती में संस्कार केंद्र के आलावा बड़े  बच्चों को खेल के लिए घर के बाहर खुले स्थान को  खेल के मैदान  में बदल दिया। कबड्डी और अन्य खेलें,  हनुमान चालीस, देशभक्ति के गीत व  प्रेरक बातें यहां की कार्य पद्धति का भाग है। इसके परिणाम स्वरूप् बच्चों  ने नशा छोड़ना शुरू कर दिया है। बच्चे ममता के इशारों पर नाचते हैं। बच्चों को  प्रेरित कर काम पर भेजना तथा कुछ बच्चों के लिए काम तलाशना भी ममता के कार्य में शामिल है। इसके लिए वह अपने सम्पर्क का पूरा उपयोग करती है।                                                                            दीदी! कल मैं पढ़ने नहीं आउंगी, मेरी माँ मरने वाली है-एक दिन संस्कार केंद्र में पढ़ने वाली एक छोटी बच्ची ख़ुशी बोली, दीदी मैं कल पढ़ने नहीं आउंगी। मेरी माँ मरने वाली है। मैं बुआ के पास लुधियाना चली जाउंगी। यह सुनते आखिर कौन पत्थर दिल हृदय नहीं पिघलेगा? फिर ये तो गरीबों के दुःख में बेचैन रहने वाली ममता थी। सारी रात आँखों में निकल गयी। सवेरे बिना कुछ खाए पिऐ अकेली उस बच्ची  ख़ुशी के घर पहुंच गयी। सारे मुहल्ले को इकट्ठा कर लिया। मुझे भी फोन आया। भैया! विवेकानन्द पढ़ने नहीं जीवन में उतारने का विषय है। मेरे केंद्र की बच्ची की माँ मर जायेगी। ऐसे हम किस को पढ़ायेंगे? पढ़ा कर क्या करेंगे? तुरन्त यहां आ जाओ।  मैंने अपनी व्यस्तता बतानी चाही लेकिन उसने कहां सुनी? जब हम वहां पहुंचे तो दृश्य देख कर मन बेचैन हो गया। आखिर  कब हमारा भारत गरीबों के लिए रहने लाईक बने बस्ती की स्थिति दिल्ली के विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनने के स्वप्न को चिढ़ाती दिख रही थी।  चारों तरफ गन्दगी, एक छोटे से कमरे में मक्खियों के बीच ख़ुशी की ममी सपना असहाय हो कर मानो मौत का ही इंतजार कर रही थी। वह जीना चाहती थी लेकिन कोई भी उसका सहारा नहीं था। मुहल्ले वालों ने बताया कि पति शराबी है। रात को आ कर दवा दारू करने के बजाय इससे लड़ता है। हमें देख कर सपना के असहाय चेहरे पर थोडा विश्वास जरूर लौटा! ममता ने सपना के इलाज के लिए अपने पति के मित्र डॉ को बुलाया। डॉ के कहते ही अस्पताल से एम्बुलेंस मंगवा कर सपना को जिला अस्पताल पंहुचाया गया।  इतना ही नहीं ममता  जिला अस्पताल जा कर बीमार सिस्टम में डॉक्टरों व स्टाफ से लड़-झगड़ कर, सपना का फ्री इलाज का केस बनवा कर, इलाज शुरू करवा कर ही घर आई।                                                 साहस भी कम नहीं- ममता के सेवा कार्य से ईसाई मिशनरी भी दुखी हैं। इस बार उनकी सांता क्लॉज की फेरी भी नहीं निकली। कारण इसके लिए भीड़ के लिए इसी बस्ती से बच्चे आते थे। लेकिन देश भक्ति के रंग में रंग जाने के कारण अब बच्चे कहां से आते? प्रेम, शांति और अहिंसा के पुजारी ये मिशनरी गुंडागर्दी पर उत्तर आए। कुछ दिन पहले रात्रि शाखा  के समय डर का वातावरण बनाने के उदेश्य से दादा और गुंडे जैसी शक्लों वाले तीन चार लड़के मोटर साईकल पर खड़े रहते। उन्हें लगता था कि बच्चे और ये महिला डर जायेगी। इसकी कुछ सहेलियाँ डर भी गयी। लेकिन ममता तो किसी और ही मिटटी की बनी है। जब ईसाई मिशनरियों का यह दाव नहीं  चला तो एक दिन दो लड़के सामान बेचने के बहाने घर में घुसने के लिए आ धमके। संयोग से उस समय ममता दरवाजे पर ही खड़ी थी। इसने तुरन्त निर्णय लेते हुए दरवाजा बन्द कर - पड़ोसी के घर जा कर आती हूँ ' कह कर चली गयी। इस प्रकार  उनका यह बार भी उनका बार भी खाली चला गया। ममता की सूझबूझ एवम्  ईश्वर कृपा से बड़ा हादसा टल गया। इतना सब होने पर भी ममता आत्म्विश्वास से पूरी तरह लबरेज है।  समाज सेवा की अपनी धुन में सेवा कार्य में व्यस्त है। सेवा का इसका जनून बढ़ता ही जा रहा है। गरीबों की सेवा के लिए इसने अपनी सहेलियों की संस्था बनाने का संकल्प लिया है।                   समय का आह्वान स्वीकार करें सम्पन्न गृहिणियां-  भारत को अपनी सम्पन्न महिला शक्ति से बहुत उम्मीदें हैं। महिला का दिल नरम व कोमल होता है। आज उसके अंदर की माँ के ममत्व का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। इन सम्पन्न, समझदार माताओं के प्यार की ओवर डोज के कारण इनके बच्चे बिगड़ रहे हैं और करोड़ों गरीब बच्चे ममता की छाँव के लिए तरस जाते हैं। अपने एक-दो बच्चों के लिए सारी ममता लुटाने वाली माताएं गरीब बस्तियों के बच्चों को भी अपनी सन्तान  मान लें तो देश का बहुत कुछ परिदृश्य बदल जायेगा। काश! आज सम्पन्न घरों में  राग- रंग में डूबी, सामाजिक सरोकार के प्रति निष्क्रिय व उदासीन,  अनेक शारीरिक व मानसिक बीमारियों को निमन्त्रण देती असंख्य गृहिणियां ममता का अनुकरण करें तो समाज का चित्र बदलते देर नहीं लगेगी। लगभग 116-117 साल पहले स्वामी विवेकानन्द की प्रेरणा से भारत की सेवा का जज्बा दिल में लिए हजारों किलोमीटर दूर आयरलेंड की मार्गरेट नोबुल भारत की सेवा के लिए स्वयं को प्रस्तुत कर देती है। अपना देश, धर्म व संस्कृति छोड़ क्र मार्गरेट नोबुल से भारत भक्त निवेदिता में बदल सकती है। भारत के गरीबों का दुःख उसे सन्यस्त जीवन जीने के लिए बाध्य  कर सेवा के लिए भारत में ला पटक सकता है तो भारत की हमारी बहनें अपने ही गरीब देशवासियों के दुःख के प्रति उदासीन कैसे हो सकती हैं?

बुधवार, 3 जून 2015

शिक्षा और शिक्षक विकास को समर्पित विद्या भारती का आचार्य प्रशिक्षण वर्ग

नर से नारायण बना देने, समय की धारा का मुख मोड़ देने, भगवान से भी पहले पॉन्व छूने के अधिकारी हमारे गुरु अपनी यात्रा में आज शिक्षक, अध्यापक के पड़ाव पार करते हुए शुद्ध वेतनभोगी कर्मचारी या टयूसन में पूरी तरह डूबे प्राणी के रूप में देखे जा सकते हैं। किसी समय  का यह श्रेष्ठ वर्ग कुछ अपवाद छोड़ कर आज सरस्वती के स्थान पर लक्ष्मी की आराधना में जुट गया लगता है। आखिर यह सब क्यों और कैसे हुआ? हमारी इस महान संस्था का यह पतन क्यों और कैसे हुआ? इस विषय पर चिंतन इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि यह गिरावट केवल इस गुरु संस्था की नहीं बल्कि हमारे राष्ट्र के पतन का मूल भी इसी मे छिपा है। इस गम्भीर विषय पर योग्य विद्वान चिंतन कर चुके है आगे भी करेंगे।  लेकिन आज सबसे बड़ी चिंता का विषय है कि हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति को समाप्त कर गुरु को केवल वेतनभोगी कर्मचारी में बदलने का जो काम अंग्रेजों ने किया वह आज भी उसी तरह चल रहा है। वर्तमान परिस्थिती में हमारे अध्यापकों की स्थिति - न खुदा मिला न बिसाले सनम' जैसी हो गयी है। आर्थिक दौड़ में भी हम अध्यापक आज कहीं नहीं दिखते और इज्जत की तो बात ही क्या? यद्यपि सबकी स्थिति ऐसी नहीं, आज भी हमारी श्रेष्ठ गुरु परम्परा की टिमटिमाती ज्योति को कुछ महानुभाव कहीं-कहीं थामे देखे जा सकते हैं।
आचार्य की महान परम्परा- आज से 2072 साल पहले एक आचार्य ने इतिहास की धारा का मुंह मोड़ दिया था। सत्ता के नशे में चूर राजा को न केवल सत्ताच्युत किया बल्कि विदेशी आक्रमणकारी को भी करार जबाब दिया। इसके बाद सैकड़ों वर्षों तक विदेशी हमलावरों को भारत की ओर बुरी नजर से देखने का साहस नहीं हुआ। इतिहास के इस महान नायक और उनके सभी साथियों के नाम हम निश्चित जान ही गए होंगे। इसके साथ ही हमारी गुरु शिष्यों की लम्बी श्रृंखला है। इसमें प्रमुख शिवाजी- समर्थ गुरु रामदास, बन्दा बहादुर- श्री गुरु गोबिंद सिंह और आधुनिक काल के रामकृष्ण परमहंस-स्वामी विवेकानन्द तथा बिरजानन्द - स्वामी दयानन्द आदि गुरु- शिष्य की जोड़ी ने नया इतिहास रच दिया दिया था। हमारे आचार्य अदभुत मिटटी से बने होते थे। इनके तेजस्वी व्यक्तित्व का ही परिणाम था कि दशरथ जैसे महान पराक्रमी राजा नंगे पान्व उन्हें लेने दरवाजे  पर आते थे। कुलपति से मिलने के लिए राजा को प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। हमे देश के उत्थान के लिए अपने आचार्यों का वह तेज वापिस लौटाना होगा। इसके लिए आचार्यों को भी वहुत कुछ करना होगा और समाज को भी। समाज को आचार्य के आर्थिक पक्ष की चिंता करनी होगी। दुनिया के कई देशों की तरह भारत में भी  शिक्षण को सबसे ज्यादा आकर्षक बना होगा ताकि समाज का प्रतिभशाली वर्ग इस क्षेत्र में आगे आए। आज कुछ अपवाद छोड़ कर जिसको कहीं नॉकरी नहीं मिलती वह अध्यापन के क्षेत्र में आ जाता है। शिक्षक जैसा कोई गुण इनमे नहीं दिखाई देता। विद्यालय के तुरन्त बाद प्रॉपर्टी या अन्य व्यवसाय में ये महानुभाव खोये देखे जा सकते हैं। आचार्य वर्ग को अपना स्तर स्वयं ऊँचा उठाना होगा।
आचार्य को प्रतिष्ठत करने मे प्रयासरत विद्या भारती- शिक्षा जगत की उपरोक्त समस्या का वर्णन एक बात है लेकिन प्राचीन गौरव के प्रकाश में समाधान की दिशा में कुछ कर लेना यह अलग विषय है। वर्तमान अध्यापक को आचार्य या गुरु जैसे श्रेष्ठ पद का दायित्व बोध कराने की दिशा में हुए प्रयास भी नगण्य जैसे कहे जा सकते हैं। सन्तोष और प्रसन्नता का विषय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से प्रेरणा प्राप्त कर नाना जी देशमुख ने  सन् 1952 में एक छोटे से शिशु मन्दिर के रूप में एक चिराग जलाया। वर्तमान में इस संस्थान के द्वारा लगभग 15000  विद्या मंदिर तथा 10000 के आसपास संस्कार केंद्र सफलतापूर्वक चलाये जा रहे हैं। सरकार के बाद सबसे बड़ी स्वयंसेवी संस्था बन गयी है विद्या भारती। भारतीय जीवन मूल्यों के आधार पर आधुनिक एवम् संस्कारप्रद शिक्षा देने के लिए एक बड़ा प्रयास चल रहा है। अध्ययन, अध्यापन  पुस्तक लेखन एवम् शोध के लिए गम्भीर प्रयास चल रहे हैं।
आचार्य प्रशिक्षण वर्ग का अदभुत वातावरण- विद्या भारती शिक्षा एवम् शिक्षकों का स्तर ऊँचा उठाने के लिए प्रतिवर्ष आचार्य प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन करती है। पंजाब में सर्वहितकारी शिक्षा समिति द्वारा दस दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग का आयोजन नाभा में किया गया। 40 विद्यामन्दिरों से 168 आचार्य दीदियों ने प्रशिक्षण ग्रहण किया। शिविर के उद्घाटन पर कोटकपूरा से  स्वामी 1008 हरि गिरी जी महाराज तथा समापन केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के कुलपति डॉ. कुलदीप अग्निहोत्री उपस्थित थे। शिक्षा का भारतीय स्वरूप्, आदर्श शिक्षक, शिक्षण की वैज्ञानिक एवम् आधुनिक पद्धतियाँ आदि विषयों  के अतिरिक्त सामाजिक सरोकारों पर भी शिक्षकों का मार्गदर्शन किया गया। इसके साथ प्रात: जागरण से लेकर रात्रि सोने तक अनुशासित दिनचर्या का अभ्यास कराया गया। शिक्षा स आदर्श आचार्य बनने का संकल्प एवम् शिक्षण के अनुरूप कक्षा में अध्यापन के उत्साह के साथ सभी आचार्य-दीदियां अपने घरों को लौटे।